किस्से नेताओं के : Crisis Manager या Controversial CM, क्या है Hiteswar Saikia की अधूरी कहानी?
Hiteswar Saikia की राजनीति सिर्फ सत्ता की कहानी नहीं है, बल्कि crisis management और controversies का मिश्रण भी है. Assam के पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने अस्थिर दौर में सख्त फैसले लिए, लेकिन उनकी विरासत आज भी सवालों और बहसों में घिरी हुई है. जानिए उनकी अधूरी राजनीतिक यात्रा और असम की सत्ता राजनीति पर उनका असर.
असम के क्राइसिस मैनेजर हितेश्वर सैकिया
असम की राजनीति का एक ऐसा दौर, जब सड़कों पर आंदोलन था, पहचान की लड़ाई थी और सरकार के सामने हर दिन एक नई चुनौती खड़ी होती थी. उसी समय उभरता है एक नाम : Hiteswar Saikia. उनका जीवन सिर्फ एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि उस असम की कहानी है, जो उथल-पुथल, संघर्ष और राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा था. सैकिया को समझना मतलब उस दौर को समझना है, जहां हर फैसला या तो व्यवस्था बचाता था या विवाद को जन्म देता था. वो असम के क्राइसिस मैनेजर थे या कंट्रोवर्शियल सीएम यह भी डिबेट का विषय है. इस बात की चर्चा राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक 'द मिराज ऑफ डॉन' से लेकर कई पुस्तकों में हैं. जानिए, उनकी पूरी कहानी.
क्या बचपन के सामान्य परवरिश ने उन्हें मजबूत बनाया?
राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक 'द मिराज ऑफ डॉन' और संजीब बरुआ की किताब 'India Against Itself: Assam and the Politics of Nationality', के अनुसार 12 अप्रैल 1934 को सिवसागर जिले में जन्मे सैकिया का शुरुआती जीवन बेहद साधारण था. ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े सैकिया ने बचपन से ही अनुशासन और सादगी को अपनाया. वे न तो किसी बड़े राजनीतिक परिवार से थे और न ही उनके पास कोई खास संसाधन थे. लेकिन यही सिम्पल बैकग्राउंड उनके व्यक्तित्व की ताकत बनी. उन्होंने कम संसाधनों में भी पढ़ाई को प्राथमिकता दी और खुद को एक गंभीर, सोचने वाले छात्र के रूप में स्थापित किया.
1979 से लेकर 2000 व उसके बाद भी असम अराजक सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रहा था. उसी माहौल में सैकिया के भीतर सार्वजनिक जीवन के प्रति रुचि जगाने लगा. वे भीड़ में अलग दिखने वाले नहीं, बल्कि चुपचाप सीखने और समझने वाले व्यक्ति थे.
क्या कानून की पढ़ाई ने उनके अंदर का प्रशासक बनाया?
पूर्व सीएम हितेश्वर सैकिया ने आगे चलकर B.A. और LL.B. की डिग्री हासिल की. वकालत के दौरान उन्होंने सिस्टम की जमीनी सच्चाई को करीब से देखा. अदालतों में आने वाले मामलों ने उन्हें यह समझाया कि आम आदमी के लिए न्याय पाना कितना कठिन है. यही अनुभव उनके भीतर प्रशासनिक सोच विकसित करने लगा. वे सिर्फ कानून को पढ़ने वाले नहीं, बल्कि उसे लागू होते देखने वाले व्यक्ति बने. यही वजह रही कि जब वे राजनीति में आए, तो उनका नजरिया सिर्फ भाषण देने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने का था.
वकालत से राजनीति में उनका सफर सहज रहा?
कांग्रेस से जुड़ना, उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत थी. लेकिन यह कोई तेज रफ्तार चढ़ाई नहीं थी. उन्होंने धीरे-धीरे संगठन में अपनी जगह बनाई. सैकिया की खासियत यह थी कि वे भीड़ जुटाने वाले नेता नहीं थे, बल्कि रणनीति बनाने और उसे लागू करने वाले व्यक्ति थे. पार्टी के अंदर उन्हें एक भरोसेमंद, अनुशासित और संतुलित नेता के रूप में देखा जाने लगा. वे विवादों से दूर रहते थे, लेकिन जब भी पार्टी को किसी संकट में स्थिर नेतृत्व की जरूरत होती, उनका नाम सामने आता था.
क्या 1970 का दशक उनके सियासी कद को तय करता है?
1970 के दशक में सैकिया ने असम की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की. वे विधानसभा और संगठन दोनों स्तर पर सक्रिय हो गए. इसी समय असम में घुसपैठ, पहचान और सांस्कृतिक असुरक्षा जैसे मुद्दे उभरने लगे थे.
यह वही दौर था, जिसने आगे चलकर असम आंदोलन की नींव रखी. सैकिया ने इस समय खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया, जो कठिन परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रख सकता था. वे न तो उग्र राजनीति के पक्ष में थे और न ही पूरी तरह निष्क्रिय, बल्कि बीच का रास्ता खोजने वाले नेता थे. गुवाहाटी से दिल्ली तक अपनी पहुंच सुनिश्चित की.
असम आंदोलन उनकी टर्निंग पॉइंट बना?
1979 में All Assam Students Union के नेतृत्व में असम आंदोलन शुरू हुआ. विदेशी नागरिकों के मुद्दे पर पूरे राज्य में विरोध, बंद और हिंसा का माहौल बन गया. इस दौर में सैकिया ने सरकार के संवैधानिक रुख का समर्थन किया. यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि एक तरफ जनता का गुस्सा था और दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी. सैकिया इस दौर में कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल थे, जो हर हाल में व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में थे. यही समय उनकी राजनीतिक परीक्षा का सबसे बड़ा चरण बना.
