Hellow....‘सड़े सरकारी सिस्टम’ के ‘हाकिमों’ तुम्हारे हाथों ‘कत्ल’ हो चुका मैं युवराज बोल रहा हूं...

नोएडा सेक्टर 150 में गड्ढे में फंसी कार, 6 घंटे तक मदद नहीं, पिता के सामने तड़प-तड़प कर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत. सिस्टम पर गंभीर सवाल. आइए पढ़ते हैं सरकारी सिस्टम की बेरुखी ने कैसे एक छीन ली युवराज की जान?;

By :  संजीव चौहान
Updated On : 21 Jan 2026 7:54 PM IST

देश की राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के हाईटेक शहर नोएडा में 17 जनवरी 2026 की वह मनहूस काली रात ....और उस रात यहां के सड़े हुए कामचोर भ्रष्ट सरकारी तंत्र यानी नोएडा पुलिस, एसडीआरएफ, फायर विभाग और नोएडा मतलब गौतमबुद्ध नगर के स्थानीय जिला प्रशासन के निकम्मेपन का शिकार होकर अकाल मौत के मुंह में समाकर काल के गाल में पहुंच चुके.... होनहार युवा इंजीनियर 27 साल को युवराज मेहता की अकाल मौत और उनके बेबस लाचार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के निदेशक पद से रिटायर्ड बूढ़े पिता राजकुमार मेहता की आहें...नंगे खड़े निकम्मे सरकारी सिस्टम और उसके कुछ जलील अफसर कर्मचारियों और इनकी आने वाली पीढ़ियों को भी कभी चैन से नहीं सोने देंगी...

आज यहां मैं देश की राजधानी दिल्ली की नाक के नीचे बसे यूपी के धन्नासेठों और उच्च शिक्षितों की भीड़ से भरे पड़े बेरहम हाईटेक शहर नोएडा के (Noida Sector 150 Yuvraj Mehta Accident Death) सड़े-सड़ांधी सरकारी तंत्र का जिक्र बेबाकी से कर रहा हूं.. वही नोएडा जो अब के बाद से हमारी-आपकी आने वाली पीढ़ियों के द्वारा हमेशा कोसा जाएगा. 27 साल के युवा और अपने बूढ़े पिता की जिंदगी की लाठी बनने की उम्मीदें पाले-पाले ही तुम्हारे सड़े सरकारी तंत्र के वजन से दबकर हमेशा के लिए अकाल मौत के मौत के मुहं में समा गया.

धन्नासेठों के हाईटेक शहर की मनहूस रात

जगह नोएडा का सेक्टर 150.... तारीख थी मनहूस 16-17 जनवरी सन् 2026... और वक्त रहा होगा घने कोहरे से घिरी धुप्प अंधेरी काली रात का करीब 12 बजकर 10 मिनट...जब नोएडा के यूरेका अपार्टमेंट निवासी बुजुर्ग राजकुमार मेहता के मोबाइल पर उनके इकलौते युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटे युवराज मेहता, जोकि गुरुग्राम में स्थित अपनी मल्टी नेशनल कंपनी की नौकरी से घर वापिस लौट रहा था, की कॉल आती है... बेहद हड़बड़ाई हुई आवाज में युवराज पिता को जल्दी जल्दी यानी तेजी से बोलते हुए बताता है....

“पापा मुझे बचा लो...मैं कार सहित घर के करीब ही पानी से भरे एक गहरे गढ्ढे में धीरे-धीरे डूबता जा रहा हूं. पापा मैं मरना नहीं चाहता हूं प्लीज आप जल्दी से आ जाओ मुझे बचा लो... रात बहुत अंधेरी और चारों ओर घना कोहरा है....” काली मनहूस रात में जानलेवा संकट में फंसे इकलौते बेटे युवराज की बेबसी में डूबी उस आवाज को पूरा सुने बिना ही उसे बीच में टोकते-रोकते हुए हड़बड़ाए बुजुर्ग पिता राजकुमार मेहता बेटे से पूछते हैं... “युवराज आप किस जगह पर हो...”

जवाब मिलता है.... “सेक्टर 150 नोएडा के मोड़ के बराबर में नाले के पास ही पानी से भरा हुआ एक बहुत गहरा गड्ढा है उसी के भीतर मय कार के डूब रहा हूं...एक अधूरे बने पड़े मॉल के लिए खोदे गए गड्ढे में हूं पापा कार सहित.” पिता राजकुमार मेहता कहते हैं- “ओके बेटा मैं आता हूं.. परेशान मत होओ...” इसी के साथ पिता-पुत्र की मोबाइल पर हो रही उस मनहूस बात का क्रम टूट जाता है...वयोवृद्ध पिता राजकुमार मेहता ने जवान बेटे के इस कदर की मुसीबत में फंसे होने के बाद भी धैर्य नहीं खोया. घर से निकलते-निकलते ही उन्होंने 112 पर यानी नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) पुलिस कंट्रोल रूम को कॉल कर दिया...

