बेमेल गठबंधन से चलेगी तमिलनाडु में विजय की सरकार? देश में कब-कब हुआ ऐसा और क्या हुआ उनका हश्र
तमिलनाडु में टीवीके प्रमुख थलापति विजय की संभावित गठबंधन सरकार पर संकट के संकेत. जानिए भारत में कब-कब बने अननेचुरल अलायंस और कितना चला उनका शासन.
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से वहां की राजनीति में इस बार ऐसा समीकरण बनता दिख रहा है, जिसने सत्ता के गणित को पूरी तरह उलझा दिया है. हंग असेंबली के बाद टीवीके प्रमुख थलापति विजय (Thalapathy Vijay) बहुमत जुटाने की कोशिश में हैं, लेकिन इलेक्शन रिजल्ट आने के चार दिन बाद भी वे राज्यपाल के सामने 118 विधायकों का समर्थन पेश नहीं कर पाए हैं. सत्ता तक पहुंचने के लिए विजय उन दलों से भी बातचीत कर रहे हैं, जिनकी विचारधारा उनसे बिल्कुल अलग है. यही वजह है कि तमिलनाडु में संभावित “अननेचुरल अलायंस” यानी बेमेल गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है.
सवाल सिर्फ सरकार बनाने या न बनाने की नहीं, बल्कि उसके टिकाऊ होने का भी है. इस मसले पर वहां राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने विजय से पहले बहुमत संख्या बल का सबूत पेश करने को कहा है. गवर्नर के इसी रुख ने विजय की सियासी चाल को उलझा दिया है. अब वो छोटे-छोटे दलों से भी समर्थन मांग रहे हैं. कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दे दिया है. इसके बावजूद वो बहुमत की संख्या को नहीं छू पाए हैं.अब वो तमिलनाडु के छोटे छोटे दलों से समर्थन मांग रहे हैं. इस बीच डीएमके ने कहा है विजय समर्थन लेकर सरकार बनाएं. मैं, भरोसा देता हूं कि छह महीने तक अविश्वास प्रस्ताव लेकर नहीं आउंगा.
वहीं, हंग असेंबली की स्थिति में अब तक अलग-अलग राज्यों में बने अननेचुरल अलाएंस की कहानी अच्छी नहीं है. ऐसी सरकार कितनी स्थायी होगी, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. राजनीति का इतिहास बताता है कि कई राज्यों में ऐसे विरोधाभासी गठबंधन बने, लेकिन ज्यादातर लंबे समय तक नहीं चल सके और मिड टर्म चुनाव हुए.
अननेचुरल अलायंस से चलेगी विजय की सरकार?
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद आए त्रिशंकु जनादेश ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. टीवीके प्रमुख Thalapathy Vijay सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं, लेकिन बहुमत से दूर हैं. सरकार बनाने के लिए उन्हें ऐसे दलों का समर्थन चाहिए, जिनकी राजनीति और विचारधारा टीवीके से मेल नहीं खाती. यही वजह है कि “अननेचुरल अलायंस” यानी अस्वाभाविक गठबंधन की चर्चा हो रही है.
भारतीय राजनीति में ऐसे गठबंधन नए नहीं हैं. जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब सत्ता तक पहुंचने के लिए वैचारिक विरोधी दल भी साथ आ जाते हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे गठबंधन अक्सर सत्ता की मजबूरी से बनते हैं और स्थिरता की परीक्षा में कमजोर साबित होते हैं.
तमिलनाडु के पास किसके पास कितने विधायक?
