आनंद महिंद्रा को भाया उत्तराखंड का फूलदेई त्योहार, पोस्ट में की जमकर तारीफ, जानें क्यों मनाया जाता है ये पर्व

बिजनेस मैन आनंद महिंद्रा ने अपने एक्स पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने उत्तराखंड के फूलदेई त्योहार की तारीफ की. साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि वह इससे पहले इस पर्व के बारे में नहीं जानते थे.

( Image Source:  x-@anandmahindra )
Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 16 March 2026 3:36 PM IST

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में हर महीने कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है. उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है. यहां के त्योहारों की अपनी मान्यता है. इन्हीं में से एक खास पर्व है फूलदेई है. इस त्योहार के बारे में मशहूर बिजनेसमैन आनंद महिंद्रा ने अपने एक्स पर पोस्ट किया. इस पोस्ट में उन्होंने बताया कि वह इस त्योहार के बारे में नहीं जानते थे.

फूलदेई एक लोक पर्व है, जिसे हर साल मार्च में मनाया जाता है, जिसमें फूलों का इस्तेमाल किया जाता है. इस त्योहार से कई तरह की मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. चलिए जानते हैं कैसे मनाते हैं यह पर्व.

आनंद महिंद्रा ने क्या किया पोस्ट?

उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने सोशल मीडिया पर इस त्योहार के बारे में लिखते हुए बताया कि हाल तक उन्हें भी फूलदेई के बारे में जानकारी नहीं थी. उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के गांवों में बच्चे पहाड़ियों से फूल लाकर घरों की दहलीज पर रखते हैं और परिवार की खुशहाली के लिए आशीर्वाद देते हैं. उन्होंने इस परंपरा की तुलना अमेरिका के हैलोवीन से भी की, लेकिन एक खास अंतर बताया. उनके अनुसार वहां बच्चे “ट्रिक ऑर ट्रीट” कहकर कुछ मांगते हैं, जबकि फूलदेई में बच्चे पहले कुछ देते हैं. फूल और शुभकामनाएं. महिंद्रा ने इस पर्व को प्रकृति से जुड़ा बेहद सुंदर उत्सव बताते हुए कहा कि इसे और ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए. उन्होंने उत्तराखंड के बच्चों को अपना #MondayMotivation भी बताया.

कब मनाया जाता है फूलदेई?

फूलदेई का त्योहार हर साल चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जो आमतौर पर मार्च के महीने के बीच में पड़ता है. यह पर्व खासतौर पर उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के गांवों में मनाने की परंपरा है. इस त्योहार को वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है. पहाड़ों में लोग मानते हैं कि यह दिन प्रकृति के प्रति आभार जताने और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करने का शुभ अवसर होता है.

कैसे मनाया जाता है फूलदेई?

फूलदेई के दिन सुबह-सुबह गांव के बच्चे पहाड़ियों और खेतों से ताजे जंगली फूल इकट्ठा करते हैं. इसके बाद वे घर-घर जाकर उन फूलों को घर की दहलीज (चौखट) पर रखते हैं और परिवार की खुशहाली के लिए पारंपरिक गीत गाते हैं. बच्चे इस दौरान कहते हैं “फूल देई, छम्मा देई, देनी द्वार, भर भाकर…” इन पंक्तियों का अर्थ होता है कि घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहे. बदले में घर के लोग बच्चों को मिठाई, गुड़, चावल या पैसे देकर आशीर्वाद देते हैं. इस तरह पूरा गांव इस पर्व को मिलकर मनाता है.

फूलदेई से जुड़ी लोककथा

फूलदेई पर्व से जुड़ी एक पुरानी लोककथा भी सुनाई जाती है. कहा जाता है कि एक राजकुमारी की शादी बहुत दूर पहाड़ों के पार हुई थी. ससुराल में रहने के दौरान उसे अपने मायके की बहुत याद आती थी, लेकिन उसकी सास उसे वहां जाने नहीं देती थी. राजकुमारी ने कई बार मायके जाने की इच्छा जताई, लेकिन उसकी बात नहीं मानी गई. कहते हैं कि मायके की याद में दुखी होकर राजकुमारी की मृत्यु हो गई. बाद में उसके ससुराल वालों ने उसे उसके मायके के पास ही दफना दिया. कुछ समय बाद उस जगह पर पीले रंग के सुंदर फूल खिलने लगे, जिन्हें फयोली कहा गया. माना जाता है कि तभी से राजकुमारी की याद में फूलदेई का त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हुई.

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