'सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यों, चीख़-चीख़ कर न गला छील ले कोई'!...Sorry कमल-युवराज तुम मर गए सड़ा सिस्टम जिंदा है

कमल ध्यानी और युवराज मेहता की अकाल मौत ने दिल्ली जल बोर्ड, नोएडा अथॉरिटी और पुलिस की घोर लापरवाही को उजागर किया है. सवाल यह है- मरते युवा हैं, बचता सिस्टम क्यों है?;

By :  संजीव चौहान
Updated On : 10 Feb 2026 7:47 PM IST

दिल्ली में ट्रिपल इंजन वाली सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ यानी कभी भी कहीं भी किसी भी हवाबाज के अड्डे को ‘बुलडोजर’ से रौंद डालने वाले ‘बुलडोजर-बाबा’ की हुकूमत. दिल्ली में तो दुनिया में किसी राज्य की पहली सबसे होनहार-जागरुक-तेजस्वी-ओजपूर्ण वक्ता और करोड़ों की भीड़ में भी गजब की दूरदृष्टि रखने वाली इकलौती वाकपटु काबिल महिला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की हुकूमत का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है.

यह अलग बात है कि कमल ध्यानी जैसे होनहार युवा की अकाल मौत ने दिल्ली में बेजीपी यानी भारतीय जनता पार्टी के लबादे के वजन से कमर झुकाए और दबी-झुकी घिसटती-गिरती-पड़ती दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जिस दिल्ली जलबोर्ड की अध्यक्ष हैं, उसकी ऐसी की तैसी कर डाली है.

मुख्यमंत्री ही दिल्ली जलबोर्ड अध्यक्ष

दिल्ली जल बोर्ड के अधिकांश अंधे-गूंगे-बहरे और भ्रष्ट यानि तमाम निकम्मे आला -अफसरान की ऐसी की तैसी हुई हो या न हुई हो...मगर ‘अमृतकाल’ और ‘स्वर्णकाल’ का सुख भोगने में मस्त दिल्ली और यूपी में भाजपा वाली सरकारों की तो इन दो “सरकारी-अकाल-मौतों” (युवराज मेहता और कमल ध्यानी) ने ऐसी की तैसी जमाने की नजरों में कर ही डाली है. दिल्ली जल बोर्ड का तो अध्यक्ष ही दिल्ली का मुख्यमंत्री होता है.

बीते कुछ समय से भारत भर में बेकाबू जंगली नागफनी से फैले भ्रष्ट सरकारी तंत्र के अंधे-गूंगे और बहरे सरकारी अफसर-विभागों आमजन की “ऐसी की तैसी” करने पर आमादा दिखाई पड़ रहे हैं. इस शर्मनाक या कहिए फजीहत वाले उसूल की शुरूआत देश की राजधानी दिल्ली और यूपी से हुई है. इन दोनो ही सूबों में केंद्र शासित भारतीय जनता पार्टी की ही हुकूमत सत्ता के सिंहासन पर सजी-जमी बैठी है.

हाईटेक शहर नोएडा की मनहूस रात

16-17 जनवरी 2026 की डरावनी काली रात याद कीजिए....वह मनहूस शमशानी रात..जब यूपी में भाजपा शासित योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व के साए में ‘अमृतकाल’ का आनंद ले रहे नोएडा विकास प्राधिकरण के भ्रष्ट सड़े हुए सरकारी तंत्र और नोएडा पुलिस व नोएडा दमकल सेवा से जिंदगी की भीख मांगते-मांगते. रुह कंपाने वाली अकाल मौत तिल-तिल घुटकर मर गया. भारत का युवा भविष्य इंजीनियर युवराज मेहता. भ्रष्ट और निकम्मे सरकारी तंत्र-अफसरों की भीड़ के सामने. घटना से हिले पड़े बिचारे लाचार बेबस नोएडा और देश के आयकरदाताओं और मतदाताओं ने जब कुछ ज्यादा ही रोना पीटना, हाय-तौबा मचाना शुरू किया तो लखनऊ में काठ की ऊंची-ऊंची ताकतवर कुर्सियों पर डटे सरकारी तंत्र के कथित रहनुमाओं या कहूं खलीफा-आला-अफसरों ने विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित करके, पांच दिन में रिपोर्ट दाखिल करने के शोर की कालिख से अखबारों के पन्ने पुतवा डाले.

