Kisse Netaon Ke : नेहरू से भिड़े, असम को PAK में जाने से बचाया, क्या है पहले CM बोरदोलोई की कहानी

असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई की पूरी कहानी जानें, जिन्होंने नेहरू से मतभेद के बावजूद असम को पाकिस्तान में जाने से बचाया और राज्य की पहचान को सुरक्षित रखा और बन गए असम के रक्षक.

असम के पहले सीएम गोपीनाथ बोरदोलोई 

By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 1 April 2026 3:56 PM IST

“अगर उस दौर में एक फैसले की दिशा बदल जाती, तो आज असम शायद भारत का हिस्सा ही नहीं होता.”  यह कोई फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि इतिहास की वह सच्चाई है, जिसमें एक नेता ने अपनी जिद, रणनीति और सोच से पूरे राज्य की किस्मत बदल दी. वह नेता थे - गोपीनाथ बोरदोलोई, जिन्हें आज “शेर-ए-असम” कहा जाता है. यही वजह है कि असम में चुनाव के बीच उनका जिक्र करना जरूरी है. ताकि सभी जान सकें, असम का एक नेता ऐसा था, जिसकी वहज से वो आज भारत के नागरिक हैं.

शेर ए असम 'गोपीनाथ बोरदोलोई' का जिक्र कई महत्वपूर्ण पुस्तकों में है, जहां उन्हें असम के निर्माण और संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है. सबसे प्रमुख पुस्तक है Lokopriya Gopinath Bordoloi: An Architect of Modern India, जो पूरी तरह उनके जीवन, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और असम को विभाजन से बचाने की भूमिका पर केंद्रित है. इसमें उनके राजनीतिक फैसलों, प्रशासनिक दृष्टि और नेतृत्व शैली का का जिक्र है.

इसके अलावा ULFA: The Mirage of Dawn में उनका जिक्र सीधे मुख्य पात्र के रूप में नहीं, बल्कि असम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में आता है. ऐसा इसलिए कि यह पुस्तक उल्फा और उसके सियासी विद्रोह पर केंद्रित है. यह किताब बताती है कि उनके समय में बनी राजनीतिक नींव बाद में कैसे बदलती गई. India After Gandhi में भी स्वतंत्रता के बाद के भारत के संदर्भ में उनका उल्लेख मिलता है, खासकर पूर्वोत्तर भारत की राजनीति के संदर्भ में. इसके अलावा असम के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित कई अकादमिक किताबों और राज्य स्तरीय प्रकाशनों में भी बोरदोलोई को “असम का रक्षक” और दूरदर्शी नेता के रूप में याद किया गया है.

साधारण लड़के से ‘असम का रक्षक’ बनने तक

कहानी शुरू होती है असम के एक सामान्य परिवार से, जहां जन्मे बोरदोलोई ने अपनी पहचान मेहनत और शिक्षा से बनाई. उनका जन्म 6 जून 1890 को असम के नागांव (तत्कालीन नाओगांव) में हुआ था. यह क्षेत्र उस समय एक उभरता हुआ प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र था, जिसने उनके शुरुआती जीवन और सोच को काफी प्रभावित किया. उन्होंने कानून की पढ़ाई की, लेकिन उनका असली झुकाव समाज और राजनीति की तरफ था.

महात्मा गांधी के आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा. जेल गए, संघर्ष किया, लेकिन इस दौरान उन्होंने एक चीज बहुत गहराई से समझ ली. असम सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक संवेदनशील भू-राजनीतिक इलाका है. यही समझ आगे चलकर उनके सबसे बड़े फैसले की नींव बनी.

1940 का दशक: जब असम की किस्मत दांव पर थी!

भारत आजादी के करीब था, लेकिन हर राज्य का भविष्य तय नहीं हुआ था. इसी बीच मुस्लिम लीग ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला. असम को बंगाल के साथ जोड़कर पूर्वी पाकिस्तान में शामिल करने की योजना. यह योजना कैबिनेट मिशन योजना 1946 के “ग्रुपिंग सिस्टम” के जरिए लाई गई थी.

इसका मतलब क्या?

असम बंगाल के साथ एक ग्रुप में जाएगा. वहां मुस्लिम लीग का प्रभाव ज्यादा था. धीरे-धीरे असम की राजनीतिक दिशा बदल सकती थी. यानी, बिना सीधे विभाजन के ही असम पाकिस्तान के प्रभाव में जा सकता था. दिलचस्प बात यह है कि उस समय कांग्रेस के बड़े नेता, जिनमें जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे, इस ग्रुपिंग को पूरी तरह खारिज करने के मूड में नहीं थे, लेकिन यहीं पर बोरदोलोई ने “हाई कमांड” से अलग रास्ता चुना. उन्होंने कहा - “असम की पहचान किसी समझौते का हिस्सा नहीं हो सकती.” यह सिर्फ बयान नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक विद्रोह था.

किन तीन मोर्चों पर लड़ी लड़ाई?

बोरदोलोई ने इस मुद्दे को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने एक सुनियोजित रणनीति अपनाई. पहला विधानसभा की ताकत का सहारा लिया. असम विधानसभा में ग्रुपिंग के खिलाफ प्रस्ताव पारित करवाया. यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश था.दूसरा, यह कि उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया कि यह फैसला उनके भविष्य को कैसे बदल सकता है. तीसरी बात ये कि उन्होंने दिल्ली और ब्रिटिश अधिकारियों पर ऐसा न होने देन का दबाव बनाया. उन्होंने लगातार संवाद और दबाव के जरिए केंद्र को अपनी स्थिति बदलने पर मजबूर किया.

