‘कानून जेब में SHO भगवान, थाने में पुलिस ऊंट पर घूमे या हाथी पर’, दिल्ली पुलिस ऐसी है तो फिर वकील ‘बिकाऊ’ कैसे हो गए!
दिल्ली के सागरपुर थाने के SHO और दो महिला दरोगाओं के कथित अपमानजनक बयान के बाद वकीलों और पुलिस के बीच टकराव बढ़ गया. नौबत यहां तक आ गई कि थाने के एसएचओ को भागना पड़ गया.;
कहते हैं कि पुलिस अगर अपनी पर उतर आए तो भूतों को भी पसीना आ जाता है. या फिर पुलिस के आगे भूत भी पनाह मांगते हैं. भारत में खाकी वर्दी की खुराफातों को लेकर कहावत तो यह भी कुख्यात है कि पुलिस अपने बाप से नहीं डरती.... यहां तक कि जिस न्याय-व्यवस्था यानी कोर्ट और जजों के रहम-ओ-करम की बैसाखियों पर तमाम उम्र खाकी वर्दी वाली पुलिस...कोर्ट कचहरियों में कानून की किताबों के ऊपर बैठकर इधर से उधर दौड़ती भागती-घिसटती दिखाई पड़ती है.
यही पुलिस अगर अपनी पर उतर आए तो इसकी शैतान खुराफाती सोच के सामने महामहिम हो या मुंसिफ अथवा कोई मजिस्ट्रेट... सब के सब बौने और लाचार बिचारे ही नजर आते हैं. दिल्ली की ही क्यों भारत में किसी भी राज्य की पुलिस जब ‘कफनखसोटी’ पर उतर आए तो वह अपने बाप पर भी रहम न खाए.
हुकूमत की नाक के नीचे बेकाबू वर्दी
आज हम और आप मिल बांटकर बेबाक बात कर रहे हैं...खाक में मिलती बेकाबू हो चुकी खाकी वर्दी यानी दक्षिण पश्चिमी दिल्ली जिला के सागरपुर थाने के बेकाबू एसएचओ और पुलिस की. बिहार, झारखंड या छत्तीसगढ़ जैसे देश के किसी दूर दराज राज्य की पुलिस की मनमानी की बात नहीं. बात स्कॉटलैंड स्टाइल पर काम करने का दम भरने वाली उस राजधानी दिल्ली पुलिस की, जिस दिल्ली शहर में मौजूद देश की हुकूमत यानी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री गृहमंत्री दिल्ली में ही बैठे-बैठे देश के किसी भी कोने में किसी भी गलत काम और, अफसर का खात्मा पलक झपकते करने की कुव्वत रखती या रखते हैं. सिवाए दिल्ली पुलिस को काबू कर पाने के... जो दिल्ली पुलिस इस कदर की ताकतवर हुकूमत की नाक के नीचे जमी रहकर भी बाज नहीं आती है अपनी मनमानी करने से.
बच्चों की सी बचकाना हरकतें
मैं बात कर रहा हूं उस दिल्ली पुलिस की किसी पिछड़े हुए ग्रामीण इलाके के उस बालक की तरह जो दिन के उजाले में ही गांव के मेले में लाल पीला काला नीला हरा रंग-बिरंगी चश्मा आंखों पर चढ़ाए...भीड़ में इधर से उधर “स्वत: शांति सुखाए” का बीन बजाता हुआ, न-समझी में बचकाना हरकतें करता हुआ इधर उधर कूदता-फांदता रहता है. वही दिल्ली पुलिस जो खुद को पीड़ितों की खैर-ख्वाह या मित्र होने की दिन-रात झूठी कसमें खाकर दिल्ली की पीड़ित जनता को अपनी वर्दी और कानून के कथित सुरक्षित साये में महफूज रखने का झूठा दमखम भरते नहीं थकती है. वही दिल्ली पुलिस जो अपने सामने बेबस-लाचार होकर दिल्ली के थाने-चौकी में मदद की उम्मीद में पहुंचे पीड़ित-मजलूमों को हंस हंस कर सिवाए अंधा-गूंगा और बहरा से ज्यादा कुछ नहीं समझती है.
