Kisse Netaon Ke : कांग्रेस के ‘चाणक्य’ से BJP का ‘गेमचेंजर’ तक, Himanta Biswa Sarma की वो कहानी जो खुलकर कभी सामने नहीं आई
Himanta Ke Kisse : असम के जोरहाट में जन्मे हिमंता बिस्वा सरमा का शुरुआती जीवन साधारण था, लेकिन उनकी सियासी महत्वाकांक्षा असाधारण. छात्र राजनीति से निकले हिमंता ने बहुत जल्दी समझ लिया कि राजनीति सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि नेटवर्क, टाइमिंग और मैनेजमेंट का खेल ही सब कुछ है. इस पर उन्होंने अमल किया आज वो कांग्रेस के मैनेजर या चाणक्य से बीजेपी के पोस्टर ब्वॉय हैं.
Himanta ki Anakahee Kahani : इस कहानी की शुरुआत उस समय हुई, जब तरुण गोगोई अंतिम बार या यूं कहें कि लगातार तीसरी बार मई 2011 को असम के सीएम बने. उसी समय कांग्रेस के चाणक्य माने जाने वाले हिमंता बिस्वा सरमा को लग गया था कि कांग्रेस में रहकर उनका भला नहीं होने वाला है. हालांकि, वे गोगोई मंत्रिमंडल में कई अहम मंत्रालयों के मंत्री रहे, लेकिन उनका कद इतना बड़ा हो गया था कि वो खुद को सीएम पद का दावेदार मानने लगे थे. ऐसे में 2011 में तीसरी बार गांधी परिवार के आशीर्वाद से तरुण गोगोई का सीएम बनना उनको खल गया. उसी समय ये वो खुद को सीएम बनाने की मुहिम जुड़ गए. इस मुहिम की शुरुआत उन्होंने चुपचाप की. साल 2015 में उसका अंत उन्होंने बीजेपी में शामिल होकर कर दिया और वो असम में बीजेपी के लिए गेमचेंजर बन गए. वर्तमान में वो प्रदेश के सीएम है. चुनाव प्रचार चरम पर है और नौ अप्रैल को वहां की सभी सीटों पर नई सरकार बनाने के लिए मतदान होगा. आइए, हम जानते हैं कि हिमंता बिस्वा सरमा का कांग्रेस के चाणक्य से लेकर बीजेपी का गेमचेंजर बनने की कहानी क्या है.
उनके इस कहानी को लेकर डिटेल में किसी एक किताब में जानकारी नहीं हैं. ऐसे में इस पूरी कहानी को समझने के लिए कई किताबें संदर्भ देती हैं. इनमें Sanjib Baruah की 'इन द नैम आफ नेशन' नॉर्थ-ईस्ट के राजनीतिक बदलावों का बैकग्राउंड देती है, जबकि Sanjaya Baru की The Accidental Prime Minister यह बताती है कि BJP कैसे क्षेत्रीय नेताओं को अपने साथ जोड़ती गई. इसमें सबसे बड़े उदाहरण खुद हिमंता बिस्वा सरमा हैं. इसके अलावा Ajit Datta की किताब Himanta Biswa Sarma: From Boy Wonder to CM इस बदलाव को उनकी पर्सनल पॉलिटिकल जर्नी से जोड़ती है.
क्या जोरहाट का ‘बॉय वंडर’ पहले दिन से सत्ता का खिलाड़ी था?
इन पुस्तकों में असम कांग्रेस और बीजेपी को लेकर जिक्र है कि असम के जोरहाट में जन्मे 49 वर्षीय हिमंता बिस्वा शर्मा ने 2001 में असम की जालुकबारी सीट से चुनावी मैदान में कदम रखा और 2006 तथा 2011 में कांग्रेस पार्टी के सदस्य के तौर पर दोबारा चुने गए. राजनीति में हिमंता बिस्वा सरमा इस सोच के रहे हैं कि महत्वाकांक्षा जरूरी है पर सम्मान उतना ही जरूरी है और सबसे जरूरी है कि सही समय पर सही फैसला लिया जाए. हिमंता ने सिर्फ पार्टी नहीं बदली, उन्होंने सत्ता का गणित पढ़ लिया. और इसी सियासी समझ ने उन्हें “कांग्रेस का चाणक्य” से “BJP का गेमचेंजर” बना दिया. इसमें अमित शाह की भूमिका पर्दे के पीछे से अहम रही.
