ऐसा क्या है 105 साल पुराने ट्रैक्टर में जो आज 1 करोड़ रुपये से ज्यादा में बिका? जानें लेंज बुलडॉग की खासियत

जालंधर की एक जर्जर इमारत में सालों तक खड़ा रहा 105 साल पुराना Lanz Bulldog HL12 आज 1 करोड़ रुपये से ज्यादा में बिककर दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है.

( Image Source:  instagram-@king_lodhi02 )
Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 26 Feb 2026 6:37 PM IST

सोचिए क्या हो जब कोई चीज कबाड़ के तौर पर जर्जर इमारत में पड़ी हो और अचानक से वह एनटिक कहलाने लगे. चलो एनटिक तक भी ठीक था क्या हो जब इस ही कबाड़ में पड़ी चीज की कीमत करोड़ों में पहुंच जाए? ऐसा ही एक मामला पंजाब के जालंधर से सामने आया है.

खंडहरनुमा इमारत में सालों तक कबाड़ समझकर छोड़ा गया 105 साल पुराना ट्रैक्टर अब विदेश के म्यूजिम में रखा जाएगा.  चलिए ऐसे में जानते हैं इसकी खासियत और 

2 लाख से  1.25 करोड़ में बिका ट्रैक्टर

यह विंटेज ट्रैक्टर जालंधर के भगत सिंह चौक के पास एक पुराने मकान में लंबे समय से पड़ा था. स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक जंग लगा ढांचा था, लेकिन विंटेज गाड़ियों के जानकारों ने इसकी असली पहचान की. शुरुआत में इसकी कीमत मात्र 2 लाख रुपये लगाई गई थी. समय के साथ जब इसकी ऐतिहासिक अहमियत सामने आई, तो बोली 28 लाख तक पहुंची और आखिरकार एक अमेरिकी कलेक्टर फर्म ने इसे 1.25 करोड़ रुपये में खरीद लिया. अब यह कैलिफोर्निया के एक म्यूजियम की शान बनेगा. 

क्या है Lanz Bulldog HL-12?

इस विंटेज ट्रैक्टर का नाम Lanz Bulldog HL-12 है, जो 1920 में जर्मनी में बनाया गया था. कभी खेती और मिल चलाने वाली यह मशीन अब औद्योगिक विरासत का बेशकीमती सिंबल बन चुकी है.

इस ट्रैक्टर की खासियत?

Lanz Bulldog HL-12 अपने समय की क्रांतिकारी मशीन थी. इसमें सिंगल सिलेंडर ‘हॉट-बल्ब’ इंजन लगा था, जिसे स्टार्ट करने से पहले काफी गर्म करना पड़ता था. एक बार चालू हो जाने पर यह कम स्पीड में भी जबरदस्त ताकत और टॉर्क पैदा करता था. यही वजह थी कि यह ट्रैक्टर खेतों में हल चलाने से लेकर पानी के पंप और अनाज की चक्की चलाने तक हर भारी काम में इस्तेमाल होता था.

किसी भी तेल पर चलने की अनोखी क्षमता

इस ट्रैक्टर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल पर चलता था. इतना ही नहीं, यह वेजिटेबल ऑयल और वेस्ट ऑयल पर भी काम कर सकता था. 1920 के दौर में ऐसा ट्रैक्टर बनना, जो अलग-अलग तरह के तेल पर चल सके, किसी बड़े तकनीकी करिश्मे से कम नहीं था. उस समय जब मशीनें सीमित ईंधन पर निर्भर थीं, तब यह खासियत अपने आप में अनोखी मानी जाती थी. इसे जर्मनी के इंजीनियर Heinrich Lanz ने तैयार किया था. 

कैसे पड़ा नाम?

दरअसल, इस मशीन का नाम “बुलडॉग” उसके इंजन की खास बनावट की वजह से पड़ा. इसमें लगा हॉट-बल्ब इंजन का सिलेंडर हेड आगे की ओर निकला हुआ और थोड़ा उभरा हुआ था, जो देखने में बुलडॉग कुत्ते के चेहरे जैसा लगता था.


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