युवराज की मौत की SIT रिपोर्ट भी ‘मर गई’

युवराज की मौत विधाता ने रुह कंपाती लिखी थी सो बिचारा सड़े हुए निकम्मे और भ्रष्ट सरकारी सिस्टम यानी नोएडा विकास प्राधिकरण, नीम बेहोशी के आलम में बोझिल आंखें लिए घटना वाली रात सेक्टर 150 में जिंदा लाश की मानिंद मौके मौजूद रहने वाली नोएडा पुलिस, गाजियाबाद के राज्य आपात बचाव दल यानी एसडीआरएफ और नोएडा के दमकल सेवादारों की शर्मनाक हरकतों पर अकाल मौत मरकर “बलि” चढ़ गया.

स्टेपनी टाइप गिरफ्तार, गुनहगार ‘गायब’

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से अधिकारी पद से रिटायर उसके 70-75 साल के लाचार बूढ़े पिता राजकुमार मेहता का पूर्व जन्म का कोई कर्मफल रहा जो, मनुष्य योनी में उन्होंने नोएडा के सरकारी भ्रष्ट निकम्मे तंत्र के हाथों अकाल मौत मरते हुए अपने जवान बेटे की बलि आंखों के सामने चढ़ती हुई देखकर 16-17 जनवरी 2026 की मनहूस रात में भोग लिया. असली गुनाहगारों को छोड़कर इधर उधर के दो चार स्टपेनी टाइप जिन “बिचारों” को नोएडा पुलिस ने घेर-बटोर कर गिरफ्तार करके जेल में ले जाकर ठूंसा था वे भी शायद अब जेल से बाहर आ चुके हैं...मगर इसमें जिम्मेदार और जमाने से अपने ऊप थुकवा रहे किसी भी सरकारी एजेंसी का कोई अफसर क्या बाबू तक गिरफ्तार नहीं किया गया....इसलिए क्योंकि सरकार अपनी सिस्टम अपना...तो ऐसे में फिर सैंया भय कोतवाल डर काहे का...यानी अपनी अपनी सहूलियत से जिस सरकारी बाबू अफसर को घेरकर जेल में डाला जाता वे सब मलाई चाट रहे हैं.

बोलत में बंद SIT जांच का ‘जिन्न’

अब अगर सरकारी तंत्र की फाइलों में युवराज के “सरकारी कत्ल” से जुड़ी कोई चीज आज भी गायब है तो वह है घटना की जांच के लिए गठित एसआईटी की रिपोर्ट जिसका जिन्न 5 दिन में सरकारी बोतल से बाहर लाने का दावा सूबे के सड़े हुए सरकारी तंत्र ने एसआईटी के गठन के वक्त ही हवा में उछाला था. उस रिपोर्ट को शायद इसलिए दबा दिया गया होगा...बदकिस्मत इंजीनियर युवराज मेहता के सरकारी कत्ल की कहानी के काले राज सफेद सरकारी पन्नों पर दफन किए एसआईटी की रिपोर्ट कहां है? सिवाए भ्रष्ट सरकारी तंत्र के आज भी किसी को नहीं पता है..मतलब युवराज मरा सो तो मरा ही...उसकी रुह कंपाती मौत की एसआईटी जांच रिपोर्ट भी सरकारी सिस्टम ने समझिए सरकारी कलम से गला घोंटकर मार ही न डाली हो.