बेहया नोएडा पुलिस, बेबस पिता-पुत्र

यह अलग बात है कि जब तक हाड़ कंपाती काली रात में पिता मौके पर पहुंचे तब तक मौके पर नोएडा पुलिस नियंत्रण कक्ष या थाने-चौकी की पुलिस का कहीं नाम-ओ-निशां नहीं था. मौके पर पहुंचे पिता पुत्र की बात होने लगती है...युवराज कहते हैं पापा मय मेरे मेरी कार धीरे धीरे दलदल में धंसती जा रही है....बेटा हिम्मत रखो... परेशान मत होओ मैं घर से निकलते वक्त ही नोएडा पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित कर आया हूं. बस पुलिस आने ही वाली होगी...मगर सड़े हुए सरकारी तंत्र के ढेर पर कंपाती ठंड में हाथ सेंक रही नोएडा पुलिस भला कहां जिंदगी मौत से जूझ रहे पिता पुत्र की मदद को मौके पर पहुंचने वाली थी....क्योंकि किसी पुलिस अफसर का बेटा थोड़ा ही था उस रात मुसीबत में फंसा लाचार युवराज मेहता...

अंधे-गूंगे-बहरे सड़े सरकारी सिस्टम पर 'थू'

रात के अंधेरे में काफी समय तक पिता को बेटा अपने मोबाइल की बैटरी जलाकर बताता रहा कि वह कहां पर डूब रहा है अपनी कार की छत पर ही बैठा बैठा...रात साढ़े बारह बजे सूचना मिलने के कुछ देर बाद टहलती हुई नोएडा पुलिस भी खाली हाथ मौके पर पहुंच गई...जब तक सड़े हुए सिस्टम का शिकार हुई बैठी नोएडा पुलिस मौके पर पहुंची तब तक पिता राजकुमार मेहता की बातचीत अपने बेटे युवराज से होनी बंद हो चुकी थी...पुलिस बोली कि उसे अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा है....दिखाई देता भी कैसे...क्योंकि नोएडा पुलिस की आंखों पर तो सरकारी काले कपड़े की मोटी-मोटी पट्टियां जो बंधी हुई थीं...अकाल मौत के मुंह में आंखों के सामने समाता हुआ बेटा तो उन बुजुर्ग बेबस पिता राजकुमार को ही दिखाई दे रहा था..जिनके सामने उनकी दुनिया ही उजड़ने जा रही थी...

सड़ांध भरे सरकारी सिस्टम की बेशर्मी

बेशर्मी की हद तो तब हो गई जब अपनी ढलती उम्र से लाचार वृद्ध पिता राजुकमार आंखों के सामने मौत के मुंह की ओर बढ़ रहे युवा बेटे युवराज को बचाने के लिए कड़कड़ाती ठंड में भी नोएडा पुलिस से बेटे बचा लेने की मिन्नतें कर रहे थे...और मौके पर मौजूद बेहया नोएडा पुलिस के कर्मचारी उन्हें दुहाई दे रहे थे कि, “ठंड और अंधेरा बहुत है..जिस गहरे गड्ढ़े में उनका पुत्र डूबता जा रहा है वहां का पानी भी बहुत ठंडा है...”

ऐसे में इस सड़े सरकारी सिस्टम से जन्मे नोएडा पुलिस के इन ओछी सोच वाले बुजदिल पुलिस कर्मियों से कौन सवाल करे कि- “युवराज अगर इन्हीं पुलिस वालों में से किसी का...या फिर किसी आईएएस आईपीएस, सांसद, विधायक-मंत्री की संतान होता...तब भी क्या उन्हें पानी ठंडा और रात अंधेरी ही दिखाई पड़ती...” शायद नहीं.

क्योंकि तब बात किसी अपने के अकाल मौत के मुहं में जाने की जो होती...या फिर किसी पावरफुल कद्दावर ऐसी शख्शियत की औलाद के अकाल मौत मरने की आशंका की बात होती, जो मौके पर मौजूद नोएडा पुलिस के बेहया कर्मचारियों की नौकरी खाकर, उनके घरों के चूल्हों की आग बुझवाने की कुव्वत रखता होगा.

