मोबाइल ने छीन लिया है बचपन! आप ऐसे छुड़ा सकते हैं अपने बच्चों से मोबाइल की लत

आज के समय में बच्चों के हाथ से मोबाइल छूटना आसान नहीं है. गेम, वीडियो और सोशल मीडिया उन्हें घंटों स्क्रीन से जोड़े रखते हैं. लेकिन अगर पेरेंट्स सही तरीके अपनाएं, नियम बनाएं और बच्चों के साथ समय बिताएं, तो धीरे-धीरे यह आदत कम की जा सकती है.;

mobile addiction

(Image Source:  AI SORA )
Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 6 Feb 2026 1:48 PM IST

मैं दिल्ली में रहती हूं और दो बच्चों की मां हूं. कुछ समय पहले तक मुझे लगता था कि मोबाइल बच्चों को बिजी रखने का आसान तरीका है. घर के काम, ऑफिस की जिम्मेदारियां और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच जब भी मुझे थोड़ा समय चाहिए होता, मैं अपने बच्चे के हाथ में फोन दे देती.

धीरे-धीरे यह “कुछ देर” घंटों में बदल गया. मेरा बच्चा खाना खाते समय, सोने से पहले, यहां तक कि उठते ही मोबाइल ढूंढने लगा. तब मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ आदत नहीं, बल्कि मोबाइल की लत बन चुकी है, लेकिन मुझे समय रहते ही समझ आ गया कि इस आदत से बच्चे को दूर करना होगा. ऐसे में मैंने धीरे-धीरे कुछ चीजें बदली, जिससे मेरे बच्चे ने फोन देखना कम कर दिया. हालांकि, बच्चे की लत छुड़ाने से पहले आपको अपनी आदत बदलनी होगी. 

बच्चों को मोबाइल की लत कैसे लगती है

मैंने गौर किया कि जब भी मैं बिजी होती, मेरा बच्चा फोन मांगता और मैं दे देती. उसे गेम, वीडियो और कार्टून में इतना मज़ा आने लगा कि उसे बाहर खेलने या किताब देखने में इंटरेस्ट कम होने लगी. उसके दोस्त भी मोबाइल चलाते थे, जिससे उसकी चाहत और बढ़ गई. मुझे समझ आया कि गलती सिर्फ बच्चे की नहीं, मेरी भी थी.

मोबाइल की जगह दिए खिलौने

मैंने अपने बच्चे को सबसे पहले मोबाइल की जगह खिलौने देना शुरू किया. जैसे ही मेरा बच्चा फोन की मांग करता, मैं तुरंत उसे कुछ ऐसे खिलौने दे देती, जो उसकी एक्साइटमेंट को बढ़ाते. हालांकि, शुरुआत में बच्चा फोन के लिए परेशान होता था, लेकिन धीरे-धीरे उसे फोन से ज्यादा खिलौनों में इंटरेस्ट आने लगा. 

बाहर खेलने ले जाना

जब मेरा बच्चा फोन की जिद्द करता था, तो ऐसे में मैंने उसे पार्क ले जाना शुरू किया, जहां वह दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगा. इतना ही नहीं, अगर वह बाहर नहीं जाता तो उसके लिए घर के एक कोने में गेमिंग जोन बना दिया. 

फैमिली टाइम बढ़ाया

आजकल हम सभी काम के बाद थकने के बावजूद बात करने के बजाय अपने-अपने फोन में लगे रहते हैं. यही आदत बच्चों में भी आती है. तो ऐसे में मैंने फैमिली टाइम बढ़ाया. जहां हम रोज़ रात को साथ बैठकर बातें करते हैं. अपने बच्चे के साथ लूडो और कैरम खेलना शुरू किया. इससे उसका ध्यान स्क्रीन से हटकर परिवार की ओर आने लगा.

एजुकेशनल ऐप्स

मैंने कुछ एजुकेशनल ऐप्स उसके साथ बैठकर चलाए, ताकि वह समझ सके कि मोबाइल सिर्फ गेम के लिए नहीं, सीखने के लिए भी है. फोन कम करने के बाद जो बदलाव मैंने देखे. कुछ ही हफ्तों में मैंने अपने बच्चे में अलग बदलाव देखा. 

एक जरूरी बात जो मैंने सख्ती से अपनाई

मैंने यह सुनिश्चित किया कि मोबाइल देखते समय उसकी आंखों और स्क्रीन के बीच कम से कम 30 सेंटीमीटर की दूरी हो. इससे आंखों पर दबाव कम पड़ा. सख्ती नहीं, समझदारी से छुड़ाई जा सकती है मोबाइल की लत आज मेरा बच्चा मोबाइल इस्तेमाल करता है, लेकिन सीमित समय के लिए. मैंने सीखा कि बच्चों से मोबाइल छीनना समाधान नहीं है, बल्कि उन्हें सही दिशा देना जरूरी है. थोड़ी समझदारी, धैर्य और समय देकर हम बच्चों को मोबाइल की लत से आसानी से बाहर निकाल सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान ने डॉक्टर निशा खन्ना मनोवैज्ञानिक और काउंसलर हैं. सबसे पहले हमें यह समझना है कि बच्चे सुसाइड क्यों कर रहे हैं. यह बात हम सभी जानते हैं कि 11-15 साल के बच्चे का दिमाग पूरी तरह से डेवलप नहीं होता है. उन्हें सही और गलत नहीं पता होता है. क्योंकि बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं. असली दुनिया से खुद को जोड़ नहीं पाते हैं, तो वह वर्चुअल दुनिया को ही सबकुछ मान लेते हैं. जब उन्हें गेमिंग में टास्क के बाद रिवॉर्ड मिलते हैं, तो उनका डोपेमाइन बूस्ट हो जाता है. 

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