किंगमेकर या ‘पॉलिटिकल सर्वाइवर’? क्या है Nitish Kumar की असली पहचान
बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमा की भूमिका को लेकर अक्सर दो शब्द सामने आते हैं.किंगमेकर और पॉलिटिकल सर्वाइवर. बदलते गठबंधनों और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच उनकी असली पहचान क्या है, यही इस विश्लेषण का विषय है.
भारतीय राजनीति में कुछ नेता अपनी विचारधारा से पहचान बनाते हैं, कुछ अपने करिश्मे से और कुछ अपनी राजनीतिक चतुराई से. नीतीश कुमार उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच खुद को प्रासंगिक बनाए रखा. यही वजह है कि उन्हें कभी किंगमेकर तो कभी पॉलिटिकल सर्वाइवर कहा जाता है.
आज जब बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में उनके भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हैं, तब यह सवाल फिर उठने लगा है कि नीतीश कुमार की असली पहचान क्या है? क्या वे सत्ता के गणित को साधने वाले किंगमेकर हैं या फिर बदलते हालात में खुद को बचाए रखने वाले राजनीतिक सर्वाइवर?
क्या है नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर?
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1970 के दशक के छात्र आंदोलनों से शुरू हुआ. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से प्रभावित होकर राजनीति में आए. बाद में उन्होंने समाजवादी धारा के नेताओं के साथ मिलकर अपनी पहचान बनाई. 1990 के दशक में जब मंडल और कमंडल की राजनीति अपने चरम पर थी, तब नीतीश कुमार ने बिहार में लालू यादव केएक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में खुद को स्थापित किया.
साल 2005 में जब उन्होंने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली, तब राज्य की छवि पिछड़ेपन और खराब कानून व्यवस्था से जुड़ी हुई थी. नीतीश कुमार ने विकास, सड़क, बिजली, शराबबंदी, जाति, आरक्षण और कानून व्यवस्था को अपनी राजनीति का मुख्य एजेंडा बनाया.
क्यों कहा जाता है उन्हें पॉलिटिकल सर्वाइवर?
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि उन्होंने बदलते राजनीतिक माहौल में खुद को ढाल लिया. उन्होंने कई बार अपने राजनीतिक सहयोगी बदले. कभी उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई, तो कभी उससे अलग होकर महागठबंधन का हिस्सा बने. बाद में फिर भाजपा के साथ आ गए और फिर उससे अलग होकर नए समीकरण बनाए.
'पॉलिटिकल सर्वाइवर' कैसे?
नीतीश की इसी वैचारिक अवसरवादिता की वजह से आलोचक उन्हें 'पॉलिटिकल सर्वाइवर' कहते हैं. ऐसा नेता जो हर परिस्थिति में अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने का रास्ता ढूंढ लेता है. हालांकि, उनके समर्थक इसे अवसरवाद नहीं बल्कि जमीनी राजनीति बताते हैं.
क्या वे राष्ट्रीय राजनीति के 'किंगमेकर' भी रहे हैं?
नीतीश कुमार को कई बार राष्ट्रीय राजनीति में संभावित “किंगमेकर” के रूप में देखा गया. 2013 में उन्होंने भाजपा से अलग होकर अपनी अलग राजनीतिक लाइन बनाई. 2015 में उन्होंने विपक्षी दलों के साथ मिलकर बिहार में बड़ी जीत हासिल की. उस समय कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम चेहरा माना. साल 2023–24 के दौरान जब विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशें हुईं, तब भी नीतीश कुमार को इस प्रक्रिया का प्रमुख रणनीतिकार माना गया.
बिहार की राजनीति में उनकी पकड़ क्यों मजबूत रही?
- बिहार में नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. पहला, उन्होंने विकास और सुशासन की छवि बनाने की कोशिश की. सड़क, बिजली, कानून व्यवस्था और शराबबंदी से अपनी नई पहचान बनाई. , हालांकि, शराबबंदी वो कितना सफल रहे यह एक बहस का मसला है. बावजूद इसके उन्हें महिलाओं को खुलकर समर्थन मिला.
- दूसरा, उन्होंने सामाजिक समीकरणों को साधने में भी बड़ी भूमिका निभाई. बिहार में कुर्मी वोट बैंक ज्यादा नहीं है, लेकिन सवर्ण, यादव और मुस्लिम वोट बैंक को कभी बीजेपी तो कभी लालू यादव से तालमेल बैठाकर उसे साधने में सफल रहे.
- तीसरा, उन्होंने गठबंधन की राजनीति को बहुत बारीकी से समझा और समय के अनुसार फैसले लिए. इसी रणनीति के कारण वे लंबे समय तक बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहे.
नीतीश की राजनीति में आलोचना क्यों होती है?
नीतीश कुमार की राजनीति पर आलोचना भी कम नहीं हुई है. कई विरोधी दलों का आरोप है कि उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए बार-बार राजनीतिक पाला बदला. इस कारण उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं. कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि उनकी राजनीति “स्थिर विचारधारा” से ज्यादा राजनीतिक गणित पर आधारित रही है.
क्या बदल रही है नीतीश कुमार की भूमिका?
हाल के वर्षों में बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में नए नेतृत्व के उभरने से नीतीश कुमार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. फिर भी यह सच है कि तीन दशकों से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति में बने रहना और लगातार सत्ता के केंद्र में रहना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होता.
आखिर क्या है, उनकी असली पहचान?
अगर पूरी राजनीतिक यात्रा को देखा जाए तो नीतीश कुमार को केवल एक श्रेणी में बांधना आसान नहीं है. वे एक तरफ ऐसे नेता हैं जिन्होंने कई बार सत्ता के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभाई, इसलिए उन्हें किंगमेकर कहा गया. वहीं दूसरी ओर उन्होंने बदलती परिस्थितियों में खुद को बचाए रखा, इसलिए उन्हें पॉलिटिकल सर्वाइवर भी कहा जाता है.
शायद यही वजह है कि भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बन गई है जो हर दौर में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कला जानते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी मानी जाती है.