सागरपुर थाने की बेर्शम पुलिस
दिल्ली पुलिस की अंदर की जमीनी हकीकत कहूं या फिर कड़वी सच्चाई किस कदर की कड़वी-कसैली या कहिए खौफनाक है, इसका हालिया बेहद शर्मसार करने वाला नूमना जमाने ने अपनी खुली आंखों से हाल ही में फरवरी 2026 में देखा है. तब जब राष्ट्रीय राजधानी के दक्षिण पश्चिमी जिले का कानून से बेखौफ और खाकी वर्दी में बेकाबू हुआ पड़ा सागरपुर थाने का एसएचओ इंस्पेक्टर राजकुमार किसी दुष्कर्म पीड़िता को ही धमकाता हुआ मोबाइल कैमरे में चोरी छिपे 'भर-धर' लिया गया. खुद को थाने का 'भगवान' समझने वाला एसएचओ ही जब पीड़ितों को डराने-गरियाने और खुलेआम धमकाने लगे, तो सोचिए भला मातहत हवलदार सिपाही थानेदारों को अपने ही थाने के भीतर ऊंट और हाथी पर बैठकर चाय-नाश्ता करने से कोई एसएचओ या कोई भी और ताकत कैसे रोकने की हिमाकत कर सकती है?
ऐसी पुलिस भगवान भरोसे
‘थाना अपना पुलिस अपनी कानून अपना और कलम अपनी जेब की...’ ऐसी विकृत सोच वाली पुलिस जो पीड़ित को धक्के मारकर थाने से भगा देने की बेशर्म-बेहया हरकत कर डालना, किसी के भी खिलाफ मुकदमा दर्ज कर डालना, या फिर मुकदमे में किसी कसूरवार मुलजिम को साफ बचा देने और किसी बेकसूर को मुकदमे में जेल भेज कर उसकी जिंदगी तबाह कर डालने की ताकत... जब जिस पुलिस थाने के एसएचओ की जेब में हो तब फिर ऐसे में सागरपुर थाने के इंस्पेक्टर जैसे SHO और उसकी मातहत दो दो बेकाबू महिला दारोगाओं को भला कौन कैसे और क्यों कानून के खौफ से सजग-सतर्क रखवा सकता है.
बेकाबू बौराया SHO-थानेदारनियां
सो दिल्ली के सागरपुर थाने के बेकाबू-बदजुबान इंस्पेक्टर एसएचओ की मातहत दो महिला सब इंस्पेक्टरों-थानेदारनियों ने तो कानूनी ताकत अपने हाथ में होने के जोश में होश खोकर या कहिए बौरा कर पीड़िता को थाने के भीतर ही खुलेआम यहां तक सुना डाला कि “तेरा वकील हमारा क्या करेगा...वकील तो पैसों पर बिकते हैं...वकीलों को तो हम थाने में भी न घुसने दें.” मतलब साफ है कि जब और जिस थाने का इंस्पेक्टर एसएचओ ही इस कदर का बेकाबू बदुजुबान-बेखौफ हो, तो उसकी मातहत महिला थानेदार-दरोगाइनें भला कैसे नेकजुबान या सुधरी हुई सलीकेदार हो सकती हैं. थाने के मातहत हवलदार सिपाही दारोगा तो बेगैरत उस्ताद यानी एसएचओ से दस कदम आगे बढ़कर ही कूदेंगे फांदेंगे न. वे यही सोंचेंगे न कि उनके थाने का बेलगाम बिगड़ैल एसएचओ इंस्पेक्टर जब हमारा उस्ताद यानी माई बाप है, कानून और खाकी वर्दी की ताकत हमारी जेब में गुलाम-बंधक बनी पड़ी है, हम थाने के भगवान हैं.
