चुनाव से 72 घंटे पहले ‘सीक्रेट’ US-बांग्लादेश ट्रेड डील क्यों? 15% टैरिफ, भारत का डर और Yunus सरकार पर सवाल

बांग्लादेश में चुनाव से 72 घंटे पहले अमेरिका के साथ होने वाली ‘सीक्रेट’ ट्रेड डील पर सवाल उठ रहे हैं. भारत को मिले 18% टैरिफ के बाद 15% की यह डील गेमचेंजर है या टाइम बम, यही बहस का केंद्र है.;

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By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 6 Feb 2026 7:39 AM IST

सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक, इस वक्त बांग्लादेश में एक ही सवाल गूंज रहा है. आख़िर चुनाव से ठीक 72 घंटे पहले अमेरिका के साथ ट्रेड डील क्यों? 9 फरवरी को साइन होने वाली इस डील की टाइमिंग ने शक और विवाद दोनों को हवा दे दी है, क्योंकि 12 फरवरी को बांग्लादेश में नेशनल इलेक्शन होने जा रहे हैं.

सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि इस डील की शर्तें पूरी तरह गोपनीय रखी गई हैं. न संसद को भरोसे में लिया गया, न उद्योग जगत को. ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है. क्या यह सौदा बांग्लादेश के हित में है या किसी दबाव का नतीजा?

US-बांग्लादेश ट्रेड डील अचानक इतनी जरूरी क्यों हो गई?

सीधी वजह है- भारत-अमेरिका ट्रेड डील. हाल ही में भारत को अमेरिका ने बड़ा टैरिफ कट देते हुए उसे 18% पर ला दिया. इससे बांग्लादेश में खतरे की घंटी बज गई. क्यों? क्योंकि अमेरिका को होने वाले बांग्लादेश के करीब 90% एक्सपोर्ट रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) हैं. अगर भारत सस्ता पड़ेगा, तो अमेरिकी खरीदार ऑर्डर शिफ्ट कर सकते हैं.

टैरिफ का पूरा खेल क्या है?

बांग्लादेश पर अमेरिका ने अप्रैल 2025 में 37% टैरिफ ठोक दिया था.

  • जुलाई में घटकर: 35%
  • अगस्त में: 20%
  • अब नई डील में उम्मीद: 15% तक कटौती

यानी सरकार की कोशिश है कि भारत से मुकाबला बराबरी या उससे बेहतर शर्तों पर किया जाए.

सीक्रेट डील क्यों कह रहे हैं लोग?

क्योंकि मिड-2025 में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने अमेरिका के साथ Non-Disclosure Agreement (NDA) साइन किया. मतलब- ट्रेड और टैरिफ से जुड़ी कोई भी बात, पब्लिक को नहीं, संसद को नहीं, इंडस्ट्री को नहीं. यहां तक कि एग्रीमेंट का ड्राफ्ट तक किसी को नहीं दिखाया गया.

कॉमर्स एडवाइज़र एसके बशीर उद्दीन ने जरूर कहा था कि देश के हितों के खिलाफ कुछ नहीं होगा, US की सहमति से इसे पब्लिक किया जाएगा.” लेकिन अब तक कुछ भी सार्वजनिक नहीं हुआ. 'US इस डील में क्या-क्या शर्तें रख रहा है? Prothom Alo की रिपोर्ट के मुताबिक, डील में कई स्ट्रॉन्ग कंडीशंस हैं- चीन से इंपोर्ट घटाओ, अमेरिका से बढ़ाओ, मिलिट्री खरीद में चीन की जगह US को तरजीह. अमेरिकी प्रोडक्ट्स बिना सवाल एंट्री करें. US के स्टैंडर्ड और सर्टिफिकेशन को बिना जांच स्वीकार करो. अमेरिकी गाड़ियों और पार्ट्स की इंस्पेक्शन न हो यानि मार्केट एक्सेस फुल फ्री, सवाल जीरो.

क्या चुनाव से पहले डील साइन करना सही है?

इसी सवाल पर अर्थशास्त्री देवप्रिय भट्टाचार्य (CPD) ने साफ कहा कि डील पारदर्शी नहीं है. चुनाव के बाद होती, तो पार्टियां इसके फायदे-नुकसान पर चर्चा कर पातीं. अब सवाल है, क्या नई सरकार के हाथ बांधे जा रहे हैं? क्योंकि साइन तो अंतरिम सरकार कर रही है, लेकिन लागू नई चुनी हुई सरकार को करना होगा. 'गारमेंट इंडस्ट्री इतनी टेंशन में क्यों है?”

बांग्लादेश हर साल अमेरिका को 7 से 8.4 अरब डॉलर के कपड़े बेचता है. यह अमेरिका को होने वाले कुल एक्सपोर्ट का 96% है. जबकि अमेरिका से खरीद सिर्फ 2 अरब डॉलर की है. अगर भारत को 18% और बांग्लादेश को उससे ज्यादा टैरिफ देना पड़ा, तो ऑर्डर भारत शिफ्ट होना तय है. और इसका मतलब- लाखों नौकरियों पर खतरा. RMG सेक्टर इतना बड़ा क्यों माना जाता है?”

40 से 50 लाख लोगों को रोजगार

ज़्यादातर महिलाएं कुल एक्सपोर्ट कमाई का 80%+ देश की GDP का करीब 20% यानी अगर RMG हिला, तो पूरा देश हिल जाएगा. इंडस्ट्री लीडर्स क्या कह रहे हैं? BGMEA के सीनियर वीपी इनामुल हक खान बोले “उम्मीद है टैरिफ 15% तक आएगा, लेकिन चुनाव से ठीक पहले साइन होना चौंकाने वाला है. इसके असर बहुत बड़े होंगे, इसे चुनाव बाद किया जाना चाहिए था.”

आख़िर इतनी जल्दबाज़ी क्यों?

इकनॉमिस्ट अनु मोहम्मद ने फेसबुक पर तीखा हमला करते हुए लिखा कि“सरकार के अंदर विदेशी लॉबी काम कर रही हैं. क्या किसी से कोई कमिटमेंट है? वरना देश को इस खतरनाक रास्ते पर क्यों धकेला जा रहा है?” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अंतरिम सरकार पर किसी बाहरी ताकत का दबाव है. “जमात-ए-इस्लामी एंगल क्यों अहम है?” दिलचस्प बात यह है कि US डिप्लोमैट्स ने संकेत दिए हैं कि वे जमात-ए-इस्लामी के साथ काम करने को तैयार हैं कि वही जमात, जिस पर बांग्लादेश में कई बार बैन लग चुका है, खासकर शेख हसीना के दौर में तो क्या यह डील गेमचेंजर है या टाइम बम? अब असली सवाल यही है. क्या यह डील बांग्लादेश को ग्लोबल मार्केट में बचाएगी, या फिर चुनाव से पहले साइन किया गया एक ऐसा समझौता है, जिसकी कीमत आने वाली सरकार और आम जनता चुकाएगी?

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