IRGC और बासिज के रहते नहीं जाएगी ख़ामेनेई की सत्ता, दोनों को क्यों कहा जाता है ईरान का अभेद्य किला?
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन तेज़ हो रहे हैं, लेकिन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनई की सत्ता अब भी मजबूत बनी हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह हैं Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) और उसका अर्धसैनिक नेटवर्क Basij. ये सिर्फ सुरक्षा बल नहीं, बल्कि ईरानी सत्ता तंत्र की रीढ़ हैं. जहां बंदूक, खुफिया तंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक निगरानी एक ही ढांचे में समाहित हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह सुरक्षा ढांचा नहीं टूटता, ईरान में सत्ता परिवर्तन लगभग असंभव बना रहेगा.;
ईरान में एक बार फिर सत्ता के खिलाफ जनाक्रोश उफान पर है. युवा, छात्र और महिलाएं खुलकर सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनई की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं. नारे सरकार गिराने तक पहुंच चुके हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि ईरान में सड़कों का गुस्सा अक्सर सत्ता की दीवार से टकराकर बिखर जाता है. इसकी वजह सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा तंत्र है जिसे ‘अभेद्य किला’ कहा जाता है. इस किले की नींव हैं IRGC और बासिज.
Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC को सिर्फ सेना समझना सबसे बड़ी भूल होगी. यह एक ऐसा समानांतर सत्ता ढांचा है, जिसके पास सैन्य ताकत के साथ-साथ खुफिया नेटवर्क, साइबर यूनिट और विदेशों में सक्रिय ऑपरेशन विंग मौजूद हैं. तेल, कंस्ट्रक्शन, पोर्ट, टेलीकॉम और बड़े कारोबारी प्रोजेक्ट्स में IRGC की गहरी पकड़ है. यानी बंदूक और बजट दोनों एक ही हाथ में हैं.
सुप्रीम लीडर से सीधी वफादारी
IRGC की सबसे बड़ी ताकत उसकी जवाबदेही है. यह राष्ट्रपति, संसद या किसी चुनी हुई संस्था को नहीं, बल्कि सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करता है. सरकार बदले, चेहरे बदलें लेकिन IRGC का ढांचा जस का तस रहता है. यही वजह है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन चुनाव या आंदोलन से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को तोड़े बिना संभव नहीं दिखता.
बासिज: समाज के भीतर छिपा डर का नेटवर्क
अगर IRGC सत्ता की तलवार है, तो Basij उसका साया है. बासिज कोई सीमित मिलिशिया नहीं, बल्कि समाज के भीतर बुना गया नेटवर्क है. पड़ोसी, सहकर्मी, दुकानदार या क्लासमेट कोई भी बासिज का हिस्सा हो सकता है. मुखबिरी यहां अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा है.
विरोध सरकार से नहीं, समाज से भी
ईरान में प्रदर्शनकारी सिर्फ पुलिस या सेना से नहीं भिड़ते, बल्कि अपने ही समाज से टकराते हैं. बासिज की मौजूदगी विरोध को तुरंत “खतरनाक” बना देती है. गोली चलाने, गिरफ्तार करने या हिंसा के लिए अक्सर लंबी कानूनी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती. यही डर आंदोलन को जड़ जमाने से पहले ही कमजोर कर देता है.
शरीर से पहले दिमाग तोड़ो
ईरानी सत्ता विरोध को सिर्फ बल से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीके से कुचलती है. लंबी पूछताछ, अकेला सेल, वर्षों की जेल और लगातार मानसिक प्रताड़ना यह सब रणनीति का हिस्सा है. मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को भीतर से तोड़ देना होता है. यही वजह है कि कई लोग ‘जिंदा रहकर भी खत्म’ हो जाते हैं.
जेल के बाद समाज से भी बाहर
जो लोग सालों बाद जेल से बाहर आते हैं, उनका संघर्ष खत्म नहीं होता. पड़ोसी दूरी बना लेते हैं, दोस्त डर जाते हैं, रिश्ते टूट जाते हैं. नौकरी, शादी और सामाजिक जीवन सब पर अदृश्य पाबंदी लग जाती है. यानी सजा सिर्फ व्यक्ति को नहीं, उसके पूरे भविष्य को दी जाती है.
अभेद्य किला क्यों नहीं टूटता?
ईरान में आंदोलन इसलिए फेल होते हैं क्योंकि कोई उभरता नेतृत्व बनने से पहले ही खत्म कर दिया जाता है. इंटरनेट ब्लैकआउट, सूचना नियंत्रण और सुरक्षा बलों की पूर्ण वफादारी सत्ता को बचाए रखती है. बाहरी दबाव या प्रतिबंध भी अक्सर शासन को कमजोर करने की बजाय “देश बनाम दुश्मन” की कहानी मजबूत कर देते हैं. जब तक IRGC नहीं टूटता, बासिज का सामाजिक नेटवर्क नहीं दरकता और सुरक्षा बलों में दरार नहीं पड़ती—तब तक ख़ामेनई की सत्ता एक अभेद्य किला बनी रहेगी.