Mullahs Must Leave: क्या लद गए है खामनेई के दिन- ईरान की धरती में ‘मुल्ला देश छोड़ो’ आंदोलन क्यों?
'मुल्ला देश छोड़ो’ आंदोलन ने ईरान की सत्ता को हिला कर रख दिया है? यह आंदोलन महंगाई, बेरोजगारी, सख्त इस्लामिक कानून व अन्य वजहों से शुरू हुआ है. जानिए यह विरोध पहले के आंदोलनों से कैसे अलग है, ईरान में जन-आंदोलनों का इतिहास क्या है? इस बार लोग सत्ता परिवर्तन की मांग क्यों कर रहे है? इजरायल और अमेरिका से तनातनी के बीच इस आंदोलन का संभावित राजनीतिक असर क्या हो सकता है?;
ईरान में उभरा ‘मुल्ला देश छोड़ो’ आंदोलन सिर्फ एक और विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस इस्लामिक गणराज्य की वैचारिक नींव पर सीधा हमला है, जिसे अयातुल्ला अली खामनेई पिछले तीन दशकों से संभाले हुए हैं. जहां 2009 का ग्रीन मूवमेंट चुनावी पारदर्शिता तक सीमित था और 2022 का महसा अमीनी आंदोलन सामाजिक-सांस्कृतिक आजादी की मांग पर केंद्रित रहा. वहीं ‘मुल्ला देश छोड़ो’ आंदोलन सीधे सत्ता, धर्म और शासन के गठजोड़ को चुनौती दे रहा है.
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यह पहली बार है जब ईरान की सड़कों पर आर्थिक संकट, सामाजिक असंतोष और राजनीतिक विद्रोह एक साथ फूट पड़े हैं. प्रदर्शनकारियों के नारे अब सुधार नहीं, बल्कि पूरे धार्मिक-राजनीतिक ढांचे को हटाने की मांग कर रहे हैं. यही वजह है कि यह आंदोलन खामनेई शासन के लिए अब तक की सबसे गंभीर चुनौती माना जा रहा है. यह एक ऐसा विद्रोह, जो पहले के सभी आंदोलनों की सीख और गुस्से को समेटे हुए है.
इससे पहले साल 2022 में इस्लामिक सख्त कानूनों के खिलाफ महसा अमीनी आंदोलन (महिलाओं का विद्रोह) के बाद एक बार ईरान में धार्मिक नेता अयातुल्ला खामनेई के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं. तीन साल पहले भी वहां की महिलाओं ने खामनेई और उसकी पुलिस के खिलाफ महिलाओं ने बिगुल फूंका था, इस बार भी 'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन की अगुवा वही हैं. ईरान में यह आंदोलन 2025 के अंत से शुरू हुआ था. अब 2026 में एक बड़े जन आंदोलन में तब्दील हो चुका है. यह विरोध सतही रूप से सिर्फ अर्थव्यवस्था और महंगाई के विरोध में शुरू हुआ, लेकिन जल्दी ही इकठ्ठा राजनीतिक आक्रोश बन गया है, जिसमें लोग देश की धार्मिक-राजनीतिक शासन व्यवस्था खासकर अयातुल्ला अली खामनेई के नेतृत्व वाली दारुल उलूम (मुल्ला शासन) से छुटकारा चाहते हैं.
'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका है. मुल्ला यानी धार्मिक नेता खामनेई के विरोध में ईरान की बाजारें बंद हैं. व्यापारियों और छात्रों ने विरोध में सड़कों पर उतरकर नारे लगा रहे हैं. यूनिवर्सिटी और कॉलेज कैंपसों से लेकर सड़क तक महिलाएं, छात्र और वहां लोग सड़क पर उतर आए हैं. कई शहरों में हिंसा और मौतें भी हुई हैं. अभी तक 17 लोगों की मारे जाने की सूचना है. जानें क्या है 'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन.
क्या है “मुल्ला देश छोड़ो आंदोलन”?
'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन व्यापक विरोध प्रदर्शन है. इसमें आम ईरानी व्यापारी, छात्र, मजदूर महिला, और युवा शामिल हैं. लोग अब केवल मर्यादित आर्थिक मांगों से आगे बढ़कर राजनीतिक परिवर्तन और मौजूदा धार्मिक-राजनीतिक शासन के अंत की मांग कर रहे हैं. मूल रूप से यह आंदोलन तब शुरू हुआ जब महंगाई, रुपया गिरना, बेरोजगारी और आर्थिक संकट ने आम आदमी की रोजमर्रा जिंदगी को असहनीय बना दिया?. अब प्रदर्शनकारियों के नारों में “मुल्ला देश छोड़ो!” और “तानाशाह मुर्दाबाद!” जैसे नारे शामिल हैं, जो सीधे उच्च नेतृत्व और दारुल उलूम शासन के खिलाफ हैं.
ईरान में क्यों फैला यह आंदोलन?
1. गहरी आर्थिक गिरावट
ईरान की मुद्रा रियाल के अचानक गिरने, तेज महंगाई (40%+) और रोजमर्रा के सामान की बढ़ती कीमतों ने लोगों को बेहद परेशान किया है.
