जिसका बच्चा जाता है उसपर ही गुजरती है, बुराड़ी में 10 दिनों में 2 बच्चे लापता; अब किस हाल में हैं दोनों के माता-पिता?
दिल्ली में महज 15 दिनों के भीतर 800 से ज्यादा बच्चे और युवा लापता हो चुके हैं. CCTV फुटेज डिलीट, पुलिस की देरी और टूटते परिवार इस संकट को और भयावह बना रहे हैं.;
राजधानी से दिल्ली से काफी समय से खबरें आ रही है कि हर दिन लगभग 54 लोग गायब हो रहे है. परिजन पुलिस केस कराती है ढूढ़ने का प्रयास जारी है लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर यह बच्चें और कुछ युवा कैसे किस तरह से गायब हो रहे है. गायब होने का यह आकंड़ा अब 800 से ज्यादा हो गया है जो एक चिंता विषय बात है. दिल्ही में महज 15 दिनों में 800 से ज्यादा बच्चे और युवा लापता हो गए है, पुलिस की नाक के नीचे, मेट्रो की फुटेज डिलीट, सीसीटीवी के सुराग मिटते जा रहे. मांएं दरवाजे पर पथराई आंखों से इंतजार करती हैं, पिता बेबस सवाल पूछते हैं. यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं यह उन बिलखती माताओं की चीख है, जिनके सपने अंधेरे में खो गए. क्या दिल्ली अब अपने ही बच्चों के लिए एक डरावना भूलभुलैया बन चुकी है?.
यह समस्या सिर्फ आंकड़ों की जंग नहीं है; यह उन मांओं की बिलखती चीखें हैं, जिनकी आंखें दरवाजे पर टिकी रहती हैं, उम्मीद की एक झलक की तलाश में. पिताओं के चेहरे पर उदासी की परतें चढ़ गई हैं, और परिवारों की जिंदगी थम सी गई है. पुलिस की फाइलें धूल खाती रहती हैं, जबकि समय के साथ सुराग मिटते जाते हैं—सीसीटीवी फुटेज डिलीट हो जाते हैं, गवाहों की याददाश्त धुंधली पड़ जाती है, और लापता बच्चों की तस्वीरें सिर्फ पोस्टर्स पर सिमट कर रह जाती हैं. न्यूज18 इंडिया की टीम जब दिल्ली के बुराड़ी इलाके में पहुंची, तो वहां दो परिवारों का दर्द सामने आया, जो दिसंबर महीने से अपने बेटों की तलाश में भटक रहे हैं. ये कहानियां न केवल व्यक्तिगत त्रासदियां हैं, बल्कि सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही की जीती-जागती मिसालें हैं.
केस स्टडी 1: वसीम रजा
बिहार के किशनगंज जिले से दिल्ली आकर बसने वाले तेमुल हक और उनकी पत्नी रूबी का जीवन कभी साधारण था. वे बुराड़ी के मौर्य एनक्लेव में एक छोटे से घर में रहते हैं, जहां मेहनत से गुजारा चलता है. उनका 19 साल का बेटा वसीम रजा संगीत का दीवाना था. उसकी उंगलियां हारमोनियम पर थिरकती थीं, और उसकी आवाज में एक जादू था जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता था. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वसीम अपने सपने को पंख दे सके. पिता तेमुल चाहते थे कि बेटा व्यावहारिक हुनर सीखे एसी रिपेयरिंग का काम, जो रोजगार की गारंटी देता. इस असहमति ने घर में तनाव पैदा कर दिया था, लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह तनाव इतना गहरा साबित होगा. 27 दिसंबर की रात वसीम घर पर ही था. परिवार के साथ रात का खाना खाया, कुछ बातें कीं, और फिर सो गया. अगली सुबह 9 बजे जब परिवार जगा, तो वसीम गायब था. उसका हारमोनियम भी साथ गया था, जो इशारा करता है कि शायद वह अपनी मर्जी से निकला हो. लेकिन उसके बाद क्या हुआ? कोई फोन नहीं आया, कोई मैसेज नहीं. रिवार ने तुरंत पुलिस से संपर्क किया, लेकिन यहां से शुरू हुई सुस्ती की कहानी. वसीम के पिता तेमुल हक का कहना है कि पुलिस ने न तो गली के सीसीटीवी फुटेज की जांच की, न ही आस-पास के इलाकों में तलाशी ली. 'हमने बार-बार गुहार लगाई, लेकिन वे कहते हैं इंतजार करो. कितना इंतजार? बच्चा कहां है, यह तो बताओ,' तेमुल की आवाज में दर्द साफ झलकता है. मां रूबी का हाल और भी बुरा है. उनकी आंखें सूजी हुई हैं, नींद गायब है. 'जिस मां का बच्चा खो जाए, उसके दिल पर क्या गुजरती है, यह सिर्फ वही जानती है. चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं तो घर-घर छान मारते हैं, लेकिन जब बच्चे की बात आती है, तो कोई सुनवाई नहीं.
