कौन है एक करोड़ का इनामी नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा? अनल दा के ढेर होते ही सुरक्षाबलों के रडार पर
ऑपरेशन मेघाबुरू में 17 नक्सलियों के मारे जाने के बाद सुरक्षाबलों की नजर ₹1 करोड़ के इनामी माओवादी कमांडर मिसिर बेसरा पर टिक गई है. ड्रोन और हाईटेक निगरानी से अब उसका नेटवर्क तोड़ने की तैयारी है.;
सारंडा और कोल्हान के घने जंगल अब सिर्फ नक्सलियों की शरणस्थली नहीं रह गए हैं, बल्कि सुरक्षा बलों की हाईटेक निगरानी का मैदान बन चुके हैं. पश्चिमी सिंहभूम के जंगलों में हुए ‘ऑपरेशन मेघाबुरू’ में 17 नक्सलियों के मारे जाने के बाद अब सुरक्षाबलों की नजर सीधे उस शख्स पर टिक गई है जिसे CPI माओवादी का दिमाग माना जाता है - मिसिर बेसरा.
खुफिया एजेंसियों का दावा है कि सारंडा इलाके में अब भी दो करोड़ से ज्यादा के इनामी नक्सलियों का दस्ता सक्रिय है. इसमें एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा और 20 लाख का इनामी असीम मंडल शामिल है. इनके अलावा अजय महतो और रामप्रसाद मार्डी जैसे कई बड़े नाम अब भी अलग-अलग इलाकों में छिपे हुए हैं.
ऑपरेशन मेघाबुरू के बाद बदली रणनीति
हालिया मुठभेड़ में प्रतिराम माझी उर्फ अनल दा उर्फ तूफान के मारे जाने के बाद नक्सलियों के नेटवर्क को बड़ा झटका लगा है. इसी के साथ सुरक्षा बलों ने अब जंगलों में पारंपरिक सर्च ऑपरेशन की जगह तकनीक आधारित घेराबंदी शुरू कर दी है. अब जीपीएस ड्रोन से नक्सलियों के मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है. ड्रोन से मिले लोकेशन इनपुट के आधार पर कोबरा, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ की टीमों को सीधे उन ठिकानों की ओर भेजा जा रहा है, जहां संदिग्ध गतिविधि दिख रही है. इसका मकसद है - बचे हुए दस्तों को या तो हथियार डालने पर मजबूर करना या उनका नेटवर्क पूरी तरह तोड़ देना.
कौन है मिसिर बेसरा?
मिसिर बेसरा, जिसे संगठन में भास्कर, सागर और सुनिर्मलजी जैसे नामों से भी जाना जाता है, CPI माओवादी के पोलित ब्यूरो का सदस्य है. उसका मूल निवास झारखंड के गिरिडीह जिले के मदनडीह गांव में बताया जाता है. बीते वर्षों में जब ओडिशा और पश्चिम बंगाल में पुलिस दबाव बढ़ा, तो उसने कोल्हान और सारंडा के जंगलों को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया. रिपोर्ट के मुताबिक, वह यहीं से झारखंड, ओडिशा और बंगाल के नक्सली नेटवर्क को निर्देश देता रहा है. यही वजह है कि उस पर तीन राज्यों की सरकारों ने एक-एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा है.
लैंडमाइंस का सुरक्षा घेरा
मिसिर बेसरा की सुरक्षा व्यवस्था किसी सैन्य ठिकाने से कम नहीं रही है. खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, जिस इलाके में वह रहता था, उसके चारों ओर पांच से दस किलोमीटर तक बारूदी सुरंगें बिछाई गई थीं. उसकी सुरक्षा में जोनल कमांडर स्तर के नक्सली एके-47 जैसे हथियारों के साथ तैनात रहते थे. यही वजह है कि पिछले एक साल से लगातार चल रहे सर्च ऑपरेशन के बावजूद वह सुरक्षाबलों की पकड़ से बाहर रहा.
कोल्हान बना अंतिम ठिकाना
पिछले एक साल से चाईबासा पुलिस, कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ मिलकर कोल्हान जंगल में संयुक्त अभियान चला रही हैं. माना जा रहा है कि माओवादी संगठन की बची-खुची ताकत अब इसी बेल्ट तक सिमट चुकी है. आंकड़े बताते हैं कि पश्चिमी सिंहभूम जिले में कभी 65 से ज्यादा बड़े नक्सली सक्रिय थे, लेकिन अब इनकी संख्या 50 से भी कम रह गई है. ऑपरेशन मेघाबुरू के बाद यह आंकड़ा और घटने की संभावना जताई जा रही है.
नक्सलियों के सामने अब सिर्फ दो रास्ते
मुठभेड़ों में लगातार नुकसान और ड्रोन निगरानी के कारण नक्सली अब जंगलों में खुलकर मूवमेंट नहीं कर पा रहे हैं. उनके सामने या तो आत्मसमर्पण का विकल्प है या फिर सुरक्षाबलों से निर्णायक टकराव का. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी या मुठभेड़ में मारा जाना CPI माओवादी संगठन के लिए सबसे बड़ा झटका होगा, क्योंकि वही संगठन की रणनीति और विस्तार की धुरी माना जाता है.
‘डिजिटल जंगल युद्ध’ का दौर
सारंडा और कोल्हान में चल रहा यह अभियान अब सिर्फ जंगलों में तलाशी नहीं, बल्कि तकनीक बनाम गुरिल्ला युद्ध का रूप ले चुका है. जहां एक ओर माओवादी बारूदी सुरंगों और घने जंगलों पर भरोसा करते हैं, वहीं सुरक्षाबल ड्रोन, जीपीएस ट्रैकिंग और सैटेलाइट इनपुट के सहारे उनकी घेरेबंदी कर रहे हैं.