थाने में ऊंट पर बैठ कर घूमें या हाथी पर
तब हम अपने थाने के भीतर ऊंट पर बैठकर चाय नाश्ता करें या फिर थाने के भीतर हाथी की पीठ पर चढ़कर मॉर्निंग वॉक अथवा योगा-आसन करें, पीड़ित जनता हमारी अकूत कानूनी ताकत के सामने क्या बेचती है... बस खाकी वर्दी बदन पर आने के बाद दिमाग में जबरन आ घुसी इन्हीं गफलत और गलतफहियमों ने सागरपुर थाने के बदजुबान एसएचओ इंस्पेक्टर और उसकी मातहत दो महिला दारोगाओं में से हाल-फिलहाल कुछ वक्त के लिए ही सही, एक को लाइन हाजिर और दूसरी को सस्पेंड करवा डाला. हालांकि यह मास्टरमाइंड बदजुबान गुरु सागरपुर थाने का लाइन हाजिर होने वाला इंस्पेक्टर एसएचओ और उसकी बिगड़ैल दोनों महिला थानेदार दारोगा शिष्याएं पैनी नजर से ताड़ते रहिए, कुछ वक्त बाद ही बहाल होकर फिर दिल्ली के किसी थाने चौकी या पुलिस दफ्तर में तांडव मचाते दिखाई दे जाएंगे.
चोर चोरी से जाए हेराफेरी से न जाए
क्योंकि दो बदनाम कहावतें समाज में मशहूर हैं, पहली कि चोर चोरी से जाए हेराफेरी से न जाए या फिर दूसरी कहावत कि कुत्ते की दुम 12 साल नलकी में बंद रखी 12 साल बाद जब दुम को नलकी से बाहर निकला तब भी वह निकली टेढ़ी ही, आदि आदि. मतलब दिल्ली के सागरपुर थाने के इस बिगड़ैल बदजुबान इंस्पेक्टर एसएचओ और उसके साथ सस्पेंड लाइन हाजिर होने वाली उसकी दो बेकाबू मातहत महिला दारोगाओं जैसों को सुधारना किसी के वश की बात नहीं है.
बदजुबान बेलगाम SHO-SI, मजबूर डीसीपी!
इन तीन में से दो को लाइन हाजिर और तीसरी महिला दारोगा को दक्षिण पश्चिमी दिल्ली जिला के डीसीपी आईपीएस अमित गोयल ने आनन-फानन में इसलिए सस्पेंड या लाइन हाजिर नहीं किया है कि डीसीपी साहब जिले में तैनात ऐसे बेकाबू-बेलगाम मातहत पुलिस अफसर-कर्मियों पर जनहित में बहुत सख्त रवैया या पैनी नजर रखते हैं. बल्कि इन्हें हाल-फिलहाल डीसीपी ने कुछ समय के लिए ठिकाने लगाने में ही दक्षिण पश्चिम जिला और दिल्ली पुलिस की खैर इसलिए समझी है कि अबकी बार दिल्ली पुलिस का पाला उन काले कोट वाले वकीलों से पड़ा है जिनसे, 21 जनवरी 1988 को यानी कालांतर में अब से करीब 38 साल पहले उत्तरी दिल्ली जिला की डीसीपी रहते हुए देश की पहली और पूर्व महिला आईपीएस और पुदुचेरी की पूर्व अड़ियल राज्यपाल भी इन काले कोट वाले वकीलों से आमने सामने की भिड़ंत में जीत हासिल करने की जिद के जंजाल में फंसकर अब तक 38 साल बाद भी हलकान हुई पड़ी हैं.