हालांकि, साल 2016 में हुए असम विधानसभा चुनाव के बाद 24 मई 2016 को भाजपा के सरबानंदा सोनोवाल ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला, लेकिन हिमंता को पूरे नॉर्थ ईस्ट की जिम्मेदारी मिल गई.
दरअसल, इस कहानी की शुरुआत बंगाल के दिसपुर से हुई थी. वो वक्त साल 2014–15 के बीच का था. असम की सत्ता में अब भी कांग्रेस थी, लेकिन अंदर ही अंदर सब कुछ बदल रहा था. मुख्यमंत्री थे तरुण गोगोई तीन बार के अनुभवी नेता थे और उनके ही कैबिनेट में एक ऐसा चेहरा, जो धीरे-धीरे खुद को 'सिस्टम' से बड़ा मानने लगे थे हिमंता बिस्वा सरमा. यह कहानी सिर्फ पार्टी बदलने की नहीं है. यह कहानी है महत्वाकांक्षा, अपमान, और सही समय पर सही दांव लगाने की.
हिमंता बिस्वा सरमा 2001 में जालुकबारी सीट से पहली बार विधायक बने. उस समय तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस का दबदबा था. हिमंता ने शुरुआत से ही खुद को अलग साबित किया, वो सिर्फ भाषण देने वाले नेता नहीं, बल्कि 'डिलीवरी' करने वाले मंत्री थे. स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त जैसे बड़े विभाग उनके पास आए. लेकिन उनकी असली ताकत थीए चुनावी गणित. बूथ से लेकर सत्ता तक की बारीक समझ ने उन्हें जल्दी ही कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार बना दिया. यही वजह थी कि उन्हें “कांग्रेस का चाणक्य” कहा जाने लगा.
क्या ‘मैं ही सिस्टम हूं’ वाली छवि ने उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं?
साल 2001 से 2014 तक का दौर हिमंता के लिए पावर और प्रभाव का स्वर्णकाल था. हर चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका दिखती थी. लेकिन यहीं से एक नई समस्या भी शुरू हुई, वो समस्या थी, उनकी बढ़ती सियासी ताकत. पार्टी के भीतर कई नेताओं को लगने लगा कि हिमंता खुद को सिस्टम से बड़ा मानने लगे हैं.
उनकी कार्यशैली आक्रामक थी, फैसले तेज थे और महत्वाकांक्षा स्पष्ट. वो सिर्फ मंत्री नहीं रहना चाहते थे, बल्कि सत्ता के शीर्ष तक पहुंचना चाहते थे.
लेकिन कांग्रेस की राजनीति में पद और शक्ति का संतुलन धीरे-धीरे बदलता है. हिमंता की तेजी और पार्टी की परंपरागत सोच के बीच टकराव होना तय था. यही टकराव आगे चलकर एक गहरी राजनीतिक दरार में बदल गया.
क्या 2014 में कांग्रेस की हार ने उनके भीतर ‘बगावत’ को जन्म दिया?
साल 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका था. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और असम में भी उसका प्रभाव कमजोर हुआ. हिमंता ने इसे सिर्फ हार नहीं, बल्कि “रीसेट का मौका” माना. उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य में नेतृत्व बदलना चाहिए, नई ऊर्जा और नया चेहरा लाना चाहिए. लेकिन तरुण गोगोई के नेतृत्व को बदलने का सवाल ही नहीं उठाया गया. दिल्ली से गांधी परिवार का साफ संकेत था - “स्टेटस क्वो” बना रहेगा.
यहीं से हिमंता के भीतर असंतोष गहराने लगा. उन्हें लगा कि उनकी मेहनत और रणनीति के बावजूद उन्हें वह पहचान और स्थान नहीं मिल रहा, जिसके वे हकदार हैं. राजनीति में कई बार हार से ज्यादा “अहम की चोट” बड़ा बदलाव लाती है और हिमंता के लिए यही हुआ.
क्या राहुल गांधी से मुलाकात टर्निंग प्वाइंट थी?