केस स्टडी 2: ऋतिक झा
बुराड़ी के संत नगर इलाके में रहने वाले झा परिवार के लिए जीवन कभी सपनों से भरा था. उनका 16 साल का बेटा ऋतिक झा एक मेधावी छात्र था, जो JEE मेंस की तैयारी में जुटा हुआ था. किताबें उसकी दुनिया थीं, और भविष्य में इंजीनियर बनने का सपना उसकी आंखों में चमकता था. लेकिन 17 दिसंबर को एक छोटी सी घटना ने सब कुछ बदल दिया. मां बेबी झा ने उसे किसी बात पर डांटा शायद पढ़ाई में लापरवाही या कोई घरेलू काम. गुस्से में ऋतिक घर से निकल गया, और फिर कभी नहीं लौटा. उसकी आखिरी लोकेशन नेताजी सुभाष पैलेस (एनएसपी) मेट्रो स्टेशन पर ट्रेस की गई थी, लेकिन उसके बाद का कोई सुराग नहीं. परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज की, लेकिन यहां फिर वही पुरानी कहानी दोहराई गई. पुलिस को मेट्रो अथॉरिटी को लैटर लिखने में पूरे 7 दिन लग गए. इस देरी के कारण मेट्रो की पुरानी सीसीटीवी फुटेज डिलीट हो चुकी थी. एक ऐसा सबूत जो ऋतिक की तलाश में मददगार साबित हो सकता था. मां बेबी झा अब हर रात डर से कांपती हैं. वह कहती है, 'मुझे लगता है कि मेरे बेटे का अपहरण हो गया है. वह इतना समझदार था, खुद से इतनी दूर नहीं जाता. लेकिन पुलिस कहती है इंतजार करो.कितना इंतजार? क्या मेरा बच्चा कभी लौटेगा?' बेबी की ये बातें दिल दहला देती हैं. ऋतिक की तस्वीर अब परिवार की दीवार पर टंगी है, लेकिन उसकी कमी घर को खाली कर चुकी है.
आंकड़ों का कड़वा सच: दिल्ली में गायब होती सुरक्षा की परतें
ये दो मामले सिर्फ हिमशैल की नोक हैं. दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, महज 15 दिनों में 800 से अधिक लोग लापता हो चुके हैं. एक ऐसा आंकड़ा जो शहर की आबादी को देखते हुए भी भयावह है. वसीम के पिता तेमुल हक का सवाल बिल्कुल जायज है: 'अगर ऐसे ही चलता रहा, तो दिल्ली खाली हो जाएगी. बच्चे कहां जा रहे हैं? क्या कोई गिरोह है, या सिस्टम इतना कमजोर है?' राजधानी में जहां चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे होने का दावा किया जाता है, वहां लापता होने की घटनाएं बढ़ना चिंताजनक है. ट्रैफिकिंग, अपहरण, या मानसिक दबाव के कारण चाहे जो हों, लेकिन पुलिस की प्रतिक्रिया की गति इतनी धीमी क्यों है?.
चौंका देंगे आंकड़े
दिल्ली में लापता होने के मामलों के आंकड़े बहुत चिंताजनक हैं. जनसत्ता में छपे लेख के मुताबिक, जनवरी 2026 के पहले 15 दिनों में (1 से 15 जनवरी):
- कुल 807 लोग लापता हुए, यानी हर दिन औसतन 54 लोग गायब हो रहे थे
- इनमें 509 महिलाएं और लड़कियां (लगभग दो-तिहाई) और 298 पुरुष थे
- 191 बच्चे/नाबालिग लापता हुए (इनमें 146 लड़कियां और बाकी लड़के)
- हर दिन औसतन 13 बच्चे गायब हो रहे थे
- किशोर (टीनएज) में 169 मामले थे, जिनमें 138 लड़कियां और सिर्फ 31 लड़के
- पुलिस ने कुल 235 लोगों का पता लगाया, लेकिन अभी भी 572 लोग लापता हैं
- 8 से 12 साल के 13 बच्चे गायब हुए (8 लड़के, 5 लड़कियां), इनमें से सिर्फ 3 लड़कों को ढूंढा गया
- पूरे साल 2025 में: कुल 24,508 लोग लापता हुए।
- इनमें 14,870 महिलाएं (60% से ज्यादा) और 9,638 पुरुष थे
- पुलिस ने 15,421 लोगों को ढूंढ लिया, लेकिन 9,087 मामले अभी भी अनसुलझे हैं
- किशोरों में 5,081 बच्चे लापता हुए, जिनमें 3,970 लड़कियां थीं. इनमें से 1,013 लड़कियों का अभी तक पता नहीं चला
- पिछले 10 सालों में (लगभग 2016-2025): कुल 2,32,737 लोग लापता हुए
- इनमें से लगभग 1.8 लाख को ढूंढ लिया गया, लेकिन 52,000 मामले आज भी अनसुलझे हैं
- हर साल औसतन 5,000 से ज्यादा किशोर लापता हो रहे हैं, जिनमें ज्यादातर लड़कियां (लगभग 3,500)
सिस्टम की लापरवाही