साइलेंट डिप्लोमेसी के माहिर खिलाड़ी

कम ही लोग जानते हैं कि बोरदोलोई ने सिर्फ सार्वजनिक विरोध ही नहीं किया, बल्कि पर्दे के पीछे भी बड़ी भूमिका निभाई. इस मुहिम में उन्होंने असम के आदिवासी नेताओं को साथ जोड़ा. ब्रिटिश अधिकारियों को यह समझाया कि असम की सामाजिक संरचना बंगाल से अलग है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर असम को जबरन जोड़ा गया, तो वहां अस्थिरता बढ़ेगी. यह “साइलेंट डिप्लोमेसी” उनकी सबसे बड़ी ताकत थी. आखिरकार पलटा फैसला. लगातार दबाव और विरोध के बाद ग्रुपिंग प्लान कमजोर पड़ने लगा. अंत में असम को उस व्यवस्था से अलग रखने का फैसला लिया गया.

कैसे कहलाए असम के रक्षक?

बोरदोलोई की यह सिर्फ एक राजनीतिक जीत नहीं थी. यह एक राज्य की पहचान और भविष्य को बचाने की जीत थी. यहीं से बोरदोलोई को कहा गया, “असम का रक्षक”. आजादी के बाद उन्होंने न सिर्फ असम को बचाया, बनाया भी.

वह, 1947 में भारत आजाद हुआ और गोपीनाथ बोरदोलोई बने असम के पहले मुख्यमंत्री, लेकिन उनकी असली परीक्षा यहीं से शुरू हुई. उन्होंने तीन बड़े काम किए. असम में शिक्षा संस्थानों की नींव रख, जिससे राज्य प्रशासनिक रूप से मजबूत हुआ.उन्होंने ऐसी नीतियां बनाई, जो बाद में संविधान के Sixth Schedule का आधार बनीं. उसका नतीजा यह हुआ कि आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत हुई. इसके अलावा, उन्होंने असमिया भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने पर जोर दिया.

नेहरू से मतभेद, पर टकराव कभी नहीं, कैसे?

जवाहरलाल नेहरू और बोरदोलोई के बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे, लेकिन खास बात यह थी कि बोरदोलोई ने कभी व्यक्तिगत राजनीति नहीं की. वे असम के हितों पर अडिग रहे, लेकिन राष्ट्रीय एकता को भी प्राथमिकता दी. यह संतुलन उन्हें एक अलग तरह का नेता बनाता है.

अनसुना पहलू - 'Soft but Firm Leader'

गोपीनाथ बोरदोलोई को अक्सर शांत और विनम्र नेता कहा जाता था, लेकिन उनके करीबी बताते हैं कि वे फैसले लेते समय बेहद सख्त हो जाते थे. अगर उन्हें लगता था कि असम के हित खतरे में हैं, तो वे किसी दबाव में नहीं आते थे. उन्होंने कई बार पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर फैसले लिए. यानी, उनका नेतृत्व “नरम स्वभाव + मजबूत निर्णय” का मिश्रण था.

राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक ULFA: The Mirage of Dawn में बोरदोलोई मुख्य किरदार नहीं हैं, लेकिन उनका जिक्र बार-बार “बैकग्राउंड” में आता है. असम की शुरुआती राजनीति, पहचान की नींव और बाद में उभरे अलगाववाद के contrast के रूप में पुस्तकर के लेखक यह दिखाने की कोशिश करता है कि बोरदोलोई ने कैसे एकता और संतुलन बनाया. जबकि बाद के दौर में वही संतुलन बिगड़ गया.

क्या आज भी जिंदा है उनकी राजनीति?

जी हां, पूरी तरह से. आज असम में जब भी NRC, CAA, बांग्लादेशी घुसपैठ और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दे उठते हैं, सभी को बोरदोलोई याद आते हैं. हर राजनीतिक दल खुद को उनकी विरासत से जोड़ने की कोशिश करता है.

तो ऐसे थे पहले सीएम बोरदोलोई?

उनकी भूमिका को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया. लेकिन असम के लोगों के लिए उनका असली सम्मान कुछ और है. और वो नाम है “लोकप्रिय” और “शेर-ए-असम”. प्रदेश के लोग उन्हें इज्जत और प्यार से शेर ए असम कहते हैं. ऐसा इसलिए कि उनका एक फैसला, जिसने असम का इतिहास बदल दिया. अगर वह “ग्रुपिंग सिस्टम” का विरोध नहीं करते तो आज असम बांग्लादेश में होता. अंदाजा लगा लीजिए, ऐसा होने पर भारत आज कैसा होता.

इसलिए, असम के लोग कहते हैं, इतिहास में कई नेता आते हैं, लेकिन कुछ ही ऐसे होते हैं जो एक फैसले से पूरी पीढ़ियों का भविष्य तय कर देते हैं. शेर ए असम और भारत रत्न गोपीनाथ बोरदोलोई उन्हीं में से एक थे. अगर उन्होंने उस समय समझौता कर लिया होता, तो आज असम का नक्शा, पहचान और राजनीति, सब अलग होता. गुवाहाटी के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम 'लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' है. उन्हें आधुनिक असम के निर्माता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने राज्य की अलग सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की.

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