दिल्ली की एक मुलाकात भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल हो गई. हिमंता अपनी शिकायत लेकर राहुल गांधी से मिलने पहुंचे. उसके बाद मीडिया रिपोर्ट्स में एक किस्सा सामने आया. उन्होंने कहा था कि मीटिंग के दौरान राहुल गांधी अपने कुत्ते को बिस्किट खिला रहे थे, जबकि हिमंता अपनी बात रख रहे थे.
यह घटना पूरी तरह तथ्य है या प्रतीक, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन हिमंता के लिए यह एक भावनात्मक झटका था. बाद में उन्होंने खुद कहा कि उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि कांग्रेस में उनकी कोई जगह नहीं है.
यहां पर और बात समझने की होती है. राजनीति में सम्मान एक बड़ा फैक्टर होता है. कई बार एक छोटी सी घटना, सालों के रिश्ते को खत्म कर देती है. यही वह क्षण था जिसने हिमंता के मन में पार्टी से “अलग रास्ता” चुनने का बीज बो दिया.
क्या 2015 का ‘साइलेंट मूव’ असम की राजनीति का सबसे बड़ा टर्न था?
हिमंता ने जल्दबाजी नहीं की. उन्होंने एक रणनीतिक खिलाड़ी की तरह अपने कदम तय किए. पहले उन्होंने अपने साथ विधायकों का एक मजबूत समूह तैयार किया. धीरे-धीरे कांग्रेस के भीतर अपनी पकड़ ढीली की और विकल्पों की तलाश शुरू की. 2015 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. यह सिर्फ एक नेता का पार्टी बदलना नहीं था, बल्कि असम की राजनीति के पूरे पावर स्ट्रक्चर का शिफ्ट था.
BJP उस समय असम में मजबूत नहीं थी, लेकिन हिमंता ने उसमें संभावनाएं देखीं. उन्होंने समझ लिया था कि कांग्रेस कमजोर हो रही है और BJP उभर रही है. यही “सही समय पर लिया गया फैसला” उन्हें गेमचेंजर बनाता है.
क्या अमित शाह ने उन्हें नॉर्थ-ईस्ट का सबसे बड़ा रणनीतिकार बना दिया?
BJP ने हिमंता की क्षमता को पहचाना और पार्टी में शामिल होते ही, उन्हें सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि रणनीतिक कमांडर बनाया. North East Democratic Alliance (NEDA) की जिम्मेदारी देकर उन्हें पूरे नॉर्थ-ईस्ट में पार्टी विस्तार का काम सौंपा गया. हिमंता ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन बनाए, जातीय समीकरणों को साधा और 2016 के चुनाव में BJP को पहली बार असम की सत्ता तक पहुंचाया. इस जीत के पीछे कई चेहरे थे, लेकिन पर्दे के पीछे असली आर्किटेक्ट हिमंता ही माने गए. यहीं से उनकी पहचान बनी, “BJP का गेमचेंजर”.
किंगमेकर से किंग बनने तक: क्या है इस कहानी का असली सबक?
साल 2016 में मुख्यमंत्री बने सर्बानंद सोनोवाल, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि असली ताकत हिमंता के पास है. 2021 में असम में विधानसभा चुनाव हुए. बीजेपी दूसरी बार सत्ता में आई, लेकिन इस बाद सीएम का चेहरा बदल गया. हिमंता ने मुख्यमंत्री पद संभाला, सोनोवाल केंद्र में मंत्री बनाए गए. यह एक लंबी रणनीतिक यात्रा का परिणाम था.
पांच साल बाद एक बार असम विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी तापमान चरम पर है. सभी की नजर इस बात पर है कि क्या हिमंता बिस्वा सरमा असम में बीजेपी को अकेले दम पर चुनावी जीत की हैट्रिक बना पाएंगे? क्या वो दूसरी बार असम का सीएमए बनेंगे. कांग्रेस के युवा नेता और पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई चुनाव में हरा पाएंगे. इस जवाब तो चुनाव परिणाम आने पर ही मिलेगा, लेकिन वर्तमान हालात में सीएम सरमा पर पलड़ा भारी नजर आ रहा है.