Iran Israel War: युद्ध लड़ना भूल जाएगा अमेरिका, दुनिया के 'काका' ट्रंप ईरान में ऐसे हुए शिकार, कहां से लाओगे 90 लाख फौजी?

ईरान-इज़राइल जंग में अमेरिका की भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. एक्सपर्ट का दावा है कि ट्रंप की रणनीति उलटी पड़ गई और अब वही इस संघर्ष में फंसते नजर आ रहे हैं.

अमेरिका द्वारा इज़राइल और ईरान को खूनी संघर्ष में धकेले जाने के बाद एक महीना बीत चुका है. खुद को महाशक्ति कहने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब ईरान के कड़े रुख के सामने दबाव में नजर आ रहे हैं. अपने घर में अपनों से चौतरफा घिरे ट्रंप सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर बार-बार खुद ही “युद्ध-विराम” की घोषणा कर डाल रहे हैं. जबकि ईरान, ट्रंप की इन तमाम हवाई घोषणाओं को कोई तवज्जहो ही नहीं दे रहा है.

बल्कि ट्रंप की घोषणाओं-घुड़कियों से डरने की बजाए ईरान ने अब जंग रोकने के लिए घिघियाते-मिमियाते मक्कार ट्रंप को संदेश दे दिया है कि, “लड़ाई तुमने शुरू की, जंग को खत्म मगर हम अपने मन-मुताबिक करेंगे.” ईरान की इस दो टूक खरी-खरी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की थोड़ी-बहुत बची खुली इज्जत पर भी बेइज्जती की गरम राख फेंककर उन्हें और ज्यादा चिढ़ा डाला है. उधर इजराइल की पीठ पर सवार होकर ईरान से वाहियाती जबरन “अघोषित जंग” लड़ रहे ट्रंप के खिलाफ अमेरिका के ही कई राज्यों में विरोध प्रदर्शनों ने भी ट्रंप की रातों की नींद और दिन का चैन खा लिया है.

ऐसे में घर बैठे-बिठाए ईरान से मोर्चाबंदी करके अब चौतरफा बुरी तरह से फंस चुके ट्रंप की समझ में नहीं आ रहा है कि जिस जंग को उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए शुरू तो करवा डाला. उस जंग को मगर ईरान किसी भी नुकसान के बाद भी खत्म न करने की जिद पर अड़ा पड़ा है. तो ऐसे में अब जंग से बढ़कर और वह दूसरा कौन सा रास्ता बाकी बचा है जिससे ईरान ट्रंप से डरकर जंग को विराम दे सके. विदेश नीति, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय सैन्य-सुरक्षा संबंधों और जियोपॉलिटिक्स से जुड़े इन्हीं तमाम सवालों के माकूल जवाब हासिल करने के लिए नई दिल्ली में मौजूद “स्टेट मिरर हिंदी” के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान ने एक्सक्लूसिव बात की जसिंदर सिंह सोढ़ी से.

ईरान इजराइल से ज्यादा ट्रंप क्यों फंसे?

जेएस सोढ़ी भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल और इन तमाम अंतरराष्ट्रीय गूढ़ विषयों पर अपनी पैनी पकड़ रखते हैं. जेएस सोढ़ी ने कहा, “ट्रंप ने जब अपने स्वार्थ और ईरान के नुकसान के लिए इजराइल और ईरान को 28 फरवरी 2026 को यानी अब से करीब 31-32 दिन पहले जंग में आमने-सामने ला खड़ा किया, तब सोचा भी नहीं होगा कि यह लड़ाई लड़ने वाले ईरान इजराइल से ज्यादा भारी अमेरिका को पड़ेगी. मेरे लंबे फौजी अनुभव से ट्रंप के लिए यह सबक ईरान की ओर से मिलना जरूरी था. न केवल अमेरिका के लिए बतौर सबूत यह जंग जरूरी थी. अपितु विश्व के वे देश जो खुद को दादा बनाने के चक्कर में दूसरे देशों में लड़ाई करवा डालते हैं, उन सब देशों को लिए भी एक सबक है.”