ताकि खाकी को सनद रहे
दिल्ली के काले कोट वाले वकीलों से मुंहजोरी और बदजुबानी का नतीजा किस कदर खाकी वर्दी के माथे पर कभी न मिटने वाला काला-दाग होता है और खुद को कानून का खुदा समझने वाली बेकाबू पुलिस यानी खाकी वर्दी की मौजूदा पीढ़ी इन वकीलों की मायावी दुनिया के मकड़जाल में फंसकर तीस हजारी कोर्ट कांड का डरावना सच समझकर, अपना दिमाग आसमान से जमीन पर लाकर ठिकाने रखने के लिए चाहें तो “जस्टिस डी पी वाधवा कमेटी” की रिपोर्ट आंख चुराकर ही सही मगर पढ़ सकती है. ताकि आइंदा फिर कभी कोई दिल्ली के सागरपुर थाने का सा बेकाबू बेलगाम इंस्पेक्टर एसएचओ दुबारा काले कोट वाले वकीलों को छेड़कर इस छत्ते में हाथ डालने से पहले सौ नहीं तो कम से कम एक बार तो सोचेगा ही.
बदजुबान SHO सागरपुर थाना छोड़ भागा
उस 38 साल पुराने तीस हजारी कांड की तर्ज पर दिल्ली के वकीलों की आज की मौजूदा पीढ़ी ने जब सागरपुर थाने के अदना से बदजुबान बेलगाम बेकाबू और खुद को थाने का भगवान मानने वाले एसएचओ इंस्पेक्टर और, उसकी मातहत लड़ैती दो बेकाबू महिला थानेदारों ने काले कोट वालों की इज्जत पर ‘सफेदी’ उछालने की हिमाकत की...तो वे सब फैल-बिफर कर सागरपुर थाने पर जा चढ़े. जैसे ही सागरपुर थाने पर वकीलों के रेले ने तूफानी चढ़ाई की, तो अक्सर थाने में पहुंचे मजलूमों-पीड़ितों की खुद बेइज्जती करने और अपने मातहत हवलदार सिपाहियों थानेदारों से उनकी खुलेआम बेइज्जती कराते रहने वाला सागरपुर थाने का इंस्पेक्टर एसएचओ मय अपने कुछ मुहंलगे मातहत पुलिस स्टाफ के संग दबे पांव थाना छोड़कर ही भाग गया.
सागरपुर SHO तुम तो इतने डरपोक न थे
पीड़ितों पर दबंगई और थाने पहुंचे मजलूमों-फरियादियों के ऊपर पुलिसिया बहादुरी दिखाने वाला एसएचओ कैसे अपनी इज्जत बचाने के लिए थाना छोड़ सिर पर पांव रखकर अपने ही थाने से भागा, इसके सबूतों के बतौर रिकॉर्डिड सैकड़ों वीडियो से सोशल मीडिया अटा पड़ा है. स्टेट मिरर हिंदी या मैं संजीव चौहान दिल्ली पुलिस के लिए विशेष रूप से समर्पित “ऐसी की तैसी” की इस खास कड़ी में यह कोई एक्सक्लूसिव या फिर अपनी तरफ से पुलिस की तरह कोई हवाबाजी नहीं कर रहे हैं.
अहंकार तो रावण से विद्वान का नहीं बचा
कहते हैं कि सेर को सवा सेर मिल ही जाता है. धर्मग्रंथ पलटकर पढ़ लीजिए कि अहम-अंहकार और विनाशकाले बुद्धि विपरीत के फेर में फंसने पर ब्रह्माण के सबसे बड़े विद्वान-पंडित रावण और उनकी लंका तक का सत्यानाश होने से कोई नहीं बचा सका. तो फिर ऐसे में भला सोचो बेकाबू बदजुबान हुई दक्षिण पश्चिमी दिल्ली जिला के सागरपुर थाने की खाकी की बेजा बयानबाजी-बदजुबानी से भला दिल्ली के काले कोट वाले वकीलों की भीड़ ने अगर थाने पर चढ़ाई करके सागरपुर थाने के किसी बदजुबान इंस्पेक्टर एसएचओ और उसकी मातहत दो महिला थानेदारनियों (वूमेन सब-इंस्पेक्टर्स) या दरोगाइनों को औकात बताने के लिए कानून की किताब खोलकर ऐसे एसएचओ की मेज पर ले जा पटकी तो इसमें अनुचित क्या?