कमल ध्यानी-युवराज ‘बलि का बकरा’

चलो छोड़ो युवराज मर गया. उसकी अकाल मौत की जांच रिपोर्ट भी मर गई. उस पर क्या रोना-धोना. ऐसे न मालूम कितने युवराज और कमल ध्यानी देश के भ्रष्ट सरकारी सिस्टम की सलाखों पर चढ़ाकर पहले भी मारे जाते रहे होंगे और आगे नहीं मारे जाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं. अब चलो “ऐसी की तैसी” करते हैं नोएडा से चंद किलोमीटर दूर इसी तरह के बेशर्म भ्रष्ट सरकारी हादसे की सड़ांध के कीड़ों से बजबजा रहे. दिल्ली जलबोर्ड के अंधे बहरे और गूंगे निकम्मे सिस्टम की. दिल्ली के मतदाता की बदकिस्मती देखो कि यहां भी देश में बीजेपी शासित उसी भारतीय जनता पार्टी की हुकूमत है जो अपने स्वर्णकाल और अमृतकाल से गुजर रही है. युवराज मेहता और कमल ध्यानी जैसे बेकसूर युवाओं को, सड़े हुए सरकारी सिस्टम द्वारा तैयार अकाल मौत के गड्ढों में ढकेल कर. नोएडा में निकम्मे सरकारी तंत्र द्वारा तड़फा-तड़फा कर कथित रूप से मार डाले गए इंजीनियर युवराज मेहता की अकाल-मौत के मामले से. दिल्ली जलबोर्ड तो और भी चार कदम आगे निकला.

सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे!

इसे इत्तिफाक कहें या फिर तयशुदा बेकाबू भ्रष्ट सरकारी तंत्र द्वारा आयोजित बेकसूरों की “अकाल मौत” का मनहूस सरकारी सेवा संस्थानों जैसे नोएडा पुलिस, दिल्ली पुलिस, दिल्ली जलबोर्ड, नोएडा विकास प्राधिकरण, नोएडा दमकल सेवा और राज्य आपात बचाव दल या सेवा, द्वारा दसवां तेरहवीं का सा शोकपूर्ण कोई आयोजन...कि यूपी में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है.. जहां युवा इंजीनियर युवराज मेहता को सरकारी तंत्र द्वारा असमय ही कथित रूप से मौत के मुंह में धकिया डाला गया. और उसके 20-21 दिन के भीतर ही नोएडा से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित देश की राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके जनकपुरी में दिल्ली की भाजपा शासित और देश की सबसे काबिल समझी जा रहीं महिला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में हाँफ रहा नाकारा निकम्मा भ्रष्ट दिल्ली जल बोर्ड. प्राइवेट बैंक के असिस्टेंट मैनेजर 25 साल के कमल ध्यानी की जिंदगी पर झपट्टा मारकर उसके बेकसूर परिवार की खुशियों पर ग्रहण लगाकर....एक हंसते-खेलते परिवार की ऐसी की तैसी करे बैठा है.

CM हैं दिल्ली जलबोर्ड की अध्यक्ष

कमल ध्यानी की दिल्ली जलबोर्ड द्वारा खोदे गए अकाल मौत के गढ्ढे में मोटर साइकिल सहित आधी रात के अंधेरे में जा गिरने से हुई उसकी दर्दनाक मौत की भयावह कहानी दुनिया को पता चल चुकी है. जान पहचान वाले अनजान या फिर बाकी तमाम जमाने वाले, हर कोई कमल ध्यानी की ऐसी रुह कंपाती मौत पर रो-बिलख रहा है. मगर बेशर्म दिल्ली जलबोर्ड और उसकी बॉस यानी दिल्ली जल बोर्ड अध्यक्ष मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता शमशानी खामोशी के कंबल में खुद को समेटे बैठी हैं. देश और दिल्ली में ही नहीं विदेशों में भी कमल ध्यानी की ऐसी डरावनी मौत पर कोहराम मचा है कि, भारत की राजधानी दिल्ली में कैसे दिल्ली सरकार के अधीन घिसट रहा भ्रष्ट और निकम्मा दिल्ली जलबोर्ड बेकसूर इंसानों के लिए “अकाल मौत” के सरकारी कुएं निशुल्क खोदकर तैयार करता है.