टीवीके के पास 108, डीएमके 59, एआईएडीएमके 47, कांग्रेस 5, पीएमके 4, आईयूएमएल दो, सीपीआई दो, वीसीके दो, सीपीआईएम दो, बीजेपी एक, डीएमडीके एक और एएमएमकेएमएनकेजैड के पास एक विधायक हैं. बहुमत के लिए 118 विधायकों की जरूरत हैं. विजय दो सीटों से चुनाव जीते हैं, इसलिए टीवीके के पास संख्या 107 है. स्पीकर वोट नहीं करता. ऐसे में एक और कम कर दें तो टीवीके के पास विधायकों की संख्या 106 है. यानी उन्हें सरकार बनाने के लिए कम से कम 12 अन्य विधायकों को समर्थन चाहिए. कांग्रेस के पांच विधायकों ने समर्थद दिया है. सात अन्य विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए उनकी नजर वीसीके, सीपीआईएम और सीपीआई की जरूरत पड़ेगी. तीनों के पास दो-दो विधायक हैं. यानी छह विधायक हैं. इसके बाद डीएमडीके एक और एएमएमकेएमएनकेजैड और उन्हें दोनों का समर्थन चाहिए. अगर सभी का समर्थन हासिल कर सरकार बना भी लें तो उसके स्थायित्व को लेकर सवाल उठते रहेंगे. छोटे दलों में अधिकांश या तो डीएमके गठबंधन से या फिर एनडीए गठबंधन से जुड़े हैं. इसलिए, विजय की सरकार बन भी गई तो उनकी सरकार को बेमेल गठबंधन वाली सरकार मानी जाएगी. जानें क्या है बेमेल गठबंधन का इतिहास.
कर्नाटक 2018: कांग्रेस-JDS गठबंधन
2018 में कर्नाटक में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर रह गई. इसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने साथ मिलकर सरकार बनाई. एच. डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने. कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन पूरी तरह राजनीतिक मजबूरी माना गया, क्योंकि दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के विरोधी रहे थे. यह सरकार करीब 14 महीने चली और बाद में विधायकों के इस्तीफे के कारण गिर गई.
महाराष्ट्र 2019: शिवसेना-NCP-कांग्रेस प्रयोग
महाराष्ट्र में 2019 का गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे बड़े “अननेचुरल अलायंस” में गिना गया. हिंदुत्व की राजनीति करने वाली शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी बनाई. Uddhav Thackeray मुख्यमंत्री बने. यह सरकार करीब ढाई साल चली, लेकिन बाद में शिवसेना में टूट के बाद सरकार गिर गई.
बिहार 2015 और 2022: विरोधियों का साथ
Bihar में Nitish Kumar ने कई बार वैचारिक रूप से अलग दलों के साथ सरकार बनाई. 2015 में जेडीयू और आरजेडी साथ आए, जबकि दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति करते रहे थे. यह गठबंधन लगभग 20 महीने चला. बाद में नीतीश कुमार ने पाला बदल लिया. 2022 में उन्होंने फिर बीजेपी छोड़कर महागठबंधन बनाया, लेकिन वह प्रयोग भी ज्यादा लंबा नहीं चल सका.
जम्मू-कश्मीर 2015: PDP-BJP गठबंधन
Jammu and Kashmir में पीडीपी और बीजेपी का गठबंधन भी बेहद अस्वाभाविक माना गया. एक तरफ कश्मीर केंद्रित क्षेत्रीय राजनीति, दूसरी तरफ राष्ट्रवादी एजेंडा. मुफ़्ती मोहम्मद सईद और बाद में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली यह सरकार करीब तीन साल चली, लेकिन अंततः बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया.
उत्तर प्रदेश 1993: सपा-बसपा गठबंधन
यूपी में 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने बीजेपी को रोकने के लिए हाथ मिलाया. यह गठबंधन सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बड़ा प्रयोग था, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद “गेस्ट हाउस कांड” के बाद टूट गया.
क्या विजय की सरकार स्थायी होगी?
तमिलनाडु में यदि Thalapathy Vijay अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को साथ लेकर सरकार बनाते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती सरकार को स्थिर बनाए रखने की होगी. ऐसे गठबंधनों में साझा विचारधारा नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक लक्ष्य ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. जैसे ही सत्ता संतुलन बिगड़ता है, सहयोगी दल दबाव की राजनीति शुरू कर देते हैं. इतिहास बताता है कि “अननेचुरल अलायंस” सरकारें शुरुआत में मजबूत दिखती हैं, लेकिन अंदरूनी विरोधाभास उन्हें कमजोर कर देते हैं. तमिलनाडु में भी विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत जुटाने से ज्यादा उसे लंबे समय तक संभालकर रखने की होगी.