पलंग तोड़ नाम कैसे पड़ा? जानिए इस मिठाई को बनाने की दिलचस्प वजह; जिसे खाते ही गिर पड़ेंगे बिस्तर पर
वाराणसी की पलंग तोड़ मिठाई सर्दियों में मिलने वाली एक खास देसी स्वीट है, जो अपनी गाढ़ी मलाई और ताकत के लिए मशहूर है. नाम भले चौंकाने वाला हो, लेकिन स्वाद और एनर्जी के मामले में यह मिठाई लोगों की पहली पसंद बनी हुई है.;
वाराणसी यानी बनारस, भारत के सबसे खास और लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है. यहां के घाट, गंगा की आरती, मंदिर और पुरानी गलियां सबको अपनी ओर खींचती हैं. लेकिन अगर बात खाने-पीने की हो तो बनारस मिठाई प्रेमियों के लिए सचमुच स्वर्ग जैसा है. यहां कई तरह की स्वादिष्ट मिठाइयां मिलती हैं, लेकिन सर्दियों में एक ऐसी मिठाई बहुत फेमस है जिसका नाम है पलंग तोड़. इस मिठाई का नाम सुनकर लोग हैरान हो जाते हैं कि आखिर 'पलंग तोड़' नाम क्यों? इसका मतलब तो होता है 'बिस्तर तोड़ने वाला' लेकिन चिंता मत करो, यह कोई हिंसक चीज़ नहीं है! यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह मिठाई इतनी गाढ़ी, मलाईदार और भरपूर होती है कि इसे खाने के बाद पेट पूरी तरह भर जाता है.
शरीर में इतना भारीपन और सुस्ती आ जाती है कि लगता है जैसे आप सीधे बिस्तर पर गिर पड़ेंगे और बिस्तर टूट जाएगा. स्थानीय लोग मज़ाक में कहते हैं कि यह मिठाई खाकर तो कोई भी 'पलंग तोड़' सकता है. यह मिठाई खासतौर पर सर्दियों में बनती और खाई जाती है. दिवाली के बाद से होली तक, यानी दिसंबर से फरवरी के महीनों में ही यह अवेलेबल होती है. ठंड के मौसम में यह शरीर को गर्मी और ताकत देती है. पुराने समय में लोग इसे शादी के सीज़न में खासकर नवविवाहित जोड़ों के लिए बनाते थे. लोककथाओं में कहा जाता है कि यह मिठाई बहुत एनर्जी देती है और रात को यादगार बनाने में मदद करती है. इसलिए इसे 'सोर्स ऑफ़ विंटर पावर' भी कहते हैं.
पलंग तोड़ कैसे बनती है?
यह कोई जल्दी-जल्दी बनने वाली मिठाई नहीं है. इसमें बहुत धैर्य और मेहनत लगती है. पारंपरिक तरीके से इसे बनाने में कम से कम 10 से 12 घंटे लग जाते हैं. आजकल गैस पर नहीं, बल्कि गोबर के उपलों या लकड़ी की धीमी आंच पर पकाया जाता है, ताकि असली स्वाद आए. बनाने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है: सबसे पहले भैंस के दूध (कभी-कभी गाय के भी) को बहुत धीमी आंच पर गर्म किया जाता है. इससे ऊपर मोटी-मोटी मलाई की परतें जमती हैं. इन मलाई की परतों को धीरे-धीरे इकट्ठा करके एक के ऊपर एक रखा जाता है. जैसे-जैसे परतें बनती हैं, वैसे-वैसे बीच-बीच में चीनी की हल्की चाशनी डाली जाती है. चाशनी में केसर, इलायची और कभी-कभी अन्य मसाले मिलाए जाते हैं, जिससे मिठाई में खुशबू और गर्म स्वाद आता है. आखिर में ऊपर से बारीक कटे हुए बादाम, पिस्ता और अन्य ड्राई फ्रूट्स की भरपूर टॉपिंग कर दी जाती है. यह पूरी प्रक्रिया बहुत बारीकी से की जाती है, इसलिए बनारस की पुरानी गलियों में सिर्फ कुछ ही खास दुकानें इसे असली पारंपरिक तरीके से बनाती हैं. रोज़ाना बहुत कम मात्रा में बनती है, जैसे एक दुकान पर सिर्फ 8 किलो, और जल्दी बिक भी जाती है.
इसे सबसे अच्छे समय पर कब खाना चाहिए?
पलंग तोड़ सर्दियों की स्पेशल मिठाई है. जब ठंड बहुत पड़ती है, तब इसका असली मज़ा आता है. इसे आमतौर पर छोटे मिट्टी के कुल्हड़ या प्याले में परोसा जाता है. कभी-कभी साथ में केसर वाला गरम दूध भी दिया जाता है, जो इसकी मलाई के साथ कमाल का कॉम्बिनेशन बनता है.
इसकी कीमत कितनी होती है?
यह मिठाई थोड़ी महंगी होती है क्योंकि इसमें शुद्ध मलाई, केसर, अच्छे ड्राई फ्रूट्स और बहुत मेहनत लगती है. आमतौर पर 1 किलो की कीमत 1,000 से 1,500 रुपये या उससे भी ज़्यादा हो सकती है (मौसम और दुकान के हिसाब से थोड़ा बदलाव हो सकता है). लेकिन एक बार स्वाद चखने के बाद लोग कहते हैं कि यह कीमत इसके लायक है.
वाराणसी में पलंग तोड़ कहां मिलेगा?
यह हर दुकान पर नहीं मिलता. ज्यादातर पुराने शहर की संकरी गलियों में ही मिलती है. कुछ बहुत प्रसिद्ध जगहें हैं: भैरव सरदार यह सबसे मशहूर है. चौक क्षेत्र में पक्के महाल, परशुराम मंदिर के ठीक सामने नंदन साहू लेन या पास वाली जगह पर स्थित है. यह परिवार 60-70 साल से ज्यादा समय से इसे बना रहा है. यहां रोज़ाना बहुत कम बनती है और लोग लाइन लगाकर ले जाते हैं. राज बंधु स्वीट्स: कमाच्छा या कचारी इलाके में यह भी अच्छी मानी जाती है। सर्दियों में यहां भी अच्छी भीड़ रहती है.