क्योंकि कमल ध्यानी CM या मंत्री का....

वे कुंए जिनमें बेकसूर अंजान इंसान खुद-ब-खुद ही आकर अपनी हंसती खेलती जिंदगी रुह कंपाती अकाल-मौत की भेंट अनजाने में चढ़ाने को मजबूर है, अगर यह कहूं कि जिन मतदाताओं या वोटरों अथवा आयकर दाताओं के बलबूते दिल्ली में भाजपा की हुकूमत बनी है. जिन वोटरों के बलबूते रेखा गुप्ता दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आज खुद को रानी साहिबा के रूप में सजा हुआ देख रही हैं. वे खुद ही तो दिल्ली जलबोर्ड की चेयरमैन भी हैं. कमल ध्यानी की ऐसी मौत पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को आखिर सर-ए-आम रोना क्यों नहीं आया. शायद इसलिए कि कमल ध्यानी दिल्ली की चीफ मिनिस्टर और दिल्ली जलबोर्ड की चेयरमैन रेखा गुप्ता या फिर बीजेपी के किसी बड़े नेता मंत्री- पार्टी अध्यक्ष या पदाधिकारी का खून के रिश्ते में कुछ नहीं लगता था...है न रेखा गुप्ता जी आपके सड़े हुए सरकारी सिस्टम का यही वीभत्स बजबजाता हुआ चेहरा....जिसे देखकर किसी भी सड़क के आम आदमी को घिन आ जाए.

हमाम में सब नंगे हैं

इन्हीं न-समझ सीधे-साधे दिल्ली के वोटर-मतदाताओं को उनके द्वारा मताधिकार का सदुपयोग करने के इनाम के बदले जनता की अकाल मौत के गढ्ढे जनता की ही गाढ़ी कमाई के टैक्स से जनता के लिए दिन रात खोदने में जुटा है. अंधा होकर यानी आंखे मूंदकर रेखा गुप्ता आपका दिल्ली जलबोर्ड. भला हो बिचारे 25 साल के बदकिस्मत कमल ध्यानी का जो वह दिल्ली जल बोर्ड द्वारा जनकपुरी में खोदे गए ऐसे ही एक सरकारी गडढे में अकाल मौत के रूप में अपने जीवन की बलि या कहिए आहूती देकर. दिल्ली में बाकी जिंदा बचे लाखों निरीह-बेकसूर लोगों को बचाकर, दिल्ली सरकार के सड़ांध भरे सिस्टम और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे पड़े दिल्ली जलबोर्ड के निकम्मे आला अफसरों-ठेकेदारों के सरकारी अंधत्व को तो सर-ए-आम चौराहे पर नंगा कर ही गया.

जलबोर्ड के गड्ढों में CM-मंत्री....

अपने ही जलबोर्ड द्वारा खोदे गए अकाल मौत के इन कुओं-गड्ढों में दिल्ली सरकार का कोई मंत्री-अफसर खुद कूदकर अपनी जान दे देकर यह तो कतई टेस्ट या चेक नहीं करेगा न कि, क्या दिल्ली जलबोर्ड द्वारा खोदे गए इन सरकारी मौत के कुओं में कमल ध्यानी जैसे देश-दिल्ली के बेकसूर आयकरदाता और मतदाता अकाल मौत भी मर सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि दिल्ली सरकार के अधीन कार्यरत और निजी ठेकेदारों के रहम-ओ-करम की बैसाखियों पर घिसटता दिल्ली जलबोर्ड ही दिल्ली के लोगों को, “अकाल-मौत” के मुंह में धकेलने के लिए इकलौता मेहनत मशक्कत करके हाँफ रहा हो. इसमें दिल्ली पुलिस भी अंधे गूंगे-बहरे निकम्मे दिल्ली जलबोर्ड के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती-घिसटती हाँफती दिखाई दे रही है. यह मैं नहीं कह रहा हूं. इस मामले में जिस तरह से पश्चिमी दिल्ली जिला का जनकपुरी थाना हरकतें कर रहा है, वे सबको दिखाई दे रही हैं.

