GEN Z क्‍यों बना रहा सोशल मीडिया से दूरी? इस जनरेशन के लिए पोस्ट करना कैसे बन गया बोझ

जिस सोशल मीडिया ने GEN Z को पहचान, आवाज़ और आज़ादी दी, वही अब उनके लिए थकान, दबाव और मानसिक बोझ का कारण बनता जा रहा है. कभी बिना सोचे पोस्ट करने वाली यह पीढ़ी अब “पोस्ट करूं या नहीं” के सवाल में उलझी रहती है. लाइक्स, व्यूज़ और कमेंट्स की दौड़ ने डिजिटल स्पेस को एक्सप्रेशन से ज़्यादा परफॉर्मेंस बना दिया है.;

gen z social media distancing

(Image Source:  AI SORA )
Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 21 Jan 2026 4:52 PM IST

आजकल आपने नोटिस किया होगा कि GEN Z सोशल मीडिया पर कम पोस्ट कर रही है. पहले जहां रोज के कई स्टेट्स और पोस्ट होते थे, वहीं अकाउंट अब खाली पड़े हैं. अब कोई अपडेट नहीं देता है कि वह कहां है, किसके साथ और क्या खा रहा है. इसके बाद कहा जा रहा है कि इस जनरेशन से सोशल मीडिया छोड़ दिया है.

लेकिन ऐसा नहीं है. इस जनरेशन से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म क्विट नहीं किया बल्कि सोशल मीडिया से दूरी बना ली है. हालांकि, लोग इस बदलाव से हैरान हैं. चलिए ऐसे में जानते हैं आखिर क्या है कारण. 

परफेक्ट दिखने का दबाव

GEN Z उस दौर में बड़ा हुआ है जहां हर पोस्ट एक स्टेटमेंट मानी जाती है. फोटो हो या वीडियो, सब कुछ “एस्थेटिक”, “ट्रेंडिंग” और “फिल्टर-परफेक्ट” होना ज़रूरी हो गया है. इस लगातार तुलना के माहौल में खुद को हर बार बेहतर साबित करने का दबाव मानसिक थकान पैदा करता है. कई युवा अब सोचते हैं कि अगर कंटेंट परफेक्ट नहीं है, तो पोस्ट करना ही क्यों.

लाइक्स से जुड़ी वैल्यू का डर

पहले सोशल मीडिया खुशी बांटने का ज़रिया था, अब यह वैलिडेशन का पैमाना बन गया है. कम लाइक्स या कम रीच को GEN Z अक्सर अपनी पर्सनल वैल्यू से जोड़ लेता है. यही वजह है कि पोस्ट डालना खुशी नहीं, बल्कि चिंता का कारण बन जाता है. पोस्ट के बाद फोन बार-बार चेक करना, रीच गिरने पर निराश होना-ये सब इस बोझ को और बढ़ा देते हैं.

ट्रोलिंग और जजमेंट का खौफ

GEN Z सबसे ज़्यादा अवेयर जनरेशन मानी जाती है, लेकिन साथ ही सबसे ज़्यादा जज भी की जाती है. किसी एक गलत शब्द, पुराने पोस्ट या राय को लेकर ट्रोलिंग शुरू हो सकती है. इस डर ने युवाओं को सेल्फ-सेंसरशिप की तरफ धकेल दिया है. कई लोग सोचते हैं कि चुप रहना, बोलने से बेहतर है.

प्राइवेसी और डिजिटल थकान

हर पल ऑनलाइन रहना, हर मूड को स्टोरी में बदलना, GEN Z अब इससे थक चुका है. उन्हें लगने लगा है कि सोशल मीडिया उनकी निजी ज़िंदगी पर हावी हो रहा है. इसलिए यह पीढ़ी सीमाएं तय कर रही है-कम पोस्ट, कम स्टोरी और ज्यादा रियल लाइफ. डिजिटल डिटॉक्स उनके लिए अब ट्रेंड नहीं, ज़रूरत बन चुका है.

माइंडफुल लाइफ की ओर वापसी

सोशल मीडिया से दूरी बनाना GEN Z का भागना नहीं, बल्कि बैलेंस ढूंढना है. यह पीढ़ी अब समझ रही है कि हर पल शेयर करना ज़रूरी नहीं. असली खुशी कैमरे के बाहर भी होती है. पोस्ट करने का बोझ उतारकर GEN Z खुद से, अपनी मेंटल हेल्थ से और अपनी असली पहचान से दोबारा जुड़ रहा है.

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