254 मौतों के बाद भी नहीं थमे हमले..आखिर कौन है Hezbollah, जिसे खत्म करने पर तुला है इजराइल? जानें पूरी कुंडली

ईरान से सीजफायर होने के बाद इजराइल ने हिजबुल्लाह पर हमले शुरू कर दिए हैं. इस संगठन से तेल अवीव का विवाद काफी पुराना रहा है. इजराइली हमलों में लेबनान में 254 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

Edited By :  समी सिद्दीकी
Updated On : 9 April 2026 2:46 PM IST

What is Hezbollah: इजराइल और ईरान के बीच जंग रुक गई है, लेकिन आईडीएफ ने लेबनान में मौजूद हिजबुल्लाह को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. अभी तक 254 लोगों की जान जा चुकी है. मरने वालों की तादाद में और इज़ाफा हो सकता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर ये हिजबुल्लाह कौन है, जिसके पीछे ईरान हाथ धोकर पीछे पड़ा है.

हिज़बुल्लाह को ईरान की प्रॉक्सी भी कहा जाता है. यानी ये संगठन ईरान के इशारों पर अपनी गतिविधियों को अंजाम देता है. वैसे तो हिजबुल्लाह हमास के खिलाफ जंग के दौरान से ही इजराइल पर लगातार हमले करता आ रहा था, लेकिन ईरान से हुई जंग के बाद ये हमले और तेज हो गई. संगठन ने आईडीएफ (इजराइली डिफेंस फोर्स) के कई सैनिकों को भी मौत के घाट उतारा.

क्या है हिज़बुल्लाह?

हिज़बुल्लाह लेबनान में स्थित एक शिया मुस्लिम राजनीतिक दल और उग्रवादी संगठन है, जिसे वहां 'राज्य के भीतर राज्य' जैसी पहचान मिली हुई है. इसकी स्थापना 1975 से 1990 तक चले लेबनानी गृहयुद्ध के दौरान हुई थी. ईरान के समर्थन से चलने वाला यह संगठन इज़राइल के विरोध और मध्य पूर्व में पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ अपनी विचारधारा के लिए जाना जाता है.

क्या यह है आतंकी संगठन?

Hezbollah को United States सहित कई देशों ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है. इसके ईरान और सीरिया जैसे देशों के साथ गहरे सैन्य संबंध हैं. 2024 के अंत में इज़राइल ने हिज़बुल्लाह के लंबे समय तक नेता रहे Hassan Nasrallah को मार गिराया था और दक्षिणी लेबनान में जमीनी अभियान शुरू किया था. उसी साल दोनों पक्षों के बीच एक नाजुक संघर्षविराम हुआ, जो फरवरी 2026 में तब टूट गया जब हिज़बुल्लाह ने Israel पर हमले किए. यह कार्रवाई Ayatollah Ali Khamenei की हत्या के जवाब में बताई गई, जो अमेरिका-इज़राइल सैन्य अभियान में हुई थी.

कैसे खड़ा हुआ हिजबुल्लाह?

हिज़बुल्लाह की शुरुआत लेबनान के गृहयुद्ध के दौरान हुई, जो 1975 में देश में बड़ी संख्या में सशस्त्र फिलिस्तीनी समूहों की मौजूदगी को लेकर बढ़ते तनाव के कारण शुरू हुआ था. लेबनान में 1943 के एक राजनीतिक समझौते के तहत सत्ता का बंटवारा धार्मिक समूहों के बीच तय है, जिसमें सुन्नी मुस्लिम प्रधानमंत्री, मैरोनाइट ईसाई राष्ट्रपति और शिया मुस्लिम संसद के स्पीकर होते हैं. समय के साथ इन समूहों के बीच तनाव बढ़ा और गृहयुद्ध छिड़ गया.

इस दौरान इज़राइल ने 1978 और 1982 में दक्षिणी लेबनान पर हमला किया, ताकि वहां से फिलिस्तीनी लड़ाकों को हटाया जा सके, जो इज़राइल पर हमले करते थे. इसी माहौल में ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति से प्रभावित शिया समूहों ने इज़राइली कब्जे के खिलाफ हथियार उठाए. ईरान और उसके इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस नए संगठन को फंड और ट्रेनिंग दी, जिसे बाद में हिज़बुल्लाह नाम दिया गया, जिसका मतलब 'अल्लाह की पार्टी' होता है.

हिज़बुल्लाह ने जल्द ही अपनी उग्र गतिविधियों के कारण पहचान बनाई. उसने अमल मूवमेंट जैसे अन्य शिया गुटों से संघर्ष किया और विदेशी लक्ष्यों पर भी हमले किए. 1983 में बेरूत में अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों के ठिकानों पर आत्मघाती हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए थे. इसके बाद यह संगठन ईरान के लिए मध्य पूर्व में एक अहम सहयोगी बन गया.

1985 में घोषणा पत्र जारी कर क्या बोला हिजबुल्लाह?

1985 में जारी अपने घोषणापत्र में हिज़बुल्लाह ने पश्चिमी शक्तियों को लेबनान से बाहर निकालने, इज़राइल के विनाश और ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रति निष्ठा की बात कही. साथ ही उसने यह भी कहा कि लेबनान के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए.

कैसे हसन नसरल्लाह ने निभाई अहम भूमिका?

Hassan Nasrallah ने 1980 के दशक की शुरुआत में हिज़बुल्लाह की स्थापना में अहम भूमिका निभाई और 30 साल से अधिक समय तक इसका नेतृत्व किया. सितंबर 2024 में इज़राइली हवाई हमले में उनकी मौत हो गई. विशेषज्ञों के अनुसार, नसरल्लाह ने हिज़बुल्लाह को क्षेत्र की सबसे ताकतवर गैर-राज्य सैन्य ताकत और ईरान का प्रमुख सहयोगी बनाया.

इजराइल को कैसे माननी पड़ी हार?

उनके नेतृत्व में हिज़बुल्लाह ने इज़राइल के साथ लंबा संघर्ष किया, जिसके चलते मई 2000 में इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटानी पड़ी, जो 18 साल के कब्जे का अंत था. इसके बाद हिज़बुल्लाह ने लेबनान की सेना की जगह एक प्रभावी सैन्य शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की.

नसरल्लाह के नेतृत्व में संगठन की संरचना भी मजबूत हुई, जिसमें सात सदस्यीय शूरा काउंसिल और पांच उप-परिषदें शामिल थीं- राजनीतिक, जिहाद (सैन्य), संसदीय, कार्यकारी और न्यायिक परिषद. उनकी मौत को संगठन के लिए बड़ा झटका माना गया, क्योंकि उनके जैसा प्रभावशाली नेता दूसरा नहीं था.

उनकी मौत के बाद उनके डिप्टी Naim Qassem ने कुछ समय के लिए अंतरिम नेतृत्व संभाला और अक्टूबर 2024 में उन्हें आधिकारिक तौर पर महासचिव चुना गया. 71 वर्षीय क़ासिम संगठन की स्थापना के समय से ही उससे जुड़े रहे हैं. नेतृत्व संभालने से पहले इज़राइल ने बेरूत में हवाई हमले में हिज़बुल्लाह के एक और बड़े नेता हाशिम सफ़ीउद्दीन और कई अन्य सदस्यों को मार गिराया था. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, क़ासिम की मौजूदगी स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि वे तेहरान चले गए हैं.

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