तो दिल्ली पुलिस के साथ अन्याय होगा

दिल्ली पुलिस को इस शर्मनाक काले कांड से दूध की मख्खी की मानिंद दूर छिटक कर बेदाग बचा देना या एकदम सिरे से दिल्ली पुलिस को इसका कोई ‘क्रेडिट’ अथवा “श्रेय” न देना भी न्यायसंगत नहीं होगा. अब समझो खुद को स्कॉटलैंड स्टाइल पर काम करने का दम भरते भरते भी कभी न थकने वाली ऐसी मक्कार पश्चिमी दिल्ली जिला पुलिस और उसके जनकपुरी थाना पुलिस की कारस्तानी और कथित सड़ांधी सरकारी काबिलियत की कथनी-करनी में फर्क की इनसाइड स्टोरी.

वाह दिल्ली पुलिस वाह...बद्दुआओं से तो डर

कमल ध्यानी की दुखद और डरावनी अकाल मौत में खुद की खाल बचाने के लिए पश्चिमी दिल्ली जिला पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, जो उसे करना ही था. वरना अदालत और देश-दिल्ली की जनता जनकपुरी थाना पुलिस की ऐसी की तैसी कर डालती. मतलब मुकदमा दर्ज करके जनकपुरी थाने ने कोई अहसान नहीं किया. अब जब इस मामले में पश्चिमी दिल्ली जिला पुलिस की गर्दन फंसी तो उसने फटाफट इक्का दुक्का छुटभैय्या टाइप को गिरफ्तार करने की रफ्तार बढ़ा दी. दिल्ली पुलिस को गिरफ्तार करना चाहिए था सबसे पहले सड़े हुए सुस्त दिल्ली जलबोर्ड के जिम्मेदार अफसर-इंजीनियर को.

जनकपुरी पुलिस यूपी के इटावा से घेर उस गरीब को लाई जिसने सबसे पहले घटना की खबर दी थी. और जिसके घर में चूल्हा भी साबुत नहीं है. दो जून की रोटी का भी जुगाड़ जिस लेबर-मजदूर के घर में मयस्सर नहीं है. शायद खाकी की इसी कारस्तानी को कहते होंगे कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का...मतलब..जब पुलिस भी सरकारी और दिल्ली जलबोर्ड भी सरकारी...तब फिर चोर चोर मौसेरे भाई भला किसी को क्यों कोई नुकसान पहुंचाएंगे. अथाह गहरे समुद्र का भी यही उसूल है कि उसमें मौजूद बड़ी मछलियां ही छोटी मछिलियों को खाकर अपना पेट भरती हैं. तो दिल्ली पुलिस ने भी जलबोर्ड के नामदार बड़े गैर-जिम्मेदार निकम्मे अफसरों को छोड़कर गरीब मजदूर को गिरफ्तार करके भला कौन सा गुनाह कर डाला. क्योंकि पुलिस से तो भूत भी डरते हैं पुलिस फिर भला किसी गरीब मजदूर की आहों बद्दुआओं से क्यों खौफ खाएगी.

