Lebanon का पावर गेम : सिर्फ मुस्लिम नहीं, इस धर्म के लोग भी सत्ता के खिलाड़ी - Israel हमलों के बीच कैसे चल रहा देश?

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर का ऐलान के बाद भी हिजबुल्ला के ठिकानों पर इजरायली हमले जारी है. लेबनान का अनोखा सत्ता मॉडल, जहां मुस्लिम और ईसाई दोनों मिलकर देश चलाते हैं- जानिए पूरा पावर गेम.

( Image Source:  Sora AI )
By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 9 April 2026 10:57 AM IST

मिडिल ईस्ट का छोटा, लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम देश लेबनान इजरायल के साथ तनाव और संघर्ष के कारण सुर्खियों में रहता है. इस देश को समझने के लिए सिर्फ युद्ध या भू-राजनीतिक नजरिए से देखना काफी नहीं है. लेबनान की असली कहानी, वहां के समाज की पेचीदगियों से उलझी और अनोखी सियासी व्यवस्था है. यहां सिर्फ मुस्लिम समुदाय का ही प्रभाव नहीं है, बल्कि ईसाई, खासकर मारोनाइट क्रिश्चियन भी सत्ता में बराबर की भूमिका निभाते हैं. यही संतुलन इसे बाकी देशों से अलग बनाता है.

क्या लेबनान में सिर्फ मुस्लिम ही प्रभावशाली हैं?

लेबनान की आबादी कई धार्मिक समूहों में बंटी हुई है. यहां सुन्नी और शिया मुस्लिम समुदाय के अलावा बड़ी संख्या में ईसाई रहते हैं, जिनमें मारोनाइट, ग्रीक ऑर्थोडॉक्स और अन्य चर्च शामिल हैं. इसके अलावा द्रूज (Druze) समुदाय भी है, जो संख्या में कम होने के बावजूद राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाता है.

दरअसल, लेबनान एक मल्टी-रिलिजियस देश है, जहां कोई एक धर्म पूरी तरह हावी नहीं है. यही वजह है कि यहां की राजनीति भी किसी एक पहचान के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, बल्कि संतुलन और साझेदारी पर आधारित है. लेबनान, यही विविधता कई बार टकराव और अस्थिरता की वजह भी बन जाती है.

सत्ता में किस धर्म की कितनी हिस्सेदारी है?

लेबनान की सबसे खास बात उसका “कन्फेशनल सिस्टम” है, जिसमें सत्ता का बंटवारा धर्म के आधार पर तय किया गया है. वहां, राष्ट्रपति - मारोनाइट क्रिश्चियन हैं. प्रधानमंत्री - सुन्नी मुस्लिम और संसद अध्यक्ष - शिया मुस्लिम हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, संसद की सीटों का बंटवारा भी मुस्लिम और ईसाई समुदायों के बीच लगभग बराबरी से किया गया है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई एक समुदाय सत्ता पर पूरी तरह हावी न हो और सभी को प्रतिनिधित्व मिले.

लेबनान में धार्मिक आधार पर आबादी के सटीक और ताजा सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि देश में आखिरी आधिकारिक जनगणना 1932 में हुई थी. इसके बाद से धार्मिक संतुलन के राजनीतिक रूप से संवेदनशील होने के कारण, जनगणना नहीं कराया गया. 1932 की जनगणना के अनुसार, लेबनान में ईसाई लगभग 51 फीसदी के साथ बहुमत में थे, जबकि मुस्लिम आबादी करीब 42 प्रतिशत और द्रूज समुदाय लगभग 6 से 7 प्रतिशत था. मुस्लिमों में सुन्नी और शिया लगभग बराबर थे, जबकि ईसाइयों में मारोनाइट सबसे बड़ा समूह था.

कैसे और क्यों, बिगड़ा धार्मिक संतुलन?

मौजूदा समय में स्थिति बदल चुकी है. अब अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और रिसर्च के मुताबिक, आज लेबनान में मुस्लिम आबादी करीब 67 से 69 प्रतिशत के बीच मानी जाती है. जबकि ईसाई समुदाय घटकर लगभग 27 से 31 प्रतिशत के बीच रह गया है. द्रूज और अन्य छोटे समुदायों की हिस्सेदारी लगभग 5 से 6 प्रतिशत मानी जाती है. मुस्लिम आबादी के भीतर शिया और सुन्नी लगभग बराबरी पर हैं, दोनों ही करीब 30 से 32 प्रतिशत के आसपास माने जाते हैं.

लेबनान में दशकों से कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई है. इस बीच बड़ी संख्या में लोगों का प्रवास हुआ है. साथ ही, सीरिया और अन्य क्षेत्रों से आए शरणार्थियों ने भी जनसंख्या संतुलन को प्रभावित किया है. इसके बावजूद, लेबनान की राजनीति आज भी पुराने धार्मिक संतुलन के आधार पर चलती है, जहां सत्ता का बंटवारा समुदायों के बीच तय रहता है. यही कारण है कि जनसंख्या में बदलाव आने के बावजूद राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.

फिर क्यों बना रहता है संकट?

लेबनान का यह संतुलन जितना अनोखा है, उतना ही नाजुक भी है. अलग-अलग धार्मिक समूहों के बीच मतभेद अक्सर राजनीतिक गतिरोध पैदा करते हैं. इसके अलावा, आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और कमजोर प्रशासन ने देश की स्थिति को और खराब किया है. 2019 के बाद से लेबनान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जहां मुद्रा का मूल्य गिर गया और आम लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गई.

हिजबुल्लाह की लेबनान में भूमिका क्या?

दक्षिणी लेबनान में सक्रिय Hezbollah की मौजूदगी भी एक बड़ा फैक्टर है. यह संगठन न सिर्फ सैन्य ताकत रखता है, बल्कि राजनीति में भी प्रभावशाली है. इसकी वजह से इजरायल के साथ तनाव लगातार बना रहता है. हिजबुल्लाह लेबनान में एक शक्तिशाली शिया राजनीतिक दल, सैन्य शक्ति और सामाजिक कल्याण संगठन के रूप में कार्य करता है. 1982 में स्थापित, यह ईरान के समर्थन से चलता है और लेबनानी सेना से भी मजबूत अपनी सशस्त्र शाखा के साथ, दक्षिणी लेबनान और बेरूत के कई क्षेत्रों में "राज्य के भीतर राज्य" की तरह नियंत्रण रखता है.

हिजबुल्लाह के पास हथियारों का विशाल भंडार है, जिसका उपयोग वह मुख्य रूप से इजरायल के खिलाफ करता है. यह लेबनानी सेना से भी अधिक ताकतवर माना जाता है. 1992 से हिजबुल्लाह लेबनानी संसद का हिस्सा है और 2005 से लगातार कैबिनेट (मंत्रिमंडल) में भी शामिल है. यह देश की राजनीति में वीटो पावर जैसा प्रभाव रखता है.

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