पेंशन कोई इनाम नहीं, बल्कि कर्मचारी का हक है; Chhattisgarh High Court ने क्यों कही यह बात?
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, कोई 'इनाम' नहीं. 30 साल की देरी पर कोर्ट ने राज्य को 9% ब्याज देने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि सरकारी लापरवाही का नुकसान कर्मचारी के परिवार को नहीं उठाना चाहिए.
High Court of Chhattisgarh
(Image Source: High Court of Chhattisgarh )छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि पेंशन कोई 'सरकारी कृपा' नहीं, बल्कि कर्मचारी का कानूनी अधिकार है. लगभग तीन दशक की देरी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह रिटायर्ड कर्मचारी के परिवार को 9% ब्याज के साथ बकाया राशि का भुगतान करे.
यह फैसला Chhattisgarh High Court की डिवीजन बेंच ने दिया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और जस्टिस Ravindra Kumar Agrawal शामिल थे.
क्या है पूरा मामला?
- यह मामला जल संसाधन विभाग के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे आर.जे. अग्रवाल से जुड़ा है, जिन पर 1994 में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे थे. उसी साल उन्हें सस्पेंड किया गया और बाद में बहाल कर दिया गया, लेकिन विभागीय जांच लंबी खिंचती रही.
- अग्रवाल 31 जुलाई 1995 को रिटायर हो गए, लेकिन जांच खत्म नहीं हुई.
- हैरानी की बात यह रही कि यह जांच करीब 23 साल तक लंबित रही और आखिरकार 2019 में इसे बंद किया गया.
- इसके बावजूद पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ 2023 तक जारी नहीं किए गए.
- इस देरी से परेशान होकर अग्रवाल की पत्नी और बेटे ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. दिसंबर 2025 में सिंगल बेंच ने राज्य को 9% ब्याज देने का आदेश दिया, जिसे सरकार ने चुनौती दी थी.
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा;
- पेंशन और रिटायरमेंट लाभ कर्मचारी का अर्जित अधिकार है.
- प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा कर्मचारी या उसके परिवार को नहीं भुगतना चाहिए.
- इतनी लंबी देरी 'असाधारण' और अनुचित है.
- अगर भुगतान में अनुचित देरी होती है, तो ब्याज देना एक उचित और न्यायसंगत उपाय है.
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार ने दलील दी कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के तहत जब तक विभागीय जांच पूरी नहीं होती, ग्रेच्युटी जारी नहीं की जा सकती. साथ ही यह भी कहा गया कि देरी जानबूझकर नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक थी और ब्याज देने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है.
अदालत ने क्या जवाब दिया?
अदालत ने राज्य के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय के पास 'न्याय, समानता और निष्पक्षता' के आधार पर राहत देने का अधिकार है, भले ही कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो.
फैसले का क्या है महत्व?
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ा संदेश है कि;
- पेंशन उनका हक है, कोई एहसान नहीं
- सरकारी देरी के कारण उनके अधिकारों का हनन नहीं हो सकता
- लंबे समय तक बकाया रखने पर सरकार को ब्याज देना होगा