Assam Election 2026: ‘न मुस्लिम, न हिंदू… असम का ‘साइलेंट वोटर’ कौन, जो बदल सकता है पूरी बाजी?
असम विधानसभा चुनाव 2026 में कौन है ‘साइलेंट वोटर’ जो बदल सकता है पूरा खेल? जानिए हिंदू, मुस्लिम, ट्राइबल और चाय बागान वोट का पूरा गणित और किसके हाथ में है सत्ता की चाबी.
असम की राजनीति लंबे समय से पहचान आधारित वोट बैंक पर टिकी है. यहां का चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम और असमिया बनाम बाहरी, के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन हर चुनाव में एक ऐसा वर्ग भी सामने आता है जो खुलकर किसी खांचे में फिट नहीं होता, पर चुपचाप नतीजे बदल देता है. साल 2026 के असम विधानसभा चुनाव में भी यही 'साइलेंट वोटर' सबसे बड़ा गेमचेंजर बन सकता है.
असम चुनाव में किसकी अहमियत कितनी?
साल 2011 जनगणना और बाद के अनुमान के मुताबिक असम में हिंदू आबादी करीब 60 से 62 फीसदी के आसपास मानी जाती है. जबकि मुस्लिम आबादी लगभग 34 से 36 प्रतिशत के बीच. कई जिलों खासकर निचले असम में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. जबकि ऊपरी असम में हिंदू वोट का प्रभाव ज्यादा है. यही धार्मिक संतुलन चुनावी रणनीति की बुनियाद बनता है.
क्या ट्राइबल वोट हैं किंगमेकर?
असम में अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी लगभग 12 से 13 प्रतिशत के करीब है. इसमें बोडो, कार्बी, मिसिंग, राभा जैसे समुदाय शामिल हैं. ये वोटर भले कुल आबादी में सीमित हों, लेकिन कई सीटों पर निर्णायक हैं. बोडोलैंड क्षेत्र की राजनीति अलग ही दिशा तय करती है, जहां स्थानीय मुद्दे (पहचान, स्वायत्तता और जमीन) धार्मिक मुद्दों से ज्यादा अहम हो जाते हैं.
चाय बागान वर्कर्स की राजनीति में अहमियत कितनी?
असम की राजनीति में चाय बागान मजदूर एक बेहद अहम लेकिन अक्सर ‘अंडररेटेड’ वोट बैंक हैं. इनकी आबादी करीब 15 से 17% के आसपास मानी जाती है. यह समुदाय मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आए आदिवासी मूल के लोगों का है, जिन्हें “टी ट्राइब्स” भी कहा जाता है. लगभग 35 से 40 विधानसभा सीटों पर इनका सीधा असर पड़ता है. पिछले कुछ चुनावों में इस वर्ग का झुकाव सत्ता बदलने में बड़ा फैक्टर रहा है.
‘साइलेंट वोटर’ समुदाय या कई वर्गों का मेल?
असम का 'साइलेंट वोटर' किसी एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं है. यह दरअसल, कई छोटे-छोटे वर्गों का मिश्रण है. शहरी मध्यम वर्ग, पहली बार वोट देने वाले युवा, महिलाएं, चाय बागान मजदूर, और वे मतदाता जो खुलकर राजनीतिक रुख जाहिर नहीं करते. ये लोग आखिरी समय में रोजगार, महंगाई, स्थानीय विकास के आधार पर फैसला लेते हैं.
क्या महिलाएं और युवा ‘साइलेंट वोटर’ की असली ताकत हैं?
पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं की वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रही है. सरकारी योजनाएं, जैसे आर्थिक सहायता और कल्याणकारी स्कीमें, महिलाओं के वोट को प्रभावित करती हैं. वहीं, युवा मतदाता, जो सोशल मीडिया और रोजगार के मुद्दों से प्रभावित हैं. खुलकर किसी पार्टी का समर्थन नहीं करते, लेकिन वोटिंग के दिन बड़ा असर डालते हैं. यही वर्ग “साइलेंट वोटर” की रीढ़ बनता जा रहा है.
क्या चाय बागान और ट्राइबल वोट ही असली ‘किंगमेकर’ क्यों?
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि असम में चुनाव जीतने के लिए सिर्फ हिंदू या मुस्लिम वोट काफी नहीं है. चाय बागान मजदूर और ट्राइबल समुदाय ऐसे “स्विंग वोटर” हैं, जो आखिरी समय में रुख बदल सकते हैं. इनका वोट अक्सर मुद्दा आधारित होता है. जैसे मजदूरी, जमीन के अधिकार और स्थानीय पहचान.
क्या ‘साइलेंट वोटर’ चुनाव का पूरा गणित बदल सकता है?
असम में कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर बहुत कम होता है. ऐसे में 5 से 10% का साइलेंट वोट पूरे परिणाम को पलट सकता है. यही वजह है कि राजनीतिक दल अब सिर्फ पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, रोजगार और लोकल मुद्दों पर भी जोर दे रहे हैं.
असम में विधानसभा की 126 सीटों के लिए मतदान 9 अप्रैल को होगा. जबकि चार मई को वोटों की गिनती के बाद चुनाव आयोग द्वारा परिणाम घोषित किए जाएंगे. फिलहाल, असम चुनाव में शामिल सभी सियासी दलों पर अपना चुनाव प्रचार तेज कर दिया है. सियासी दलों की सक्रियता की वजह से वहां का माहौल भी पूरी तरह से गरमा गया है.