नीरव मोदी से ग्रेटर नोएडा तक... PNB में 8 साल बाद फिर करोड़ों की धोखाधड़ी, सिस्टम में कहां है छेद?
नीरव मोदी घोटाले के 8 साल बाद PNB में फिर 10.24 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आई है. ग्रेटर नोएडा मामले ने बैंक की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं.
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में एक बार फिर करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी ने बैंकिंग व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. ग्रेटर नोएडा की एक शाखा में ग्राहकों की जमा पूंजी और एफडी से 10.24 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी का आरोप है. हैरानी की बात यह है कि जिस बैंक का नाम 2018 में नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के करीब 13,850 करोड़ रुपये के घोटाले से जुड़ा था, वहां आठ साल बाद फिर ऐसी घटना सामने आई है. तब फर्जी बैंक गारंटी से सिस्टम को चकमा दिया गया था, अब कर्मचारियों के डिजिटल पासवर्ड के कथित दुरुपयोग से ग्राहकों की बचत को चूना लगाया. सवाल सीधा है- इतने बड़े घोटाले के बाद भी बैंक की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है? फिलहाल, इस बैंक के खाताधारक यह सोचने पर मजबूर हैं कि पीएनबी में स्कैम का सिलसिला कब तक जारी रहेगा?
आरोप है कि बैंक कर्मचारियों ने मिलीभगत करके ग्राहकों की जमा रकम को दूसरे खातों में ट्रांसफर किया. फिलहाल, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की है. जानकारी के मुताबिक, इस मामले में 12 बैंक कर्मचारियों को निलंबित भी किया गया है.
पीएनबी में धोखाधड़ी का यह पहला मामला नहीं है. फरवरी 2018 में नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़ा करीब 13,000-14,000 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया था. उस समय बैंक की मुंबई स्थित ब्रैडी हाउस शाखा से जारी फर्जी बैंक गारंटी के जरिए विदेशों में कर्ज लिया गया था.
उस घोटाले ने देश की बैंकिंग व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था. अब करीब आठ साल बाद एक बार फिर पीएनबी की शाखा में करोड़ों की कथित धोखाधड़ी ने बैंक के आंतरिक नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
ग्रेटर नोएडा में कैसे हुई 10.24 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी?
ग्रेटर नोएडा की सेक्टर पाई-1 शाखा में सामने आए मामले में आरोप है कि एक महिला कर्मचारी ने दूसरे अधिकारियों के यूजर आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर ग्राहकों के खातों में हेरफेर किया. ग्राहकों की सावधि जमा को समय से पहले बंद कराया गया और रकम दूसरे खातों में भेज दी गई.
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि दूसरे अधिकारियों की डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कैसे होता रहा? खातों से रकम निकलती रही और बैंक की निगरानी व्यवस्था को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल कर्मचारियों की मिलीभगत का मामला नहीं, बल्कि शाखा स्तर पर बैंक के नियंत्रण तंत्र की गंभीर विफलता भी होगी.
नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने कैसे लगाया था बैंक को चूना?
फरवरी 2018 में पीएनबी ने करीब 1.77 अरब डॉलर की धोखाधड़ी का खुलासा किया था. शुरुआती तौर पर इसकी रकम लगभग 11,400 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जो बाद के आकलनों में करीब 13,850 करोड़ रुपये तक पहुंच गई.
इस घोटाले का केंद्र मुंबई की ब्रैडी हाउस शाखा थी. आरोप था कि बैंक के कुछ कर्मचारियों ने जरूरी मंजूरी और रिकॉर्ड में प्रविष्टि किए बिना लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (LoU) जारी किए. ये बैंक की ओर से दी जाने वाली गारंटी थी, जिसके आधार पर नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़ी कंपनियों ने विदेशों के बैंकों से कर्ज लिया.
इसमें स्विफ्ट (SWIFT) संदेश व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया, लेकिन लेनदेन की जानकारी बैंक के मुख्य बैंकिंग सिस्टम में दर्ज नहीं की गई. नतीजा यह हुआ कि बैंक के आंतरिक रिकॉर्ड और विदेश भेजी गई गारंटी के बीच तालमेल नहीं रहा. इसी खामी का फायदा उठाकर कई साल तक धोखाधड़ी होती रही.
क्या 2018 से पहले भी पीएनबी में धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे?
नीरव मोदी का मामला पीएनबी में धोखाधड़ी की पहली बड़ी घटना नहीं था. मार्च 2018 में प्रकाशित रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2016-17 में विभिन्न धोखाधड़ी के मामलों में बैंक को करीब 2,800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. उस समय सरकारी बैंकों में यह सबसे अधिक था.
इससे साफ है कि 2018 के बड़े घोटाले से पहले भी बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं की चुनौती से जूझ रहा था. हालांकि, हर मामले को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं होगा. कहीं कर्ज लेने वाली कंपनियों पर धोखाधड़ी के आरोप लगे, तो कहीं बैंक कर्मचारियों की भूमिका सवालों के घेरे में आई.
पीएनबी में हर साल कितने धोखाधड़ी के मामले दर्ज होते हैं?
पीएनबी की वित्त वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक में धोखाधड़ी के 2,920 मामले दर्ज किए गए. इनमें 84 कर्ज से जुड़े, 90 बिना कर्ज वाले और 2,746 डिजिटल धोखाधड़ी के मामले थे. इन सभी मामलों में शामिल कुल रकम 4,416 करोड़ रुपये बताई गई.
वहीं, वित्त वर्ष 2023-24 में धोखाधड़ी के 7,112 मामले दर्ज हुए थे. इनकी कुल रकम 1,803.59 करोड़ रुपये थी. हालांकि, इन आंकड़ों में डिजिटल धोखाधड़ी के छोटे-बड़े मामले भी शामिल हैं. इसलिए इनकी तुलना नीरव मोदी जैसे बड़े बैंकिंग घोटालों से सीधे नहीं की जा सकती. लेकिन इतनी बड़ी संख्या में धोखाधड़ी के मामले बैंक की निगरानी व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े करते हैं.
नीरव मोदी घोटाले के बाद बैंक ने क्या सुधार किए?
2018 के घोटाले के बाद भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार ने बैंकों की निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया. स्विफ्ट और मुख्य बैंकिंग प्रणाली के बीच तालमेल बेहतर करने, बड़े लेनदेन का नियमित मिलान करने, डिजिटल सुरक्षा बढ़ाने और आंतरिक नियंत्रण मजबूत करने के निर्देश दिए गए. लेकिन ग्रेटर नोएडा की घटना ने सुधारों के जमीन पर लागू होने की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बैंकिंग सेवा के एक्सपर्ट अश्विनी राणा का कहना है कि जिम्मेदारी सिर्फ घोटाला सामने आने के बाद प्राथमिकी दर्ज कराने और कर्मचारियों को निलंबित करने तक सीमित नहीं हो सकती. असली कसौटी यह है कि ग्राहकों की जीवनभर की बचत सुरक्षित कैसे रहेगी? जब बैंक के भीतर ही कर्मचारियों की मिलीभगत से जमा रकम पर सेंध लगने के आरोप सामने आते हैं, तो ग्राहकों का भरोसा कमजोर होता है. पीएनबी को अब जवाब देना होगा कि आखिर ऐसी व्यवस्था कब बनेगी, जिसमें न कोई कर्मचारी अकेले और न ही मिलीभगत से ग्राहकों के पैसे तक अनधिकृत पहुंच बना सके.