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सड़े सरकारी सिस्टम पर दिलेर मुनेंद्र ने थूका

युवराज के बेबस पिता राजकुमार मेहता हाथ जोड़ते हैं. गिड़गिड़ाते हैं कि मेरे बेटे की जिंदगी बचा लो....वे दमकल विभाग को सूचित करते हैं....गाजियाबाद से एसडीआरएफ भी मौके पर पहुंच जाती है....यानी नोएडा पुलिस, नोएडा दमकल सेवा, राज्य आपदा बचाव राहत दल...सड़े हुए सरकारी सिस्टम के ढेर पर पैदा होकर सरकारी बजट पर पाल-पोसकर बढ़ाई गई तीन तीन वे एजेंसियां खुद को सर-ए-आम नंगा करवाने पर तो उतारू थीं...मगर उस मनहूस रात लम्हा-लम्हा अकाल मौत की ओर खिसक रहे बेबस युवराज को बचाने की जल्दी इन सरकारी सिस्टम के पले हुए प्यादों में से किसी को नहीं थी..

मुसीबत के ऐसे वक्त में सरकारी एजेंसियों के सड़े सिस्टम और उसके नुमाइंदों को भरी भीड़ में सड़क पर नंगा होता देख....उधर से गुजर रहे अनजान डिलीवरी ब्यॉय मुनेंद्र का खून खौल उठता है. क्योंकि उसके अंदर इंसान और इंसानियत कूट कूट कर भरी थी...क्योंकि वह भ्रष्ट और निकम्मे कामचोर किसी सड़ते बजबजाते हुए सरकारी सिस्टम का बिकाऊ हिस्सा नहीं था....इसीलिए मुनेंद्र ने जैसे ही देखा कि सरकारी सिस्टम के सड़े-बुसे अफसर-कर्मचारी तो शतरंज के पिटे हुए मोहरों की मानिंद हार मानकर इंसानियत को सरे बाजार नंगा करने पर ही अड़े हुए हैं....तो वह खुद ही कूद पड़ा उसी गहरे ठंडे पानी के भीतर...

जिसमें घुसने से पढ़े लिखों के नोएडा शहर के सड़े हुए सरकारी सिस्टम की तीन-तीन एजेंसियों के “ट्रेंड-बुजदिल” 70-80 जवानों की मौके पर दावत खाने पहुंची बेहया जमात ने...साफ इनकार कर दिया था…. मौके पर मौजूद वह सरकारी दामादों की बेशर्म जमात जो 5-6 घंटे इस इंतजार में बैठी रही कि किसी तरह काली मनहूस रात गुजरे और दिन निकले. तब वे सब नाकारा सरकारी मुलाजिम अपनी नौकरी बचाने के लिए....किसी तरह से भारत के भविष्य और अपने बुजुर्ग पिता की बुढ़ापे में इकलौती लाठी बचे इंजीनियर युवराज मेहता की लाश को अपने कंधों पर लादकर बाहर लाकर खुद ही खुद की बेशर्मी से पीठ ठोंक सकें..

रोम का बेशर्म नीरो और नोएडा का निकम्मा प्रशासन

मतलब सरकारी एजेंसियों के निर्लज्ज अफसर-कर्मचारियों को सरे-आम नंगा करने वाला दिलेर डिलीवरी ब्यॉय मुनेंद्र खुद की जिंदगी दांव पर लगाकर जब तक बदन में दम रही तब तक वह, 2-3 डिग्री तापमान वाले पानी में तैरता हुआ वहां पहले से फंसे पड़े युवराज मेहता की तलाश में फड़फड़ाता रहा...और नोएडा पुलिस-नोएडा फायर सर्विस, मौके पर गाजियाबाद से पहुंचे सड़े हुए सरकारी सिस्टम में पले-बड़े एसडीआरएफ के नुमाइंदे, मिट्टी के माधव बने किनारे पर बैठकर किसी तरह रात गुजरने और दिन निकलने के इंतजार में बेयहाओं की तरह अंधे गूंगे और बहरे बनकर बैठे रहे...ठीक वैसे ही जैसे कभी जलते हुए रोम को देखकर बेशर्म नीरो बांसुरी बजाता रहा था...