यहां भी दिल्ली पुलिस “खेल” कर गई

इस सब कर्म-कुकर्म से भी ज्यादा गंभीर शर्मनाक यह है कि अमूमन इस काले खतरनाक कांड में जब गिरफ्तार मुलजिमों की कोर्ट या जेल में पहचान के लिए टीआईपी यानी, टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड करवानी ही नहीं है...तो इन मुलजिमों के दिल्ली के जनकपुरी थाने की पुलिस मुंह मफलर या कपड़े से ढककर मीडिया के सामने क्यों नचा या टहला रही है...मुलजिमों का मुंह जान-बूझकर ढकवाने के पीछे भी क्या पश्चिमी दिल्ली जिले का जनकपुरी थाना कोई “अंदरखाने” अपने मतलब के लिए कोई “डर्टी गेम” करे बैठा है...क्योंकि जिन मुलजिमों की कोर्ट के आदेश से शिनाख्ती यानी पहचान परेड करवानी होती है, पुलिस को उन्हीं मुलजिमों के चेहरे ढकने होते है...और शिनाख्ती परेड उन मुलजिमों की होती है...जो अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसे संगीन मामलों में लिप्त या संदिग्ध होने पर गिरफ्तार किए जाते हैं.

वकीलों के सामने गिड़गिड़ाने वाली पुलिस

यहां साफ है कि दिल्ली के जान-बूझकर अंधे बहरे गूंगे और कहूं तो लकवाग्रस्त सरकारी सिस्टम के मुंह पर थूकते दिल्ली जलबोर्ड द्वारा खोदे गए अकाल मौत के कुएं में अपना जीवन अनजाने में बलि चढ़वा चुके कमल ध्यानी के मरने के बाद. अब इस कांड के बेशर्म बेहया मुलजिमों-संदिग्धों के चेहरे पश्चिमी दिल्ली जिले के जनकपुरी थाने की पुलिस यूं ही “फोकट” में तो कतई नहीं छिपा रही होगी. इसके पीछे भी मास्टरमाइंड उस खाकी वर्दी का कोई न कोई तिकड़मी दिमाग जरूर होगा जो दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली जिला के सागरपुर थाने में दिल्ली के वकीलों तक को न घुसने देने का दम भरती हो. जो दिल्ली पुलिस (सागरपुर थाना पुलिस) वकीलों को पहले तो “बिकाऊ” कहे और फिर बाद में भले ही चाहे दक्षिण पश्चिमी दिल्ली जिले के सागरपुर थाने के बदजुबान एसएचओ इंस्पेक्टर और उसकी दोनो बेकाबू महिला थानेदारनियों को, वकीलों के हाथों पिटने से बचने के लिए अपने ही थाने से सिर पर पांव रखकर क्यों न भागना पड़ा हो.

यहां भी दिल्ली पुलिस खेल कर गई

मजे की बात यह है कि भ्रष्ट जलबोर्ड के निकम्मे गैर-जिम्मेदार ठेकेदार, अफसर-बाबू के खिलाफ जनकपुरी थाना पुलिस ने अपहरण या बलात्कार करने का मुकदमा ही दर्ज नहीं किया है...दिल्ली जलबोर्ड के निकम्मे कारिदों ने तो आपस में मिल-बांटकर देश के एक बेकसूर-निरीह आयकर दाता और वोटर कमल ध्यानी का जान-बूझकर सरकारी-कत्ल किया है! जिसमें मुजरिमों या मुलजिमों की दिल्ली पुलिस को कोर्ट में टीआईपी भी नहीं करानी है. मतलब साफ है कमल ध्यानी जैसे होनहार युवक की कथित सरकारी हत्या के जिम्मेदार इन मुलजिमों की पहचान जनमानस में न कराकर. अब दिल्ली पुलिस उनके चेहरे ढकने का ठेका अपने कंधों पर लादकर यूं ही बिना किसी निजी स्वार्थ के फोकट में तो एक जगह से दूसरी जगह नहीं भटक रही होगी. यहां भी दाल में कुछ काला छोड़ो, जलबोर्ड और दिल्ली के जनकपुरी थाना पुलिस की पूरी दाल ही काली नजर आ रही है.

