Barsa Deva Surrender : एक ही गांव, दो माओवादी वारलॉर्ड - एक एनकाउंटर में ढेर, दूसरा जान बचाने को घुटनों पर
Barsa Deva Surrender : छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक ही गांव से निकले दो शीर्ष माओवादी कमांडरों की कहानी अलग-अलग अंजाम पर खत्म हुई. कुख्यात माओवादी नेता मदवी हिड़मा, जो सुरक्षा बलों पर हुए कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड था, नवंबर में एक एनकाउंटर में मारा गया. वहीं उसका सबसे भरोसेमंद शिष्य और PLGA बटालियन-1 का कमांडर बरसा देवा उर्फ बरसा सुक्का ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.
Barsa Deva Surrender : छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के सुकमा जिले के एक छोटे से गांव से निकले दो माओवादी कमांडर - एक ने “मरने तक लड़ने” का रास्ता चुना, दूसरा आख़िरी वक्त पर हथियार डालकर जिंदा रहने का. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार माओवादी आंदोलन के इतिहास में यह दुर्लभ है, लेकिन यही कहानी है कुख्यात माओवादी नेता मदवी हिड़मा और उसके सबसे भरोसेमंद शिष्य बरसा देवा उर्फ बरसा सुक्का की.
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बरसा देवा ने शनिवार को तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उसके साथ कम से कम 48 माओवादी और भारी मात्रा में हथियार भी पुलिस के हवाले किए गए. तेलंगाना पुलिस इसे पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का ‘एंडगेम’ मान रही है.
एक ही गांव, एक ही बटालियन, लेकिन किस्मत अलग
हिड़मा और बरसा देवा, दोनों ही छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवारती गांव के रहने वाले थे. दोनों PLGA की सबसे खतरनाक बटालियन मानी जाने वाली बटालियन-1 के कमांडर रहे. फर्क सिर्फ इतना रहा कि हिड़मा ने आत्मसमर्पण की तमाम अपीलें ठुकरा दीं, जबकि बरसा देवा ने आख़िरी मोड़ पर जान बचाने का फैसला किया. नवंबर में आंध्र प्रदेश के मारेडुमिल्ली जंगल में हुए एनकाउंटर में मदवी हिड़मा मारा गया. वह अपनी पत्नी और अन्य माओवादियों के साथ छत्तीसगढ़ से भाग रहा था, तभी सुरक्षा बलों ने उसे घेर लिया.
घेरा गया तो समझ आया ‘हिड़मा का अंजाम’
तेलंगाना पुलिस सूत्रों के मुताबिक, बरसा देवा का आत्मसमर्पण कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था. वह तेलंगाना सीमा के पास कई राज्यों की एंटी-माओवादी फोर्स से घिर चुका था. एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “उसे साफ कह दिया गया था कि भागने की कोशिश की तो यही उसकी आख़िरी सांस होगी. उसने हिड़मा का अंजाम देखा, हालात समझे और आत्मसमर्पण का फैसला किया.”
हिड़मा का सबसे वफादार, फिर भी रास्ता बदला
बरसा देवा सिर्फ हिड़मा का साथी नहीं, बल्कि उसका सबसे वफादार लेफ्टिनेंट माना जाता था. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, वह हिड़मा को लगभग पूजता था और उसके “डू ऑर डाई” सिद्धांत पर चलता था. एक अधिकारी ने कहा, “यह पहली बार है जब हिड़मा का कोई इतना करीबी आदमी उसकी लाइन से हटकर जिंदा रहने का फैसला कर रहा है.”
₹50 लाख का इनामी, 100 से ज्यादा जवानों की हत्या का आरोपी
बरसा देवा पर ₹50 लाख से ज्यादा का इनाम था. वह कई बड़े माओवादी हमलों का मास्टरमाइंड रहा है, जिनमें 2013 में सुकमा में कांग्रेस नेताओं पर हमला भी शामिल है. उसका सफर DKMS (दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ) के एक साधारण वॉलंटियर से शुरू हुआ और वह तेजी से दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी तक पहुंच गया. इसी तेज़ उभार ने हिड़मा का ध्यान खींचा, जिसने उसे अपना शिष्य बना लिया. हिड़मा की मौत के बाद बरसा देवा ने ही PLGA बटालियन-1 की कमान संभाली थी.
48 LMGs के साथ सरेंडर, माओवादी ताकत की रीढ़ टूटी
पुलिस के मुताबिक, बरसा देवा और उसके साथियों ने 48 लाइट मशीन गन (LMG) समेत भारी हथियार सरेंडर किए. यह इस बात का सबूत है कि बटालियन-1 माओवादी आंदोलन की रीढ़ थी. एक अधिकारी ने कहा, “उसके हाथ खून से सने हैं. कई राज्यों की पुलिस उसे चाहती थी. यही वजह है कि उसने तेलंगाना में सरेंडर चुना.”
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तेलंगाना पुलिस का दावा: माओवादी आंदोलन लगभग खत्म
तेलंगाना DGP बी शिवधर रेड्डी का कहना है कि हिड़मा की मौत और बरसा देवा के आत्मसमर्पण के बाद अब माओवादी हिंसा को आगे बढ़ाने वाला कोई बड़ा चेहरा नहीं बचा है. सरेंडर के बाद बरसा देवा ने अपने गांव जाकर परिवार से मिलने की इच्छा जताई, जिस पर पुलिस ने सशर्त सहमति दे दी. DGP के शब्दों में, “उसका इलाका अब माओवाद से ऊब चुका है. खुद उसके गांव वाले उसे दोबारा गलत रास्ते पर नहीं जाने देंगे. हम निगरानी रखेंगे.”
एक कहानी, दो रास्ते
एक ही गांव से निकले दो माओवादी सरगनाओं की यह कहानी बताती है कि बंदूक के रास्ते का अंजाम क्या होता है - एक मारा गया, दूसरा सलाखों के पीछे ज़िंदगी की दूसरी शुरुआत की उम्मीद में.





