'पैसे से नहीं पलता बचपन!', छत्तीसगढ़ एचसी का पिता को कस्टडी देने से इनकार, सौतन के ‘मां जैसे प्यार’ पर उठाए सवाल
Chhattisgarh High Court : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेमेतरा के एक पिता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एक सौतेली मां, बच्चे को वही प्यार और माहौल दे पाएगी जो उसकी सगी मां दे रही है. बच्चों की परवरिश के लिए भावनात्मक लगाव का होना भी जरूरी है. जानें क्या है पूरा मामला?;
Chhattisgarh High Court : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. आलत ने कहा कि बच्चे की परवरिश केवल आर्थिक सुरक्षा से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से होती है. इसी सोच को मजबूत करते हुए हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पिता को बच्चे की कस्टडी देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह मान लेना कि सौतन बच्चे को सगी मां जैसा प्यार देगी, महज एक अनुमान है, इसकी कोई गारंटी नहीं. हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब बदलते पारिवारिक ढांचे और बढ़ते कस्टडी विवादों के बीच अदालतें ‘बेस्ट इंटरेस्ट ऑफ चाइल्ड’ को सर्वोपरि मान रही हैं.
पिता ने क्यों मांगी थी कस्टडी?
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में पिता ने दलील दी थी कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है. दोबारा शादी कर चुका है. नई पत्नी बच्चे की देखभाल अच्छे से कर सकती है. पिता का कहना था कि वह बच्चे को बेहतर भविष्य, अच्छी शिक्षा और सुविधाएं दे सकता है.
हाईकोर्ट ने कस्टडी क्यों ठुकराई?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने इस मसले पर सबसे सबसे अहम टिप्पणी में कहा, “बच्चे की भलाई सिर्फ पैसे से तय नहीं होती. मां का स्नेह, सुरक्षा और भावनात्मक लगाव किसी और से बदला नहीं जा सकता.” कोर्ट ने यह भी बताया कि सौतन के व्यवहार की कोई कानूनी गारंटी नहीं होती. मां-बच्चे का रिश्ता जैविक और भावनात्मक दोनों होता है. बच्चे को मानसिक स्थिरता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. भारतीय संस्कृति में 'मां' सिर्फ पालने वाली नहीं, बल्कि बच्चे की पहली शिक्षक और भावनात्मक ढाल होती है. कोर्ट ने इस सामाजिक सच्चाई को भी रेखांकित किया.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि बच्चे की दुनिया सिर्फ सुविधाओं से नहीं, संवेदनाओं से बनती है और मां की जगह कोई भी चाहे वह कितनी ही नेक क्यों न हो पूरी तरह नहीं ले सकता. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पिता की अपील को खारिज कर दिया. कोर्ट ने माना कि दूसरी महिला के साथ रहने से पिता को बच्चे की कस्टडी देना उसके भविष्य के लिए सही नहीं होगा.
क्या था मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के कोड़वा के रहने वाले लक्ष्मीकांत से जुड़ा है. लक्ष्मीकांत की शादी साल 2013 में हुई थी और उनके दो बेटे हैं. पति-पत्नी के बीच लगातार विवाद के चलते मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. लक्ष्मीकांत ने अपने 7 साल के बड़े बेटे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इस फैसले को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बच्चे को उसकी सौतेली मां से वही प्यार और माहौल मिलेगा, जो उसे अपनी सगी मां से मिल रहा है.