बांग्लादेश में क्या चल रहा है? चुनाव से पहले इस्लामिस्टों को ‘दोस्त’ बना रहा अमेरिका? भारत के लिए क्यों है यह बड़ा खतरा

फरवरी 2026 के बांग्लादेश चुनाव से पहले अमेरिका का कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से बढ़ता संवाद सामने आया है. अवामी लीग के कमजोर पड़ने से भारत के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा और रिश्तों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.;

( Image Source:  Sora AI )
Edited By :  प्रवीण सिंह
Updated On : 24 Jan 2026 4:00 AM IST

बांग्लादेश में फरवरी 2026 में चुनाव होने वाले हैं. लेकिन चुनाव से पहले ही वहां हालात काफी बिगड़े हुए हैं. इसी बीच एक ऐसी खबर आई है, जिसने भारत की चिंता बढ़ा दी है. खबर यह है कि अमेरिका अब बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामिस्ट पार्टी जमात-ए-इस्लामी के करीब जाता दिख रहा है. वही जमात, जिसने 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी का विरोध किया था और जिसे भारत-विरोधी पार्टी माना जाता है.

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को उजागर करते हुए दावा किया है कि बांग्लादेश में अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों ने हाल ही में सिलहट में जमात-ए-इस्लामी के क्षेत्रीय कार्यालय में पार्टी नेताओं से मुलाकात की. रिपोर्ट के मुताबिक, एक अमेरिकी राजनयिक ने स्थानीय पत्रकारों से बातचीत में यहां तक कहा - “We want them to be our friends.” यानी, हम उन्हें अपना दोस्त बनाना चाहते हैं. यह बयान ऐसे समय आया है, जब बांग्लादेश की राजनीति उथल-पुथल से गुजर रही है, अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा है और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं.

अमेरिकी दूतावास की सफाई, लेकिन सवाल बरकरार

टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी दूतावास ने इस आरोप को खारिज किया है कि अमेरिका किसी खास पार्टी का समर्थन कर रहा है. ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शिए के हवाले से कहा गया कि दिसंबर में हुई बातचीत एक “रुटीन, ऑफ-द-रिकॉर्ड” चर्चा थी, जिसमें कई राजनीतिक दलों का जिक्र हुआ. उनका कहना था कि अमेरिका बांग्लादेश में जिस भी सरकार को जनता चुनेगी, उसके साथ काम करेगा. लेकिन सवाल यह है कि अगर यह महज एक सामान्य बातचीत थी, तो फिर बार-बार और लगातार सिर्फ जमात-ए-इस्लामी से ही संपर्क क्यों?

जमात से अमेरिकी ‘एंगेजमेंट’ कैसे बढ़ता गया

असल कहानी 2023 से शुरू होती है. उस साल, जब शेख हसीना सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे, तभी एक अमेरिकी राजनयिक ने ढाका में जमात के एक वरिष्ठ नेता से मुलाकात की. इसके बाद 2025 में यह संपर्क तेजी से बढ़ा.

  • मार्च 2025: दो पूर्व अमेरिकी राजदूत जमात के मुख्यालय पहुंचे
  • जून 2025: जमात को अमेरिकी दूतावास में बुलाकर आंतरिक शासन, महिला और अल्पसंख्यक अधिकारों पर चर्चा
  • जुलाई 2025: चार्जे डी’अफेयर्स ट्रेसी ऐन जैकबसन ने जमात प्रमुख शफीकुर रहमान से औपचारिक मुलाकात की
  • सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि नवंबर 2025 में अमेरिका ने शफीकुर रहमान को वीज़ा भी दे दिया - जबकि उनका रिकॉर्ड बेहद विवादास्पद रहा है.

कट्टर बयान, हमास समर्थन और फिर भी अमेरिकी वीज़ा

शफीकुर रहमान पर पहले भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं. उन्होंने हमास नेता याह्या सिनवार की सार्वजनिक रूप से तारीफ की थी और कई मौकों पर यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिक) बयान दिए हैं. इसके बावजूद अमेरिका का उन्हें वीज़ा देना यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन बांग्लादेश चुनाव से पहले इस्लामिस्ट ताकतों को नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें ‘स्टेकहोल्डर’ के तौर पर देख रहा है. यहीं से भारत की चिंता शुरू होती है.

भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों?