2. राजनीतिक असंतोष
आंदोलन अब सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहा. प्रदर्शनकारी शासन की राजनीतिक संरचना, भ्रष्टाचार और अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदियों के खिलाफ भी आवाज उठा रहे हैं.
3. सांस्कृतिक उभार
साल 2022 की महसा अमीनी प्रदर्शनों से एक बड़ा सामाजिक चेतना पूर्वाग्रह दिखा था, जिसमें महिलाओं और युवाओं ने शासन के कुछ नियमों को भी चुनौती दी थी.
4. आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें
- मुल्लाओं और मौजूदा शासन की सत्ता से हटाना
- वित्तीय और सामाजिक आर्थिक सुधार
- अंतरिम लोकतांत्रिक प्रशासन
- व्यापक नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक आजादी
- महिलाओं को बुर्के से आजादी
- देश के नागरिकों के अहम अधिकारों की आजादी
- इस्लामिक कानूनों में संशोधन
5. आंदोलन का इतिहास
ईरान में विरोध की लंबी परंपरा है. साल 2021 से लेकर 2022 में महसा अमीनी विरोध ने व्यापक जनभागीदारी देखी थी, जो अब तक जारी विरोधों का आधार बन गई है. वर्तमान आंदोलन 28 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ और 2026 में फैलते हुए देश के बड़े हिस्सों में पहुंच गया है.
6. अब तक क्या हुआ?
हाल के प्रोटेस्ट की रिपोर्टों के मुताबिक आर्थिक संकट के खिलाफ सैकड़ों प्रदर्शन हुए हैं. कम से कम 17 लोगों की मौतें हुई हैं. सरकारी आंकड़ों और स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक आंदोलन में प्रदर्शनकारी और सुरक्षा कर्मी दोनों शामिल हैं. काफी संख्या में आंदोलनकारी गिरफ्तार किए गए हैं. कई शहरों में शिक्षा और व्यापार पूरी तरह से ठप है.
ईरान में कब-कब हुए बड़े प्रदर्शन?
1. 2009 - ग्रीन मूवमेंट
राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप के खिलाफ हुए थे. तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद और सर्वोच्च नेता खामनेई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आये थे. उस समय लोगों ने “Where is my vote? के नारे लगाए थे. इसे दबाने के लिए सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं और कई नागरिकों ने अपनी जानें गंवाई थी. यह पहली बार था जब धार्मिक सत्ता के खिलाफ खुला शहरी विद्रोह दिखा था.
2. 2017- 18 आर्थिक बदहाली के खिलाफ विद्रोह
यह विद्रोह ईरान में महंगाई, बेरोजगारी और सब्सिडी खत्म लोगों ने की थी. खास बात यह है कि इस प्रदर्शन में छोटे शहरों और गरीब तबके के लोगों ने भी शिरकत की थी. इस विद्रोह के नारे “तानाशाह मुर्दाबाद”, “गाजा नहीं, लेबनान नहीं, जान मेरी ईरान है” था. यहीं से विरोध आर्थिक से राजनीतिक बना.
3. नवंबर 2019 - पेट्रोल दाम विरोध
ईरान में पेट्रोल की कीमतों में अचानक भारी बढ़ोतरी की वजह से प्रोटेस्ट शुरू हुआ था. सरकार ने इसे दबाने के लिए इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था. 300 से ज्यादा लोगों की मौतें हुई थीं. इसे ईरान का सबसे खून खराबा प्रदर्शन माना जाता है.
4. 2022 - महसा अमीनी आंदोलन (महिलाओं का विद्रोह)
साल 2022 में ईरान की महिलाओं ने हिजाब पुलिस हिरासत में महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुई थी. महिलाओं ने “Woman, Life, Freedom” के नारे लगाए थे, जो दुनिया भर में सुर्खियों में रहा. इस आंदोलन में महिलाएं, युवा और छात्र सड़कों पर उतरे थे. सैकड़ों मौतें हुईं और हजारों गिरफ्तार किए गए. इस आंदोलन ने धार्मिक नियंत्रण और इस्लामिक नियमों को सीधी चुनौती दी थी.
5. 2023-24 मजदूर और शिक्षक आंदोलन
ईरान में मजदूर और शिक्षकों ने वेतन न मिलने और पेंशन में कटौती पर ये आंदोलन शुरू किया था. यह प्रोटेस्ट शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ था, जो बाद में लगातार विरोध हिंसक हो गया था. उसने ईरान में सामाजिक असंतोष को जिंदा रखा.
6. 'मुल्ला देश छोड़ो' पहले के आंदोलन से अलग कैसे?
'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन ने पहली बार सीधे धार्मिक सत्ता (मुल्ला शासन) को हटाने की मांग की है. नारे सिर्फ सुधार नहीं, पूरे सिस्टम के अंत की बात करते हैं. 2009 से 2022 तक के सभी आंदोलनों की सामूहिक परिणति दमन से हुआ.
दरअसल, ईरान में विरोध नया नहीं है, लेकिन “मुल्ला देश छोड़ो” आंदोलन पहले सभी आंदोलनों से ज्यादा खतरनाक और निर्णायक माना जा रहा है. क्योंकि अब सवाल महंगाई या हिजाब का नहीं, शासन की वैधता का भी है.