सोचिए कैसे इकलौते जिंदादिल दिलेर डिलीवरी ब्यॉय मुनेंद्र ने सरेआम “थूक” दिया होगा भरी भीड़ में मौके पर मौजूद सड़े हुए सरकारी तंत्र के झूले में झूलकर पले-बढ़े कामचोर-मक्कार नोएडा पुलिस-फायर और गाजियाबाद की एसडीआरएफ के 70-80 जवानों और अफसरों के मुंह पर. मीडिया में बिछी पड़ी खबरों की मानें तो सुबह 4 बजे एसडीआरएफ की टीम ऑपरेशन शुरू करने की खानापूर्ति के नाम पर...हमेशा ही भारी-भरकम खैरात में मिली सरकारी सहूलियतों के वजन के नीचे दबे रहने के चलते सुन्न हो चुके हाथ-पावों को हिला-डुलाकर परखना शुरू करती है... कि उनके हाथ पांवों को सरकारी सहूलियतों ने लकवा तो नहीं मार दिया है...वे चल भी रहे हैं या नहीं.....उससे पहले तक अंधेरे में फायर और एसडीआरएफ के निकम्मे जवान छोटी छोटी रस्सियां पानी से भरे गड्ढे की ओर फेंक कर ऑपरेशन चालू कर दिए जाने का ढोंग करते या स्वांग रचाते रहे....वह भी पानी से बहुत दूर किनारे पर बाहर खड़े खड़े ही...उनके इस निकम्मेपन से बिफरे बेबस बुजुर्ग पिता ने बिलबिलाते हुए जब पूछा- कि क्या आप में से कोई भी तैराक नहीं है....तो बेहया बचावकर्मियों की बेशर्म भीड़ में से किसी का भी खून खौला देने वाली आवाज आई... “गड्ढे में बहुत गहरा पानी भरा है...अंदर लोहे की सरियां होने का भी अंदेशा है...पानी बहुत ठंडा है...”

सड़े सिस्टम के हाकिमों के जवाब ने जला डाला

इन बेशर्मा अल्फाजों या जवाब से साफ हो चुका था कि... जिंदगी मौत से जूझ रहे बेबस युवा इंजीनियर युवराज मेहता को उस कदर के बेहद विपरीत हालातों में बचाने की कोशिश करना मतलब.....मौके पर मौजूद सरकारी कामचोरों को अपनी जिंदगी जान-बूझकर जोखिम में डालने जैसा लगा था. और फिर इस तरह रोते-धोते गिरते-पड़ते किसी तरह से तड़के 4 बजे से ऑपरेशन चालू करने की तैयारियों के नाम पर एसडीआरएफ ने 2 घंटे तैयारी में ही जान-बूझकर गंवा डाले...अब तक उच्च शिक्षित समाज को ढोने वाली भीड़ से भरे हुए देश के हाईटेक शहर नोएडा में एक होनहार युवा को अपनी जिंदगी की भीख मांगते-मांगते जान गंवाए हुए घंटों गुजर चुके थे.

दिन निकला तो सूरज की रोशनी में भी न कार नजर आ रही थी न युवराज. मतलब दोनो ज़मीदोज हो चुके थे. सुबह छह बजे के करीब नोएडा के सड़े हुए सरकारी तंत्र के कंधों पर दिखाई दी तो बेबस बुजुर्ग पिता की जिंदगी का सहारा युवराज की लदी हुई लाश..जो कुछ घंटों पहले तक जीवन बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहा था. उसी युवराज की लाश देखकर भोर में उगते सूरज की किरणें भी कराह उठीं ....और उस मनहूस काली रात में सड़े हुए भ्रष्ट सरकारी तंत्र की नंगई देखकर इंसानियत सरकारी दफ्तरों के कोनो में बैठी....बिलखती बिलबिलाती दिखाई दे रही थी कि इस मर्माहतक क्रंदन के संग कि...यह तो बस ट्रेलर था...सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की कड़वी कहानी तो अब तब शुरू होगी जब...इस लोमहर्षक कांड की जांच उसी सड़े हुए सरकारी तंत्र के कुछ छंटे हुए हुकूमत के मुंहलगे करीबी “साहिबान” से कराई जाएगी....जिस भ्रष्ट सरकारी सिस्टम के निकम्मेपन के चलते बूढ़े बेबस लाचार पिता की आंखों के सामने जिंदगी की जंग हारा कोई युवराज इस जलील दुनिया से दूर होकर....खुद को इंसानी जालिमों से बचा ले गया...अपनी रुह कंपाती अकाल मौत को बेबसी और मजबूरी में गले लगाकर क्यों न. उस रुला देने वाली भोर में घटनास्थल पर सामने खड़ी चिढ़ा रही थी सरकारी तंत्र की बेहरहमी की शिकार हो चुकी इंसानियत...

