NATO से हो गई सीक्रेट डील! ग्रीनलैंड पर अमेरिकी राष्ट्रपति हुए Soft, भारत पर ही क्यों अटक जाती है ट्रंप की सुई?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित टैरिफ अचानक रद्द कर दिए हैं. यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ दिन पहले ही ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका के अधिकार और स्वामित्व में लेने की बात कर चुके थे. ट्रंप ने दावा किया कि NATO नेतृत्व के साथ आर्कटिक सुरक्षा को लेकर एक “फॉरएवर फ्रेमवर्क डील” पर सहमति बनी है.;

( Image Source:  sora ai )
Edited By :  नवनीत कुमार
Updated On : 22 Jan 2026 8:09 AM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ऐसे फैसले के साथ सुर्खियों में हैं, जिसने दुनिया की राजनीति और बाजारों दोनों को चौंका दिया है. ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी देने वाले ट्रंप ने अचानक आठ यूरोपीय देशों पर प्रस्तावित आयात शुल्क रद्द कर दिए. यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब कुछ ही दिन पहले ट्रंप खुले मंच से ग्रीनलैंड को अमेरिका के “राइट, टाइटल और ओनरशिप” में लेने की बात कह चुके थे. इस यू-टर्न ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इसके पीछे NATO के साथ कोई बड़ा लेकिन पर्दे के पीछे हुआ समझौता है.

ट्रंप के इस कदम को सिर्फ टैरिफ वापसी के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे आर्कटिक राजनीति और वैश्विक सुरक्षा संतुलन से जोड़कर समझा जा रहा है. यूरोप में जहां राहत की सांस ली गई, वहीं अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस फैसले के दूरगामी असर तलाशने में जुट गए हैं.

NATO के साथ ‘फॉरएवर डील’ का दावा

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावा किया कि NATO नेतृत्व के साथ आर्कटिक सुरक्षा को लेकर भविष्य का एक “फ्रेमवर्क” तैयार हुआ है. उन्होंने इसे “फॉरएवर डील” बताते हुए कहा कि इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा पहले से ज्यादा मजबूत होगी. हालांकि, इस कथित समझौते का कोई आधिकारिक दस्तावेज या विस्तृत विवरण सामने नहीं आया है. दावोस में NATO महासचिव मार्क रुटे से मुलाकात के बाद ट्रंप ने संकेत दिए कि यह समझौता ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र से जुड़ी रणनीतिक चिंताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इसी आधार पर उन्होंने 1 फरवरी से लागू होने वाले टैरिफ रद्द करने का फैसला लिया.

टैरिफ क्यों हटाए गए?

ट्रंप ने साफ कहा कि NATO के साथ बनी इस रूपरेखा के बाद उन देशों पर टैरिफ लगाने का कोई औचित्य नहीं रह गया. उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ आगे की बातचीत संभालेंगे और सीधे उन्हें रिपोर्ट करेंगे. यह बयान ऐसे समय आया, जब कुछ घंटे पहले ही ट्रंप ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय सहयोगियों पर तंज कस चुके थे और NATO से अमेरिकी विस्तारवाद को न रोकने की बात कह रहे थे. इसी विरोधाभास ने उनके रुख को और ज्यादा रहस्यमय बना दिया.

ग्रीनलैंड पर दावा और यूरोप की बेचैनी

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया. उन्होंने कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. अमेरिका की वहां पहले से सैन्य मौजूदगी है, लेकिन ट्रंप इसे और मजबूत करना चाहते हैं. यूरोपीय देशों, खासकर डेनमार्क ने साफ कर दिया कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और उसकी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा. ट्रंप की बयानबाजी से NATO में भी असहजता पैदा हो गई थी, जिसे टैरिफ रद्द करने के फैसले ने कुछ हद तक शांत किया.

अचानक बदला माहौल

ट्रंप के बयानों के बाद NATO में यह आशंका पैदा हो गई थी कि कहीं गठबंधन में दरार न पड़ जाए. इसी बीच NATO महासचिव मार्क रुटे ने सार्वजनिक बयान दिया कि अगर अमेरिका पर हमला होता है तो पूरा गठबंधन उसके साथ खड़ा रहेगा. इसके कुछ ही देर बाद ट्रंप ने टैरिफ हटाने का ऐलान कर दिया. विश्लेषकों का मानना है कि यह एक तरह का राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश थी- जहां ट्रंप ने अपनी आक्रामक छवि भी बरकरार रखी और सहयोगियों को राहत भी दी.

ग्रीनलैंड में सतर्कता, नागरिकों को चेतावनी

इस पूरे घटनाक्रम के बीच ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है. वहां संकट से निपटने के लिए एक गाइड जारी की गई है, जिसमें लोगों से कम से कम पांच दिन के जरूरी सामान का स्टॉक रखने को कहा गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि वे ट्रंप के बयानों को सीधे धमकी के तौर पर नहीं, लेकिन संभावित खतरे के संकेत के रूप में जरूर देख रहे हैं. आर्कटिक राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी ने ग्रीनलैंड को वैश्विक ध्यान के केंद्र में ला दिया है.

भारत के साथ डील का संकेत

ग्रीनलैंड और यूरोप के बीच उठापटक के बीच ट्रंप ने भारत को लेकर भी बड़ा संकेत दिया. दावोस में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वह उनके अच्छे दोस्त हैं और भारत-अमेरिका के बीच “एक अच्छी डील” की उम्मीद है. इस बयान को भारत में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. दोनों देशों के बीच मिशन 500 के तहत 2030 तक व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. लंबे समय से चल रहे टैरिफ विवाद और बातचीत के बीच ट्रंप का यह बयान कूटनीतिक नरमी का संकेत माना जा रहा है.

शेयर बाजार पर असर

ट्रंप के बयानों का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिख सकता है. खासकर वे सेक्टर, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी निर्यात से आता है—जैसे टेक्सटाइल, फार्मा और झींगा फीड निर्यात फिर से निवेशकों की नजर में आ गए हैं. टेक्सटाइल कंपनियां जैसे Gokaldas Exports, Welspun Living और Pearl Global, जिनकी 50–70% कमाई अमेरिका से जुड़ी है, टैरिफ नीति में किसी भी बदलाव से सीधे प्रभावित होती हैं. ऐसे में ट्रंप का यू-टर्न सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक मायनों में भी बेहद अहम माना जा रहा है.

दबाव, सौदे और अचानक मोड़

कुल मिलाकर ट्रंप का यह फैसला एक बार फिर दिखाता है कि उनकी विदेश नीति दबाव और सौदेबाजी के इर्द-गिर्द घूमती है. पहले धमकी, फिर बातचीत और आखिर में यू-टर्न—यह ट्रंप की परिचित रणनीति बन चुकी है. अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि NATO के साथ बताए गए “फ्रेमवर्क” की असल शर्तें क्या हैं और क्या ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का रुख फिर बदलेगा. फिलहाल, इतना तय है कि इस फैसले ने वैश्विक राजनीति में नई अनिश्चितता और नई संभावनाएं दोनों खोल दी हैं.

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