अमेरिका की गलतफहमियां दूर होंगी

अपनी बात जारी रखते हुए सोढ़ी कहते हैं, “अमेरिका और उसके मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सोचते हैं कि उनके सामने ताकत में सब बौने हैं. वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आधी रात महल के अंदर से सोते हुए अपहरण कर लाने के बाद तो मानो अमेरिका और ट्रंप आसमान में ही उड़ने लगे थे. संभव है कि उसकी बेतुकी सफलता ट्रंप को नहीं पची हो. और उन्होंने अति के आत्म-विश्वास में फंसकर चंद दिन बाद ही इजराइल को जबरन ही ईरान से भिड़ा दिया. सिर्फ इस उम्मीद में कि अमेरिकी सपोर्ट से इजराइल के हाथों ईरान कमजोर हो जाएगा. उसके सुप्रीम लीडर (अयातुल्लाह अली खामेनेई) का खात्मा करके अमेरिका दुनिया का दादा और ईरान का ब़ॉस बन जाएगा. अब जब ईरान अपने टॉप कमांडर्स की जिंदगी गंवाने के बाद भी नहीं झुका जिसकी उम्मीद में अमेरिका ने इजराइल को ईरान से जंग में भिड़ा डाला था, तो ट्रंप और अमेरिका की ही हालत खराब होना लाजिमी था, जो हो भी रही है. यह ट्रंप के साथ होना जरूरी भी था. ताकि उनकी तमाम गुंडा टाइप गलतफहमियां दूर हो सकें.”

शिकारी कैसे शिकार हो गया...?

ट्रंप बार-बार अपने आप ही अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर ईरान-इजराइल की जंग खत्म होने की संभावनाओं की फर्जी खबरें क्यों सर्कुलेट करते रहते हैं? कोई खास मकसद इसका? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “दरअसल इजराइल और ईरान के बीच शुरू कराई जंग में अमेरिका या उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चले तो थे ईरान का शिकार करने. मगर ईरान ने इजराइल की आड़ लेकर अमेरिका और उसके राष्ट्रपति का ही शिकार कर डाला है. ऐसा नहीं है कि मैं यह कोई एक्सक्लूसिव बता रहा हूं. जमाना अपनी आंखों से देख रहा है कि जिस इजराइल ईरान के बीच छिड़ी जंग को लेकर ट्रंप का अपने ही घर में विरोध होने लगा हो.

वह भी तब जब अमेरिका में अक्टूबर-नवंबर 2026 में ट्रंप का राजनीतिक भविष्य तय करने वाले चुनाव सिर पर आ खड़े हुए हों. ऐसे में ट्रंप अब खुद की खुद ही खाल बचाने की नाकाम कोशिशों में और कर भी क्या सकते हैं सिवाय अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर ईरान से जंग खत्म होने की ऊल-जुलूल मनगढ़ंत खबरें प्रसारित प्रचारित करने के. दरअसल इस बार ईरान से भिड़ने के फेर में ट्रंप साहब अपना ही सिर फुड़वाए बैठे हैं. जोकि चंद महीने बाद अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव में कहीं ट्रंप के लिए ही राजनीतिक बवाल-ए-जान न बन जाए.”

ईरान कैसे बना ट्रंप के गले की फांस?

बकौल ले. कर्नल सोढ़ी, “मुझे तो पूरी पूरी संभावना है कि ईरान का न झुकना और बार बार ट्रंप का ईरान के आगे युद्ध-विराम के लिए कभी गिड़गिड़ाना और कभी ईरान को धमकाना. ट्रंप की बौखलाहट को समझने के लिए काफी है. इतना ही नहीं ट्रंप सोच रहे थे कि वह अमेरिकी फौजियों को ईरान की जमीन पर उतारने की बात कहकर ईरान को डरा देंगे. यह करते सोचते वक्त ट्रंप भूल गए कि ईरान को जमीन पर लड़कर हराने की कुव्वत अकेले अमेरिका की कभी नहीं होगी. क्योंकि एक तरफ समुद्र और बाकी तीन ओर डराती ऊंचाई वाली पहाड़ियों के बीच मौजूद ईरान की जमीन तक पहुंचने में ही अमेरिकी सैनिकों को जान बचाने के लाले पड़ जाएंगे. ईरान को उसकी जमीन पर जाकर अमेरिकी सैनिकों द्वारा लड़ाई लड़कर जीत हासिल करने का सपना तो अमेरिका का आसमानी ही है. दूसरे फौज के युद्ध नियम कायदे-कानून के हिसाब से ट्रंप यानी अमेरिकी फौज को ईरान से जमीनी जंग लड़ने के लिए 90 लाख सैनिकों की जरूरत होगी. जबकि अमेरिका की फौज ही 9-10 लाख है.”

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