बेबस पिता मजबूर बेटा और बेहया हुक्मरान

रात के अंधेरे में पानी से भरे गहरे गड्डे में डूबे बेबस लाचार होनहार युवराज की सुबह के उजाले में लाश तलाश लेने से .... सड़े हुए सरकारी सिस्टम को शर्मनाक या कहिए बेशर्मी की चादर ओढ़े इस नाकामी में भले ही अपनी कामयाबी क्यों न नजर आ रही हो...मगर एक बेबस पिता द्वारा अपने बेटे को आंखों के सामने अकाल मौत मरते हुए देखने के कलंक की कालिख क्या आइंदा कभी भ्रष्ट सड़े हुए सरकारी तंत्र के चेहरे से मिट सकेगी...

निर्लज्ज सरकारी तंत्र के हाथों अकाल मौत मारे जा चुके युवराज को जब तमाशबीनों के सामने लाश के रुप में सड़े हुए सरकारी तंत्र को नोंच कर खाने-पीने वालों के कंधों पर लटका कर गड्ढे से बाहर लाया गया...तो एक घर की खुशियां उजड़ चुकी थीं. और मौके पर मौजूद बेबस लाचार मगर एकदम खामोश पिता की सूजी हुई आंखों से गालों पर निरंतर बहते गरम आंसू यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नोएडा में सड़े हुए सरकारी तंत्र के ढेर पर बैठकर मलाई चाट रहे नोएडा अथारिटी, नोएडा पुलिस, गाजियाबाद एसडीआरएफ, नोएडा फायर सर्विस के बुजदिल अफसर-जवानों से पूछ रही थीं कि....जिन राजुकमार मेहता की पत्नी पहले ही दुनिया से जा चुकी है...जवान बेटे को तुम सबने मिलकर अकाल मौत के मुंह में धकेल कर मार डाला...अब तुम सबके निकम्मेपन से हासिल अपने जवान बेटे की बेइंतहा भारी लाश का बोझ ढोकर मैं अपने बूढ़े कंधों से शमशान तक कैसे पहुंचाऊंगा....

3-3 सरकारी एजेंसियों के 80 से ज्यादा निकम्मे कामचोर अफसर कर्मचारियों में से किसी का भी बेटा या भाई नहीं था न.... भ्रष्ट सरकारी सिस्टम के हाथों रुह कंपाती अकाल मौत मार डाला गया... बिना मां का लाल और बूढ़े पिता के बुढापे की लाठी युवराज...जिसकी जिंदगी बचाने के नाम पर 6 घंटे चले सरकारी नंगे नाच ने इंसानियत को भी सरेआम नीलाम कर डाला...महज इसलिए क्योंकि युवराज इस बदबूदार सड़े सिस्टम के ढेर के ऊपर बैठे किसी बड़े अफसर का बेटा था न भाई...

सब गूंगे बहरे अंधेर तो फिर सवाल किससे?

सौ टके का सवाल यह है कि क्या किसी नेता मंत्री या सडांध से भरे हुए सरकारी सिस्टम के किसी का अपना होता युवराज...तब भी उसे ऐसी ही तड़फती हुई सरकारी अकाल मौत दिलवाई जाती....शायद नहीं कभी नहीं....तब शायद रात को घरों में सोते हुए लोगों को भी नोएडा पुलिस सरकारी जिप्सियों में ढोकर या कंधों पर लादकर मदद के लिए मौके पर ले आई होती...तब शायद लखनऊ में मौजूद सूबे के हुक्मरानों से नोएडा के भ्रष्ट हाकिम तुरंत दिल्ली बात कराके, हेलीकॉप्टर या अन्य काबिल बचाव दल पलक झपकते मंगाकर अपनी-अपनी खाल और नौकरियां बचाने की मैली मंशा में किसी भी हद तक जा सकते थे..मगर युवराज तो अपने पिता के बुढ़ापे की लाठी भर था...ऐसे युवराज और उसके ऐसे लाचार बेबस पिता से भला ...किसी सड़े हुए निकम्मे सरकारी तंत्र का क्या लेना देना...जब युवराज किसी नेता मंत्री सांसद, पुलिस कमिश्नर डीसीपी मुख्यमंत्री आईपीएस का बेटा ही नहीं था...तब भला नोएडा का दुर्गंध मारता सड़ा हुआ सरकारी तंत्र ... लावारिस से लगने वाले बेबस लाचार युवराज की जिंदगी बचाने के लिए वह सब कवायद-कसरत क्यों करता, जो उसे अपनी खाल खींच लेने वाले आकाओं के किसी युवराज को बचाने के लिए करनी चाहिए पड़ती.

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