- सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि हम इस मामले की गहराई से जांच चाहते हैं. यह पता लगाना होगा कि जिम्मेदार कौन है… जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए. हम इस मामले को बंद नहीं करेंगे. कोर्ट ने एनसीईआरटी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से तीखे सवाल किए.
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्त आदेश जारी करते हुए पुस्तक पर भारत और विदेश में प्रतिबंध लगा दिया है और सभी प्रतियां जब्त करने का निर्देश दिया है.
- अदालत ने किताब को ऑनलाइन, पूरी तरह या आंशिक रूप से साझा करने पर भी बैन लगाया है और केंद्र सरकार और एनसीईआरटी के अध्यक्ष प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सखलानी को नोटिस जारी किया है.
- इससे पहले तुषार मेहता ने कहा था कि चैप्टर 'द रोल ऑफ द जुडिशियरी इन अवर सोसाइटी' में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' का जिक्र करने वाले दो व्यक्तियों को भविष्य में यूजीसी या किसी भी मंत्रालय के साथ काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
- हालांकि मुख्य न्यायाधीश इससे संतुष्ट नहीं दिखे. उन्होंने कहा कि यह बहुत कम महत्व की बात है. उन्होंने गोली चला दी है और न्यायपालिका आज घायल है. यह गहरी साजिश जैसा लगता है. यह बहुत सोचा-समझा कदम है.
- मुख्य न्यायाधीश ने एनसीईआरटी की उस प्रेस रिलीज पर भी सवाल उठाए जिसमें कहा गया था कि अध्याय में 'अनुचित पाठ्य सामग्री अनजाने में शामिल हो गई' और 'निर्णय में त्रुटि' के लिए खेद व्यक्त किया गया था. अदालत की राय में यह बयान मांगी गई माफी के स्तर तक नहीं पहुंचता.
- तुषार मेहता ने बताया कि 32 किताबें बाजार में पहुंची थीं, जिन्हें अब वापस ले लिया गया है. उन्होंने कहा,"पूरा अध्याय संशोधित किया जाएगा. इसमें एक हिस्सा लंबित मामलों और ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है’ से जुड़ा भी है." उन्होंने कहा कि हम यह नहीं सिखा सकते कि न्याय से वंचित किया गया है.
- तुषार महता ने कहा कि इस स्वतः संज्ञान मामले में हम शुरुआत में बिना शर्त माफी पेश करते हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि एनसीईआरटी के बयान में माफी का साफ उल्लेख नहीं है.
विवादित अध्याय में क्या कहा गया?
संशोधित अध्याय ‘रोल ऑफ द जुडिशियरी इन अवर सोसाइटी’ केवल अदालतों की संरचना और न्याय तक पहुंच की जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार और लंबित मामलों जैसी चुनौतियों का भी जिक्र है. पुस्तक में कहा गया है कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के भीतर और बाहर उनके व्यवहार को कंट्रोल करती है. इसमें न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही व्यवस्था का भी जिक्र है.