Local to Vocal: वसंत उत्सव बना ‘फूड ऑडिशन’ प्लेटफॉर्म, बिहार का कौन सा 'फूड' बनेगा अगला GI ब्रांड?
बिहार विधानसभा में उठी GI टैग की मांग अब वसंत उत्सव तक पहुंच गई है, जहां लोकल फूड का ‘ऑडिशन’ होगा. खोबी की लाई, तिलकुट और रसगुल्ले जैसे व्यंजन ग्लोबल पहचान पाने की दौड़ में शामिल हैं.
बिहार विधानसभा में लोकल फूड आइटम की पहचान और संरक्षण को लेकर दिलचस्प बहस देखने को मिली. बाढ़ की प्रसिद्ध ‘खोबी की लाई’ को GI टैग दिलाने की मांग उठी तो चर्चा राज्य के अन्य पारंपरिक फूड आइटम तक फैल गई. अब इन फूड आइटमों की टेस्टिंग और प्रदर्शन 25 फरवरी को वसंत उत्सव प्रदर्शनी में होने वाला है, जिसके बाद जीआई प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है
क्या बिहार में ‘फूड ऑडिशन’ का नया ट्रेंड शुरू हो गया है?
विधानसभा में चर्चा के बाद अब वहां की सांस्कृतिक विरासत केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे GI Tag के जरिए वैश्विक बाजार में नई ऊंचाइयां मिलेंगी. बिहार विधानसभा में ‘खोबी की लाई’ को लेकर शुरू हुई चर्चा ने एक ऐसा मोड़ लिया कि राज्य के हर जिले के विशिष्ट फूड आइटम को GI Tag टैगिंग दिलाने की होड़ मच गई है.
वसंत उत्सव क्यों बन गया ‘फूड टेस्टिंग लैब’?
विधानसभा अध्यक्ष से लेकर उपमुख्यमंत्री तक, सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों के प्रसिद्ध व्यंजनों की पैरवी की है. 25 फरवरी को होने वाला ‘वसंत उत्सव’ इस दिशा में पहला बड़ा कदम साबित होगा, जहां इन उत्पादों की क्वालिटी और ऐतिहासिकता का परीक्षण किया जाएगा.
खोबी की लाई से कैसे शुरू हुई GI टैग की बहस?
विधानसभा में विधायक डॉ. सियाराम सिंह ने बाढ़ की ‘खोबी की लाई’ को सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बताते हुए इसे GI टैग दिलाने की मांग रखी. उनका कहना था कि यह परंपरा, स्वाद और स्थानीय कारीगरी का प्रतीक है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए.
क्या गया का तिलकुट भी GI टैग की रेस में है?
विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने इस मुद्दे को व्यापक बनाते हुए गया के प्रसिद्ध तिलकुट सहित अन्य पारंपरिक फूड आइटमों को भी इसमें शामिल करने का सुझाव दिया. उन्होंने बताया कि 25 फरवरी को आयोजित वसंत उत्सव प्रदर्शनी में इन फूड आइटमों की टेस्टिंग और प्रस्तुति होगी, जिसके बाद GI टैग प्रक्रिया के लिए पहल की जाएगी.
तिलकुट से रसगुल्ले तक- माननीयों ने की अपनी पसंद की पैरवी
चर्चा तब और दिलचस्प हो गई जब विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने गया जी के विश्वप्रसिद्ध तिलकुट को भी इस सूची में शामिल करने की बात कही. वहीं, उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने हल्के-फुल्के अंदाज में लखीसराय के बड़हिया के प्रसिद्ध रसगुल्लों का पक्ष रखा. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि मंत्री अक्सर इन मिठाइयों का स्वाद तो लेते हैं, लेकिन उन्हें सरकारी पहचान दिलाने में पीछे रह जाते हैं. इस हंसी-मजाक भरे माहौल के बीच यह तय हुआ कि बिहार के विभिन्न फूड आइटमों की प्रदर्शनी और टेस्टिंग 25 फरवरी को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा आयोजित वसंत उत्सव में की जाएगी.
क्या होता है GI टैग और बिहार के लिए क्यों है जरूरी?
GI टैग यानी ‘भौगोलिक संकेतक’ किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति, क्वालिटी और प्रतिष्ठा का प्रमाण होता है. बिहार के पास पहले से ही कतरनी चावल, जर्दालू आम, शाही लीची और मगही पान जैसे प्रतिष्ठित जीआई टैग मौजूद हैं.
अब नए फूड आइटमों को इस सूची में शामिल करने से न केवल स्थानीय कारीगरों और फूड आइटमों को अंतरराष्ट्रीय बाजार मिलेगा, बल्कि राज्य के पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा. खोबी की लाई और बड़हिया के रसगुल्ले जैसे फूड आइटमों को कानूनी सुरक्षा मिलने से इनकी नकल करना नामुमकिन हो जाएगा.
वसंत उत्सव क्यों बन गया ‘फूड टेस्टिंग लैब’?
अब सबकी निगाहें 25 फरवरी को होने वाले वसंत उत्सव पर टिकी हैं. यह प्रदर्शनी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बिहार के उन गुमनाम नायकों यानी स्थानीय व्यंजनों और शिल्पों के लिए एक लॉन्चपैड साबित होगी.
क्या GI टैग से बिहार की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा?
यहां होने वाली टेस्टिंग और समीक्षा के आधार पर ही तय होगा कि कौन सा उत्पाद GI टैग की लंबी कानूनी प्रक्रिया के लिए सबसे पहले भेजा जाएगा. बिहार सरकार की यह पहल राज्य की जड़ों से जुड़े उद्यमियों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है.
सरकार बोली - प्रक्रिया लंबी लेकिन संभव
उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल ने स्पष्ट किया कि GI टैग दिलाने की प्रक्रिया कानूनी और औपचारिक होती है. इसके लिए ऐतिहासिक प्रमाण, दस्तावेज और तकनीकी अध्ययन जरूरी होते हैं. उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि आवश्यक जानकारी उपलब्ध करायी जाती है तो राज्य सरकार इस दिशा में आगे बढ़ेगी, जैसा कि पहले भी कई उत्पादों के साथ किया जा चुका है.
क्या ‘Local to Vocal’ अब बिहार की नई पहचान बनेगा?
यह पहल दिखाती है कि बिहार अब अपने लोकल प्रोडक्ट्स को ग्लोबल मंच देने के लिए तैयार है. ‘फूड ऑडिशन’ जैसा यह मॉडल अगर सफल रहा, तो यह दूसरे राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकता है.