सफेद कोट का संकट! 91% भारतीय डॉक्टर ही नहीं चाहते उनके बच्चे इस पेशे को बनाएं करियर
नई स्टडी में सामने आया कि 91% भारतीय डॉक्टर अपने बच्चों को मेडिकल प्रोफेशन से दूर रखना चाहते हैं. बर्नआउट, सुरक्षा की कमी और लीगल दबाव इस बदलाव की बड़ी वजह बने हैं.
भारत के हेल्थकेयर सिस्टम से जुड़ी एक नई स्टडी ने चौंकाने वाली हकीकत उजागर की है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 91% से ज्यादा डॉक्टर अपने बच्चों को मेडिकल प्रोफेशन में आने की सलाह नहीं देना चाहते. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बढ़ते दबाव, असुरक्षा और मानसिक थकान की कहानी है, जिससे आज का डॉक्टर गुजर रहा है. ईटी ने देवब्रत मिताली ऑरो फाउंडेशन के अध्ययन रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि बर्नआउट, मरीजों के परिजनों की हिंसा और बढ़ते कानूनी जोखिमों ने इस पेशे की चमक को फीका कर दिया है, जिससे भविष्य में हेल्थकेयर सेक्टर पर गहरा असर पड़ सकता है.
क्या कहती है नई स्टडी और क्यों बढ़ी चिंता?
भारत में हेल्थकेयर सेक्टर को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है. एक नई स्टडी के अनुसार, 91% से ज्यादा भारतीय डॉक्टर नहीं चाहते कि उनके बच्चे मेडिकल प्रोफेशन को करियर के तौर पर चुनें. यह निष्कर्ष सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश के हेल्थकेयर सिस्टम के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है. इस सर्वे में मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों तक के 1,200 से अधिक डॉक्टरों को शामिल किया गया, जिससे यह साफ होता है कि यह समस्या व्यापक स्तर पर मौजूद है.
डॉक्टर अपने बच्चों को इस पेशे से दूर क्यों रखना चाहते हैं?
स्टडी के मुताबिक, करीब 91.4% डॉक्टरों ने कहा कि वे अपने बच्चों को मेडिसिन में करियर बनाने से हतोत्साहित करेंगे. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह प्रोफेशनल निराशा है. डॉक्टरों का मानना है कि इस पेशे में अब पहले जैसी सम्मान और सुरक्षा नहीं रही. लंबे वर्किंग आवर्स, कम वर्क-लाइफ बैलेंस और लगातार बढ़ते दबाव ने इस पेशे को मानसिक रूप से बेहद थका देने वाला बना दिया है.
क्या बर्नआउट डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुका है?
स्टडी में सामने आया कि बड़ी संख्या में डॉक्टर बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं. लगातार काम का दबाव, इमरजेंसी ड्यूटी और मानसिक तनाव उन्हें थका देता है. कई डॉक्टरों ने स्वीकार किया कि पिछले एक साल में उन्होंने गंभीर मानसिक थकान महसूस की. यह स्थिति न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती है, बल्कि उनके पेशेवर प्रदर्शन पर भी असर डालती है.
हेल्थकेयर वर्कर्स के खिलाफ हिंसा कितनी बड़ी चिंता है?
डॉक्टरों के लिए एक बड़ी समस्या मरीजों और उनके परिजनों की ओर से होने वाली हिंसा भी है. कई डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें अपने करियर के दौरान गाली-गलौज, धमकी या यहां तक कि शारीरिक हमले का सामना करना पड़ा है. यह डर उनके काम के माहौल को असुरक्षित बनाता है और उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करता है.
मेडिको-लीगल दबाव डॉक्टरों को कैसे प्रभावित कर रहा है?
मेडिको-लीगल मामलों का बढ़ता दबाव भी डॉक्टरों की चिंता का बड़ा कारण है. स्टडी में शामिल अधिकांश डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें अपने करियर के किसी न किसी चरण में कानूनी शिकायतों का सामना करना पड़ा है. इससे उनमें हमेशा एक डर बना रहता है, जिससे वे रक्षात्मक तरीके से काम करने लगते हैं और प्रोफेशनल संतुष्टि कम हो जाती है.
क्या समाज में डॉक्टरों की छवि कमजोर हो रही है?
रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में समाज में उनकी छवि कमजोर हुई है. पहले जहां डॉक्टरों को सम्मान और भरोसे के साथ देखा जाता था, वहीं अब कई मामलों में उन्हें संदेह की नजर से देखा जाता है. यह भरोसे की कमी डॉक्टरों के मनोबल को प्रभावित कर रही है और उन्हें अपने करियर को लेकर दोबारा सोचने पर मजबूर कर रही है.
क्या भारत के डॉक्टर ग्लोबल स्तर से ज्यादा दबाव झेल रहे हैं?
अंतरराष्ट्रीय तुलना में भी भारतीय डॉक्टरों की स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण नजर आती है. अन्य देशों की स्टडीज के मुकाबले भारत में डॉक्टरों में तनाव, असुरक्षा और पेशे से असंतोष का स्तर अधिक पाया गया. इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के हेल्थकेयर सिस्टम में संरचनात्मक सुधार की जरूरत है.
क्या यह भविष्य में हेल्थकेयर सेक्टर के लिए खतरा बन सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डॉक्टर अपने बच्चों को इस पेशे में आने से रोकते रहेंगे, तो आने वाले समय में टैलेंट की कमी हो सकती है. इससे देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है. यह स्थिति एक बड़े संकट का रूप ले सकती है.
इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है?
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि डॉक्टरों के लिए बेहतर मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम बनाया जाए. साथ ही, वर्कप्लेस हिंसा के खिलाफ सख्त कानून लागू हों, मेडिको-लीगल प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए और डॉक्टरों व मरीजों के बीच भरोसा फिर से मजबूत किया जाए. अगर इन मुद्दों पर समय रहते काम नहीं हुआ, तो यह संकट और गहरा सकता है.
क्या डॉक्टरों का भरोसा लौटाना जरूरी है?
कुल मिलाकर, यह स्टडी सिर्फ डॉक्टरों की व्यक्तिगत परेशानी नहीं दिखाती, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करती है. अगर डॉक्टर ही अपने पेशे से निराश हैं, तो यह एक गंभीर संकेत है. ऐसे में जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर ऐसे कदम उठाएं, जिससे डॉक्टरों का भरोसा बहाल हो सके और आने वाली पीढ़ी इस पेशे को अपनाने के लिए प्रेरित हो.