'मोदी जी के रास्ते' चलकर चुनाव जीते तारीक रहमान, ‘मुझे सर नहीं, भाई कहो’ की रणनीति बनी गेमचेंजर
बांग्लादेश में तारीक रहमान की चुनावी जीत को 'मोदी और बराक ओबामा स्टाइल चुनावी कैंपेन' से जोड़कर देख जा रहा है. लोगों से सीधे बातचीत, राष्ट्रवाद, वेलफेयर नैरेटिव और डिजिटल रणनीति ने मुकाबले का रुख बदला और दो तिहाई बहुमत से बीएनपी को जीत मिल गई.;
बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से दो बड़े ध्रुवों (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और अवामी लीग) के बीच घूमती रही है. ऐसे में जब तारीक रहमान की चुनावी रणनीति ने 'विकास, मजबूत नेतृत्व और राष्ट्रीय गौरव' की पिच पर जोर दिया, तो तुलना भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मॉडल से होने लगी. हालांकि, दोनों देशों का राजनीतिक-सामाजिक ढांचा अलग है, लेकिन चुनावी कैंपेन की भाषा और स्टाइल में समानताएं दिखीं. व्यक्तित्व-आधारित प्रचार, मजबूत नैरेटिव और जमीनी संगठन का माइक्रो मैनेजमेंट लगभग वही था, जो पीएम मोदी के चुनावी कैंपेन में दिखता है.
1. चाय पर बातचीत - मतदाता से सीधे संवाद क्यों?
तारीक रहमान ने इस रणनीति पर काम करते हुए सबसे पहले नरेंद्र मोदी की सफल “चाय पे चर्चा” से प्रेरित होकर 'चाय अड्डा' (चाय पर बातचीत) का आयोजन किया. तारिक रहमान की बेटी, जैमा रहमान का आइडिया था कि इन जमावड़ों का मकसद देश भर में खासकर युवाओं के साथ इनफॉर्मल बातचीत करना था. ताकि उनका फीडबैक और इनपुट इकट्ठा किया जा सके.
नरेंद्र मोदी का 'चाय पे चर्चा' कैंपेन 2014 में उनकी बड़ी जीत में बहुत कामयाब रहा, जिसकी शुरुआत कांग्रेस लीडर मणिशंकर अय्यर के मोदी को चायवाला कहने के मजाक से हुई थी. हालांकि 'चाय अड्डा' किसी ऐसे ही मजाक से नहीं निकला था, फिर भी तारिक रहमान को अपने पॉलिटिकल विरोधियों से चुनावी कैंपेन के दौरान बाहरी और नौसिखिया होने की बुराई का सामना करना पड़ा.
मुहिम के तहत उन्होंने अपने भाषणों में राष्ट्रीय अस्मिता और देश की आर्थिक मजबूती को केंद्र में रखा. यह वही फ्रेम है जिसमें मोदी ने 'न्यू इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत की बात की थी. इस नैरेटिव ने जमात ए इस्लामी पार्टी को को डिफेंसिव मोड में ले आया.
2. क्यों किया इमेज मेकओवर और इनफॉर्मल लीडरशिप ब्रांडिंग?
चुनाव प्रचार के रणनीति के तहत उन्होंने दूसरा ट्रिक यह अपनाया कि खुद को रिलैक्स्ड, इनफॉर्मल लीडर के तौर पर पेश किया. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने खुद को एक आम इंसान की तरह दिखाया. ताकि किसी को उन्हें देखकर हीन भावना का अहसास न हो. ऐसा उन्होंने इसलिए किया कि उनके विरोधी उन्हें एक हकदार वारिस के तौर पर दिखाना चाहते थे जो देश से दूर रहा और अचानक पावर के लिए वापस आ गया.
तारिक का अपने एडवाइजर और कैंपेन मैनेजर को दिया गया ब्रीफ साफ था, उन्हें जेनरेशन Z को अपील करने की जरूरत है. ऐसा करना उनके लिए इसलिए जरूरी था कि बांग्लादेश में इस बार 40 मिलियन पहली बार वोट देने वाले युवा वोटरों के साथ, BNP ने उनका सपोर्ट मांगा.
इसलिए, पार्टी ने “मुझे सर मत कहो, मुझे भाई कहो” लाइन शुरू की, जो राहुल गांधी की स्टूडेंट्स के साथ बातचीत के दौरान की गई ऐसी ही रिक्वेस्ट की याद दिलाती है.
दरअसल, तारिक रहमान को एक रिलैक्स्ड, इनफॉर्मल लीडर के तौर पर दिखाना था, जिसमें किसी हक की भावना न हो. यह बहुत जरूरी था, क्योंकि उनके विरोधी उन्हें एक हकदार वारिस के तौर पर दिखाना चाहते थे जो देश से दूर रहा और अचानक पावर के लिए वापस आ गया. तारिक का अपने एडवाइजर और कैंपेन मैनेजर को दिया गया ब्रीफ साफ था, आपको जेनरेशन Z से सीधे संवाद स्थापित करना है और उससे बदलाव की अपील की बात करनी है. वहां पर इस बार करीब 40 मिलियन युवा मतदाताओं ने पहली बार वोट की है.
रहमान ने युवा मतदाताओं से खुलकर साथ देने की अपील की. इस असर उनके चुनावी कैंपेन पर भी दिखा. वो जनसभा को संबोधित करते हुए लोगों से यह जरूरत कहते थे कि, “मुझे सर मत कहो, मुझे भाई कहो.” कई जनसभाओं की शुरुआत भी उन्होंने इसी लाइन से की, जो पीएम मोदी के भाषण की याद दिलाता है कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है, मैं आपका बेटा हूं.
3 . “हां, हम कर सकते हैं” का नारा क्यों दिया?
तारीक रहमान की मां खालिदा जिया देश की पूर्व पीएम थीं. उस समय रहमान को डार्क प्रिंस के नाम से जाना जाता था. उन्हें पता है कि बांग्लादेश के सामने कई चुनौतियों हैं. इसके लिए उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का चुनावी कैंपेन की, “हां, हम कर सकते हैं” को सियासी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया. सोशल मीडिया में इस पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया. उन्होंने इस रणनीति के तहत युवाओं के बीच एक प्लान और ब्लूप्रिंट पेश किया. इसके लिए पोस्टर और सोशल मीडिया पोस्ट का सहारा लिया. इसकी टैगलाइन “मेरे पास एक प्लान है” टैगलाइन दी थी.
इस योजना के तहत उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में रील बनाने के कॉम्पिटिशन भी आयोजित किए. देश में YouTubers और कंटेंट क्रिएटर्स की बढ़ती संख्या को जोड़ने के लिए, लोगों को आइडिया और सुझावों के साथ रील बनाने के लिए बुलाया गया. विजेताओं को इनाम दिया गया और उनकी रील दिखाई गईं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इसके लिए प्रेरणा के लिए भारत में मुख्य राजनीतिक पार्टियों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कड़ी नजर रखी जा रही थी.
बांग्लादेश में तारीक रहमान की जीत सिर्फ एक व्यक्ति की वापसी नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के नए प्रयोग की कहानी भी है. राष्ट्रवाद की भाषा, विकास का वादा और डिजिटल मैनेजमेंट की ट्रिक्स ने वहां के चुनावी गणित को बदल दिया.