1983 में सीएम बनना उनके लिए सबसे कठिन जिम्मेदारी थी?
1983 के चुनाव बेहद विवादित परिस्थितियों में हुए. आंदोलन के कारण All Assam Students Union ने चुनाव का बहिष्कार किया. कई जगह हिंसा हुई और मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा. इसी माहौल में कांग्रेस की सरकार बनी और Hiteswar Saikia मुख्यमंत्री बने. यह उनके लिए सत्ता का शिखर जरूर था, लेकिन साथ ही सबसे बड़ी चुनौती भी. उनका पूरा कार्यकाल कानून-व्यवस्था संभालने और आंदोलन से निपटने में बीता. हर निर्णय विवादों में घिरा, हर कदम आलोचना के घेरे में रहा.
नेली कांड ने उनकी विरासत को कैसे प्रभावित किया?
1983 का Nellie massacre असम के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है. इस घटना में हजारों लोगों की जान गई और पूरा देश स्तब्ध रह गया. इस घटना के बाद सैकिया सरकार पर गंभीर सवाल उठे. आलोचकों ने इसे प्रशासनिक विफलता बताया, जबकि समर्थकों का कहना था कि हालात पहले से ही इतने खराब थे कि किसी भी सरकार के लिए उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल था. यह घटना उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे विवादित हिस्सा बन गई.
क्या असम कॉर्ड ने उनकी राजनीति को पीछे धकेल दिया?
1985 में उनके प्रयास से Assam Accord सामने आया, जिसने आंदोलन और सरकार के बीच समझौते का रास्ता खोला. इसके बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और 32 साल के Prafulla Kumar Mahanta के नेतृत्व में नई सरकार बनी. यानी जिसके कहने पर उन्होंने असम अकॉर्ड लागू कराया, वहीं चुनाव में उनको हराकर वहां का सीएम बन गया.
यह सैकिया के लिए झटका जरूर था, लेकिन उन्होंने इसे अंत नहीं माना. उन्होंने विपक्ष में रहकर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया. यह वही रणनीति थी, जिसने उन्हें कुछ वर्षों बाद फिर से सत्ता में वापसी का मौका दिया.
क्या विपक्ष के अनुभवों ने उन्हें और मजबूत बनाया?
1985 से 1991 तक का समय सैकिया के लिए सीखने और रणनीति बनाने का दौर था. उन्होंने कांग्रेस को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई. वे लगातार जमीन पर काम करते रहे और संगठन को मजबूत करते रहे. इस दौरान उन्होंने यह समझा कि राजनीति में सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि धैर्य और निरंतरता भी जरूरी होती है. यही वजह रही कि वे दोबारा सत्ता में लौटने में सफल रहे.
32 साल के युवक से हार - क्या संकेत देती है?
राजनीति में लंबे अनुभव और मजबूत छवि के बावजूद, सैकिया को बाद के वर्षों में एक युवा नेता से हार का सामना करना पड़ा. यह हार सिर्फ एक चुनावी हार नहीं थी, बल्कि बदलते समय का संकेत थी. नई पीढ़ी, नए मुद्दे और नई राजनीति ने पुराने नेताओं के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी थी. सैकिया की हार यह दिखाती है कि राजनीति में कोई भी स्थायी नहीं होता, और हर दौर में खुद को बदलना जरूरी होता है.
Crisis Manager या Controversial CM?
हितेश्वर सैकिया असम की राजनीति के उन नेताओं में से थे, जिनकी छवि दो ध्रुवों में बंटी हुई है. 'Crisis Manager और Controversial CM. एक तरफ उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जिन्होंने असम आंदोलन, हिंसा और कानून-व्यवस्था के बेहद कठिन दौर में सत्ता संभाली और राज्य को संवैधानिक ढांचे में रखने की कोशिश की.
दूसरी तरफ, उनके कार्यकाल पर कई गंभीर सवाल भी उठते हैं, खासकर 1983 के Nellie massacre जैसी घटनाओं के बाद, जब सरकार की भूमिका पर तीखी आलोचना हुई. समर्थक मानते हैं कि हालात पहले से ही नियंत्रण से बाहर थे, जबकि आलोचक इसे प्रशासनिक विफलता बताते हैं. Hiteswar Saikia की राजनीति इसी विरोधाभास में समझी जाती है, जहां वे एक सख्त संकट-प्रबंधक भी थे और एक विवादों से घिरे मुख्यमंत्री भी.
क्या उनकी कहानी आज भी प्रासंगिक है?
Hiteswar Saikia की कहानी सिर्फ अतीत नहीं, बल्कि आज के नेताओं के लिए भी एक सबक है. उन्होंने दिखाया कि संकट के समय फैसले लेना कितना कठिन होता है, और हर फैसला अपने साथ आलोचना लेकर आता है. उनकी विरासत दो हिस्सों में बंटी नजर आती है. एक तरफ एक सख्त प्रशासक, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए खड़ा रहा; दूसरी तरफ एक विवादित नेता, जिसके कार्यकाल में राज्य ने सबसे कठिन दौर देखा. आखिरकार, सैकिया की कहानी हमें यही बताती है कि राजनीति में असली परीक्षा चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि मुश्किल समय में सही फैसले लेने की होती है.