मैं तेरी पीठ खुजाऊं तू मेरी पीठ खुजा

दिल्ली जलबोर्ड के भ्रष्ट और निकम्मे सड़े हुए सरकारी तंत्र की बलि चढ़ चुके कमल ध्यानी का परिवार तो इस चोट से हमेशा हमेशा के लिए लहुलुहान हो चुका है. अपनी और दिल्ली जलबोर्ड के भ्रष्ट अफसरों-ठेकेदारों की खाल बचाने में जुटी दिल्ली पुलिस ने भी जलबोर्ड के असल निकम्मे ठेकेदार की जगह कुछ छोटे-मोटे लाचार-बेबसों को गिरफ्तार कर डाला. ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे न. आज मीडिया में भी इस सरकारी कत्ल पर कोहराम मचा है. आइंदा इस सरकारी अकाल मौत की जांच का हश्र भी दिल्ली से सटे नोएडा के इंजीनियर युवराज मेहता की मौत की जांच से कम बुरा नहीं होगा. इसकी गारंटी ऐसे सड़े हुए सरकारी सिस्टम में देने-लेने की कुव्वत भला किसकी होगी? मतलब दिल्ली पुलिस और दिल्ली जलबोर्ड दोनो ही “मैं तेरी पीठ खुजाऊं तू मेरी पीठ खुजा” की कहावत पर सरपट दौड़ रहे हैं.

तुम डाल-डाल हम पात-पात

खबरों के मुताबिक पश्चिमी दिल्ली जिले के जिस जनकपुरी थाना इलाके में दिल्ली जलबोर्ड के द्वारा खोदे गए सरकारी-अकाल मौत के कुएं में बेकसूर कमल ध्यानी अपनी हंसती खेलती जिंदगी की बलि देने को जबरन मजबूर कर डाला गया, उस थाना जनकपुरी की पुलिस ने घटना के बाद कमल ध्यानी के मोबाइल की लोकेशन घटना स्थल से करीब 200 मीटर दूर ताड़ ली थी. जनकपुरी थाने से पुलिस स्टाफ आंखों पर खाकी वर्दी के अहम अहंकार का सरकारी काला-पट्टा लगाकर मौके पर गया भी...जनकपुरी थाने का पुलिस स्टाफ जिस जगह कमल ध्यानी गड्ढे में मय मोटर साइकिल पड़ा हुआ बेशकीमती जिंदगी के बचने की बेईमान चाहत-उम्मीद में हर लम्हा अकाल मौत की ओर घिसट रहा था. वहां से 200 मीटर दूर पार्क में तो जनकपुरी थाने के भीतर से ही आंखों पर सरकारी काली पट्टी बांधकर निकला...दिल्ली पुलिस स्टाफ भटकती आत्मा का सा टहलता रहा...मगर उसने भी दिल्ली जलबोर्ड के द्वारा खोदे गए सरकारी अकाल मौत के चंद कदम पर दिखाई दे रहे गड्ढे के भीतर झांक कर अपनी तौहीन कराना गंवारा नहीं किया.

अब सोचिए कि आखिर अरबों रुपए सालाना बजट वाले सड़े हुए सरकारी तंत्र के बिस्तर पर बेशर्मी से आंखें बंद करके धूनी रमा कर सोते हुए दिल्ली जलबोर्ड और खुद को सबसे ज्यादा होशियार समझने वाली दिल्ली पुलिस भला इस कड़वी सच्चाई को गले उतार पाएगी. कदापि नहीं. क्योंकि जमाना तो “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” वाला है. सरकारी सड़े सिस्टम पर जो भी थूकेगा. यह गलीच बदबूदार सड़ा हुआ सरकारी सिस्टम अपने ‘डर्टी गेम’ की असहनीय बदबू के दायरे में उसी को घेरने को बौखलाएगा. कोई बात नहीं “चोर के पांव” ज्यादा नहीं होते हैं और अगर दिल्ली जलबोर्ड या दिल्ली पुलिस को इसमें कुछ नागवार गुजरता भी है तो तय मानो कि, भीड़ में भी अपनी दाढ़ी सबसे पहले वही टटोल कर देखता है जो होता तो चोर है मगर जिसकी दाढ़ी में सच में तिनका तो मौजूद ही नही होता है.

'सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई

क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई'...

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