क्या गोडसे ने RSS को ‘गांधी का हत्यारा’ बनने से बचा लिया? हत्या के बाद रची गई कहानी का सच
महात्मा गांधी की हत्या को लेकर दशकों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या नाथूराम गोडसे ने जानबूझकर आरएसएस को बचाया. पत्रकार धीरेंद्र कुमार झा का दावा है कि ट्रायल के दौरान गोडसे के बयानों ने इस नैरेटिव को गढ़ा. गांधी की हत्या के बाद गोडसे ने क्यों खुद पर सारे इल्जाम ले लिए? आरएसएस, सावरकर और हिंदू महासभा का असली रिश्ता क्या था? जानिए, धीरेंद्र झा ने डीयू के प्रोफेसर अपूर्वानंद को द वायर के पॉडकास्ट में क्या कहा?;
हिंदुस्तान की आजादी को याद करते वक्त 30 जनवरी 1948 को भुला पाना नामुमकिन है. 15 अगस्त 1947 को जिस धर्मनिरपेक्ष भारत की नींव रखी गई, उसके वैचारिक स्तंभ महात्मा गांधी थे. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने इसी सोच को आगे बढ़ाया, लेकिन आजादी के महज पांच महीने बाद गांधी की हत्या ने यह साफ कर दिया कि इस विचारधारा को चुनौती देने वाली ताकतें कितनी उग्र थीं. कई इतिहासकार मानते हैं कि ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ की नींव गांधी के खून से पड़ी. पत्रकार-लेखक धीरेंद्र कुमार झा की रिसर्च इस पूरे मामले को नए सिरे से देखने को मजबूर करती है.
गांधी की हत्या: धर्मनिरपेक्ष भारत पर सबसे बड़ा हमला
15 अगस्त 1947 को आजाद हुए भारत की वैचारिक नींव महात्मा गांधी ने रखी थी. 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ की विचारधारा पर हमला थी. दक्षिणपंथी विमर्श में लंबे समय से यह स्थापित करने की कोशिश होती रही है कि गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे का व्यक्तिगत निर्णय था, किसी संगठन का नहीं. धीरेंद्र झा के मुताबिक गांधी की हत्या के बाद कुछ इलाकों में मिठाई बांटे जाने और जश्न मनाने की घटनाओं ने आरएसएस की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए.
RSS का यू-टर्न: पहले इनकार, फिर स्वीकार
हत्या के तुरंत बाद आरएसएस ने गोडसे से संबंध न होने का दावा किया. बाद में कहा गया कि वह कभी सदस्य था, फिर हिंदू महासभा में चला गया.
इस मामले में गांधी की हत्या से पहले और उसके बाद आरएसएस का स्टैंड बदल गया. पहले संघ ने माना था कि गोडसे आरएसएस का सदस्य नहीं था. बाद में कहा कि सदस्य था, गांधी की हत्या से वर्षों पहले वह संघ को छोड़ कर हिंदू महासभा से जुड़ गया था. ऐसा संघ ने तब माना जब गोडसे ने ट्रायल कोर्ट में कहा कि संघ का सदस्य बना था लेकिन उसकी सदस्यता छोड़ दी थी.
कांस्पिरेसी एंगल खत्म करने की साजिश
लेखक धीरेंद्र झा का कहना है कि संभवत: गोडसे ऐसा कर कांस्पिरेसी के एंगल खत्म करना चाहता था. इसके लिए उसने खुद पर सभी इल्जाम ले लिए. एक-एक कर सभी हिंदू संगठनों को गांधी की हत्या में शामिल होने की बात से मुकर गया. गोडसे ने अदालत में ये स्वीकार किया कि उनके नजदीकी किसी भी नहीं पता था कि मैं गांधी की हत्या करने वाला हूं. न आरएसएस को न हिंदू महासभा को.
दरअसल, गांधी की हत्या के बाद दूसरे तरह के पिक्चर गढ़ने की प्रक्रिया गोडसे के फांसी के दो महीने के बाद शुरू हुआ. बीवी केलकर नाम के व्यकि्त ईकाोनोमिक विटनी के एक कॉलम द आरएसएस में लिखा कि संघ और महासभा में सबंध खराब थे.इसी को आरएसएस ने अपना फेस वैल्यू बनाया और दावे के साथ कहना शुरू कर दिया कि हमारा इस मामले से कोई लेना देना नहीं. जबकि केलकर ने उसी लेख में गोडसे और सावरकर का दोस्त बताया.
गोडसे और आरएएस को लेकर अलग-अलग पिक्चर सामने आती है. दरअसल, आरएसएस हर काम करने के लिए पहले से एक मिथ बनाकर चलत है. इस मामले में भी संघ की भूमिका मिथ बनाने की है. पहले जो कहना है, उसी को बाद में सच साबित करने की कोशिश करता है. यही वजह है कि संघ के लोग गोडसे, केलकर और कुरिएन के बयान व लेख को ढाल के रूप में इस्तेमाल करते नजर आते है.
धीरेंद्र कुमार झा की किताब क्या कहती है?
“Gandhi’s Assassin: The Making of Nathuram Godse and His Idea of India” में धीरेंद्र झा गांधी, गोडसे, सावरकर और आरएसएस के वैचारिक रिश्तों की परतें खोलते हैं. उनका कहना है कि नेशनल आर्काइव में बाकी आरोपियों के बयान अंग्रेजी में मौजूद हैं, लेकिन गोडसे का 92 पन्नों का असली बयान सिर्फ मराठी में, पेंसिल से लिखा 92 पेज मिला जो कोर्ट रिकॉर्ड से अलग है. इसका केवल पहला पेज अंग्रेजी में है.
गोडसे ने खुद पर सारे इल्जाम क्यों लिए?
धीरेंद्र झा के मुताबिक, गोडसे ने साजिश के एंगल को खत्म करने के लिए सभी संगठनों को हत्या से अलग कर दिया और पूरा दोष खुद पर ले लिया.
संघ, महासभा और सावरकर: ज्वाइंट वेंचर?
आरएसएस और हिंदू महासभा के संबंधों को लेकर जो ‘अलगाव’ की कहानी गढ़ी गई, उसे खुद बीवी केलकर और जेए कुरियन के लेख झुठलाते हैं.
गोलवलकर का बयान और ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा
गोलवलकर के भाषण और गोडसे-सावरकर की निकटता यह संकेत देती है कि गांधी विरोध केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक वैचारिक परियोजना थी. धीरेंद्र झा का मत है कि गांधी की हत्या को लेकर आरएसएस ने पहले एक मिथ गढ़ा, फिर उसी को सच साबित करने के लिए चुनिंदा बयानों और लेखों का सहारा लिया गया.