बांग्लादेश की राजनीति में इस वक्त अवामी लीग पूरी तरह हाशिये पर है - जो अब तक भारत की सबसे भरोसेमंद सहयोगी पार्टी रही है. शेख हसीना भारत में हैं और उनकी पार्टी पर प्रतिबंध है. ऐसे में 2026 के चुनाव में तीन ताकतें उभरती दिख रही हैं - बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP), जमात-ए-इस्लामी (JI) और नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) – 2024 के छात्र आंदोलन से निकली नई पार्टी. तीनों का रुख भारत के प्रति या तो ठंडा है या खुलकर विरोधी है.

अगर जमात जीतती है तो भारत के लिए क्या मतलब?

जमात-ए-इस्लामी का सत्ता में आना भारत के लिए सबसे खराब परिदृश्य माना जा रहा है. पार्टी 1971 के मुक्ति संग्राम की विरोधी रही है. इसकी विचारधारा कट्टर इस्लामिस्ट और भारत-विरोधी है. जमात चीन और पाकिस्तान के साथ रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर साझेदारी बढ़ा सकती है. पार्टी का छात्र संगठन 2025 में ढाका यूनिवर्सिटी चुनाव जीत चुका है, जो इसकी जमीनी ताकत दिखाता है. इसके अलावा, जमात के सत्ता में आने से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ने की आशंका भी है - जिसके संकेत हाल के महीनों में मिल चुके हैं.

BNP की जीत: ठंडे रिश्ते, लेकिन व्यवहारिकता?

BNP की जीत भारत के लिए थोड़ा कम खतरनाक लेकिन आसान भी नहीं होगी. पार्टी “Bangladeshi Nationalism” और “India Out” जैसे नारों का इस्तेमाल कर रही है. फिर भी BNP ने अतीत में भारत के साथ व्यवहारिक रिश्ते रखे हैं. हाल में PM मोदी के संदेश पर खालिदा जिया के स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया भी दी गई. यानी BNP सत्ता में आई तो रिश्ते ठंडे रहेंगे, लेकिन पूरी तरह टूटेंगे नहीं.

NCP: युवा चेहरा, लेकिन भारत से दूरी

नेशनल सिटीजन पार्टी 2024 के छात्र आंदोलन से निकली है और इसके नेता नाहिद इस्लाम जैसे युवा चेहरे हैं, जो शेख हसीना विरोधी आंदोलन में आगे थे. हालांकि NCP को ‘रिफॉर्मिस्ट’ कहा जाता है, लेकिन भारत के साथ इसके रिश्ते अब तक और ज्यादा खराब हुए हैं. पार्टी का रुख राष्ट्रवाद और विदेशी दखल के खिलाफ सख्त है—जिसमें भारत भी निशाने पर है.

शेख हसीना फैक्टर: रिश्तों में और जहर

बांग्लादेश लगातार शेख हसीना को भारत से वापस भेजने की मांग कर रहा है. इस मुद्दे पर दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़े हैं. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि हाल ही में दोनों देशों ने सुरक्षा कारणों से वीज़ा सेवाएं अस्थायी रूप से रोक दीं. इस बीच, शेख हसीना भारत से लगातार अंतरिम सरकार और मोहम्मद यूनुस पर तीखे हमले कर रही हैं. उनका आरोप है कि अंतरिम सरकार ने कट्टरपंथियों को बढ़ावा दिया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में नाकाम रही. साथ ही भारत-बांग्लादेश रिश्तों को कमजोर किया. हसीना का दावा है कि वैध सरकार लौटे बिना रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते.

मानवाधिकार, मौतें और अंतरराष्ट्रीय दबाव

हालात और जटिल तब हो गए, जब ढाका की एक अदालत ने शेख हसीना को “crimes against humanity” का दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई-अगस्त 2025 के बीच हुए “July Uprising” में करीब 1,400 लोगों की मौत हुई, जब हसीना सरकार ने सुरक्षा बलों को सख्त कार्रवाई का आदेश दिया था.

राजनीति बनाम कूटनीति, और भारत की चुनौती

बांग्लादेश में अमेरिका का इस्लामिस्ट दलों से बढ़ता संपर्क सिर्फ वहां की राजनीति नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की सामरिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है. भारत के लिए चुनौती साफ है - अवामी लीग के बिना ढाका में कोई भी सरकार हो, रिश्ते आसान नहीं होंगे. अगर जमात या भारत-विरोधी ताकतें मजबूत हुईं, तो इसका असर सुरक्षा, सीमा, अल्पसंख्यक अधिकार और क्षेत्रीय संतुलन - हर मोर्चे पर पड़ेगा.

अब बड़ा सवाल यही है: क्या अमेरिका चुनावी गणित के लिए दक्षिण एशिया की स्थिरता दांव पर लगा रहा है, और क्या भारत इसके लिए तैयार है?

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