कहां गए वो सोसाइटी या कॉलोनियों में धमाल मचाने वाले बच्चे? मोबाइल निगल रहा बचपन
कभी सोसाइटी और कॉलोनियों की गलियां बच्चों की हंसी, शोर और खेलकूद से गूंजती थीं. स्कूल से लौटते ही बच्चे बैग फेंककर बाहर दौड़ पड़ते थे और शाम तक गली क्रिकेट, झूले और छुपन-छुपाई में मस्त रहते थे.;
मैं जब अपनी कॉलोनी की बालकनी में खड़ी होकर नीचे देखती हूं, तो सबसे ज्यादा जो चीज खटकती है, वह है सन्नाटा. वही गली, जहां कभी बच्चों की चीख-पुकार, हंसी, दौड़ते कदमों की आवाज और “आउट है… आउट है!” की गूंज सुनाई देती थी, आज अजीब सी शांत पड़ी रहती है. कभी-कभी सोचती हूं कि कहां गए वो बच्चे जो स्कूल से थके-हारे आने के बाद भी बैग फेंककर सीधे गली में खेलने भाग जाते थे?
स्कूल से लौटते ही खेल की बेचैनी
मुझे आज भी याद है, हम जैसे ही स्कूल से घर पहुंचते, मां की एक ही आवाज आती “पहले कपड़े बदलो, हाथ-मुंह धोओ, फिर बाहर जाना.” लेकिन हमारा ध्यान सिर्फ एक बात पर होता था 'जल्दी से नीचे पहुंचना है.' होमवर्क बाद में भी हो जाएगा, लेकिन अगर देर हो गई तो झूला कोई और ले लेगा, क्रिकेट की टीम फुल हो जाएगी या लंगड़ी टांग का खेल शुरू हो जाएगा. थकान उस समय शब्दकोश में ही नहीं होती थी. धूप हो, पसीना हो, कोई फर्क नहीं पड़ता था.
पार्क का झूला और हमारी दौड़
पार्क हमारे लिए किसी स्टेडियम से कम नहीं था. जो बच्चा सबसे पहले पहुंचता, वही झूले पर कब्जा जमाता. बाकी बच्चे अपनी बारी का इंतजार करते हुए इधर-उधर दौड़ते, स्लाइड पर चढ़ते, पेड़ों के पीछे छिपकर छुपन-छुपाई खेलते. झूला सिर्फ खेलने की चीज नहीं था, वह जीत का एहसास था “आज मैं पहले आया!”
गली का क्रिकेट और टूटते कांच
शाम होते-होते गली क्रिकेट के मैदान में बदल जाती थी. ईंटों से विकेट बनते, टेनिस बॉल से मैच शुरू होता. हर घर की दीवार बाउंड्री थी और हर खिड़की एक रिस्क. कई बार जोरदार शॉट लगते और गेंद सीधा किसी खिड़की के कांच पर जा लगती. फिर सब बच्चे कुछ सेकंड के लिए गायब! डांट पड़ती, कभी-कभी घर पर शिकायत भी पहुंचती, लेकिन अगले दिन वही खेल फिर शुरू हो जाता. गुस्सा भी था, शरारत भी थी, लेकिन उस सब में जिंदगी थी.
आज की गली का सन्नाटा
अब वही गली शाम को भी खाली रहती है. पार्क में झूले खाली झूलते रहते हैं. क्रिकेट की आवाज की जगह अब घरों के अंदर से आती मोबाइल गेम्स की धुन सुनाई देती है. बच्चे बाहर नहीं दिखते, क्योंकि वे कमरे के अंदर स्क्रीन के सामने बैठे होते हैं. उनकी उंगलियां दौड़ती हैं, लेकिन पैर नहीं.
मोबाइल निगल रहा बचपन
मैंने अपने आसपास के बच्चों में यह बदलाव साफ देखा है. स्कूल से आते ही पहले पानी नहीं, मोबाइल चाहिए. खाना खाते समय वीडियो, सोने से पहले गेम, और खाली समय में सोशल मीडिया. धीरे-धीरे बाहर खेलने की आदत खत्म हो गई. दोस्तों से मिलना कम हो गया. अब दोस्ती भी ऑनलाइन है, खेल भी ऑनलाइन और हंसी भी ऑनलाइन. लेकिन स्क्रीन वाली हंसी में वह बात नहीं, जो गली में गूंजती थी.
हमें क्या खोने का एहसास हो रहा है?
मोबाइल ने बच्चों का समय तो ले लिया, लेकिन उनसे उनका बचपन भी छीन लिया. वे मिट्टी से दूर हो गए, धूप से दूर हो गए, असली दोस्ती से दूर हो गए. हमने उन्हें सुरक्षित रखने के लिए घर के अंदर रखा, लेकिन अनजाने में उन्हें स्क्रीन की दुनिया में कैद कर दिया. कभी-कभी जब मैं किसी बच्चे को साइकिल चलाते या पार्क में दौड़ते देखती हूं, तो मन खुश हो जाता है. लगता है, अभी भी देर नहीं हुई है. अगर हम चाहें, तो बच्चों को फिर से गली, पार्क, मिट्टी और असली खेलों की ओर लौटा सकते हैं. मोबाइल जरूरी है, लेकिन बचपन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है.