प्रियंका गांधी का नया फॉर्मूला असम में कांग्रेस के लिए बनेगा जीत की गारंटी, क्‍या है कैंडिडेट चुनने का नया सिस्‍टम?

असम चुनाव से पहले प्रियंका गांधी ने उम्मीदवार चयन में नया सिस्टम लागू किया है. जमीनी फीडबैक आधारित यह मॉडल कांग्रेस के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है.;

( Image Source:  Priyanka gandhi facebook )
Edited By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 18 Feb 2026 1:10 PM IST

असम विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में बड़ा प्रयोग शुरू कर दिया है. पार्टी महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस बार टिकट बांटने के लिए एक “नया सिस्टम” लागू किया है, जिसके तहत स्क्रीनिंग कमेटी को सीधे जमीनी स्तर पर जाकर संभावित उम्मीदवारों के बारे में फीडबैक जुटाने के निर्देश दिए गए हैं. इसी सिलसिले में प्रियंका गांधी वाड्रा दो दिन के दौरे पर गुरुवार को गुवाहाटी पहुंच रही हैं, जहां वे पार्टी नेताओं और स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों के साथ अहम बैठकें करेंगी.

नया सिस्टम क्यों खास माना जा रहा है?

इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा लागू किया गया यह “नया सिस्टम” कांग्रेस के लिए एक तरह का पायलट प्रोजेक्ट है, जिसे भविष्य में दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी अपनाया जा सकता है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह प्रयोग सिर्फ आसाम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यदि यह मॉडल सफल होता है तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर भी विचार किया जाएगा.

पहले उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया कैसी थी?

दरअसल, अब तक कांग्रेस की परंपरागत प्रक्रिया यह रही है कि स्क्रीनिंग कमेटी दिल्ली में बैठक करती है और राज्य के वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय राजधानी बुलाकर उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा होती है. लेकिन इस बार प्रियंका गांधी ने इस ढर्रे को बदलते हुए कमेटी के सदस्यों को सीधे जिलों में जाकर राजनीतिक और सामाजिक फीडबैक लेने का निर्देश दिया है. इसका उद्देश्य यह है कि टिकट वितरण में सिर्फ शीर्ष नेतृत्व की राय नहीं, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और ज़मीनी सच्चाई को भी बराबर वज़न मिले.

जमीनी फीडबैक लेने का मकसद क्या है?

स्क्रीनिंग कमेटी में सांसद सप्तगिरी शंकर उलाका, इमरान मसूद और वरिष्ठ नेता श्रीवेल्ला प्रसाद शामिल हैं. इन तीनों नेताओं को असम के अलग-अलग जिलों की ज़िम्मेदारी दी गई है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, प्रत्येक सदस्य को पांच-पांच जिले सौंपे गए हैं, ताकि वे वहां जाकर संभावित उम्मीदवारों, स्थानीय कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज के लोगों और यहां तक कि स्थानीय पत्रकारों से भी बातचीत कर सकें.

स्क्रीनिंग कमेटी में कौन-कौन शामिल हैं?

सूत्रों का कहना है कि ये सभी बैठकें बंद कमरे में हो रही हैं, ताकि लोग खुलकर अपनी राय रख सकें. इन दौरों के दौरान उम्मीदवार बनने की इच्छा रखने वालों से भी एक-एक करके मुलाकात की जा रही है. इसके बाद इन सभी फीडबैक और रिपोर्ट को स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में पेश किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता खुद प्रियंका गांधी वाड्रा करेंगी.

जिलों का बंटवारा किस आधार पर किया गया है?

इस “नए सिस्टम” में सामाजिक समीकरणों को भी खास तौर पर ध्यान में रखा गया है. पार्टी नेतृत्व ने जिलों का बंटवारा इस तरह किया है कि अलग-अलग समुदायों की वास्तविक स्थिति और राजनीतिक रुझान को समझा जा सके. उदाहरण के तौर पर, इमरान मसूद को उन जिलों की ज़िम्मेदारी दी गई है जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत अधिक है. वहीं, सप्तगिरी शंकर उल्का को आदिवासी बहुल इलाकों में भेजा गया है, क्योंकि वे स्वयं एक आदिवासी नेता हैं और इन क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं.

किन-किन जिलों में कौन जिम्मेदारी संभाल रहा है?

जानकारी के मुताबिक, इमरान मसूद को डिब्रूगढ़, धेमाजी, तिनसुकिया, बिस्वनाथ और उदलगुरी जिलों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. सप्तगिरी शंकर को माजुली, जोरहाट, गोलाघाट, कार्बी आंगलोंग और नगांव जिलों का प्रभार दिया गया है. वहीं, श्रीवेल्‍ला प्रसाद को चराइदेव, शिवसागर, लखीमपुर, सोनितपुर और दर्रांग जिलों में संभावित उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग का काम सौंपा गया है।

इमरान मसूद ने बताया कि वे लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं और विभिन्न वर्गों के लोगों से बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गैर-राजनीतिक लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों से भी राय ली जा रही है. उनके मुताबिक, यह पूरी रिपोर्ट जल्द ही स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष प्रियंका गांधी को सौंपी जाएगी, जिसके आधार पर टिकट वितरण को अंतिम रूप दिया जाएगा.

कांग्रेस को इस प्रयोग से क्या फायदा हो सकता है?

कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि इस प्रयोग से पार्टी को दो बड़े फायदे हो सकते हैं. पहला, उम्मीदवार चयन में पारदर्शिता बढ़ेगी और “दिल्ली से थोपे गए नाम” वाली छवि कमजोर होगी. दूसरा, स्थानीय कार्यकर्ताओं को यह संदेश जाएगा कि पार्टी उनकी आवाज़ सुन रही है और ज़मीनी सच्चाई को समझना चाहती है. इससे संगठनात्मक मजबूती भी बढ़ सकती है, जो पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस की एक बड़ी कमजोरी रही है.

असम में कांग्रेस की पिछली चुनावी स्थिति क्या रही है?

असम में कांग्रेस के लिए यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है. 2021 के विधानसभा चुनाव में 126 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 29 सीटों पर जीत मिली थी. दूसरी ओर, भाजपा ने 93 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 60 सीटें हासिल की थीं और सत्ता बरकरार रखी थी. इस बार कांग्रेस रणनीति में बदलाव कर भाजपा को कड़ी टक्कर देने की कोशिश कर रही है.

क्या यह “नया सिस्टम” भविष्य की राजनीति का मॉडल बन सकता है?

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, चाहे चुनावी नतीजे कुछ भी हों, यह नया सिस्टम भविष्य की राजनीति के लिए एक मॉडल बन सकता है. यदि यह प्रयोग सफल रहा तो इसे आने वाले अन्य राज्यों के चुनावों में भी अपनाया जाएगा. कांग्रेस के भीतर इसे संगठनात्मक सुधार की दिशा में एक बड़े कदम के तौर पर देखा जा रहा है.

कुल मिलाकर, प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा लागू किया गया यह “नया सिस्टम” सिर्फ टिकट वितरण की प्रक्रिया में बदलाव नहीं है, बल्कि कांग्रेस की चुनावी राजनीति में ज़मीनी स्तर पर लौटने की कोशिश का संकेत भी देता है. अब देखना यह होगा कि यह प्रयोग पार्टी को आसाम में कितना फायदा पहुंचाता है और क्या यह मॉडल भविष्य में कांग्रेस की चुनावी रणनीति की स्थायी पहचान बन पाता है या नहीं.

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