कभी नाव पानी पर कभी नाव में पानी
चंद घंटों में ही अर्श से फर्श पर वकीलों द्वारा ला पटका गया और खुद को वकीलों से चौतरफा घिरा देखकर बिचारा एसएचओ इंस्पेक्टर अपनी जान और इज्जत बचाने की खातिर थाना छोड़कर भाग न जाता तो क्या तीस हजारी कांड में अपनी छेछालीदर कराए बैठी पूर्व महिला आईपीएस की तरह सागरपुर थाने का बिगड़ैल यह एसएचओ इंस्पेक्टर भी अपना जुलूस हवलदार सिपाहियों के सामने निकलवाता. सो वकीलों द्वारा थाने पर धावा बोलते ही खुद को सागरपुर थाने का भगवान समझने वाला बड़बोला इंस्पेक्टर एसएचओ थाने से सिर पर पांव रखकर भाग खडा हुआ. यही उसके हित में भी रहा. वरना कल्पना करिए कि जो वकील खुद को अपने जमाने में देश की सबसे तुर्रम खां और देश की पहली महिला आईपीएस को जनवरी 1988 के तीस हजारी कोर्ट कांड में महीनों तक हलकान कर सकते हैं, दिल्ली के वे पेशेवर वकील क्या अपनी बदनामी पर दक्षिण पश्चिमी दिल्ली जिला के थाना सागरपुर एसएचओ-इंस्पेक्टर से आमना-सामना होने पर उसकी आरती उतारते! शायद क्या पक्का कभी आरती नहीं उतारते.
मरता भला क्या न करता
बेकाबू बदजुबान और कानून को अपनी जेब में बंद रखकर घूमने की गफलत का शिकार होकर खाकी वर्दी में पीड़ित जनता पर थाने के भीतर अक्सर, बत्तमीजी से पेश आने वाले सागरपुर थाने के एसएचओ इंस्पेक्टर के पास खुद की इज्जत और गर्दन बचाने की लाचारी-बेबसी में अपना ही थाना चोर-उचक्कों की तरह छिपते-छिपाते छोड़कर, वकीलों के हाथ लगने से पहले ही निकल भाग जाने के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं था.
SHO से पहले ये IPS जिम्मेदार हैं
दिल्ली के सागरपुर थाने के ऐसे बेलगाम बड़बोले मगर बेहद कमजोर साबित हुए और, वकीलों की थाने में घुसी भीड़ से खौफजदा होकर थाना ही छोड़कर भाग जाने वाला कोई इंस्पेक्टर क्या दिल्ली जैसे किसी मेट्रो शहर के थाने का एसएचओ बनने की काबिलियत रखता है? सवाल यह है कि आखिर इस तरह के बेलगाम बदजुबान इंस्पेक्टर को आखिर थाना एसएचओ बनाने की दिल्ली पुलिस मुख्यालय द्वारा गठित कमेटी में लिखित सिफारिश करने वाला या वाले आईपीएस कौन-कौन थे? जो यही नहीं ताड़ सके कि वे किस वाहियात इंस्पेक्टर को किसी थाने की जिम्मेदारी सौंपने की ठेकेदारी लेकर उसे एसएचओ बनाने की लिखित में सिफारिश कर रहे हैं? क्या दिल्ली के थानों में एसएचओ लगाए जाने वाले इंस्पेक्टरों के नाम पर विचार के लिए गठित आईपीएस अधिकारियों की कमेटी की ऐसे इंस्पेक्टर्स की एसएचओ लगाने के लिए सिफारिश करना, इन आईपीएस अफसरों की कार्य-प्रणाली पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी नहीं है?