क्या पति करवा सकता है बच्चों का DNA टेस्ट? सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन क्या है

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट फैसलों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति निजी लैब में बच्चों का DNA टेस्ट करवा सकता है, लेकिन इसे अदालत में सबूत के तौर पर मान्यता तभी मिलेगी, जब कोर्ट इसकी इजाजत दे.

( Image Source:  Sora AI )

हाल ही में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक शख्स की खारिज कर दी. याची के अनुरोध पर अदालत ने कहा कि तलाक की प्रक्रिया जारी होन की स्थि​ति में अगर पत्नी की बेवफाई का सबूत इकट्ठा करने की कोशिश से ज्यादा अहम बच्चे का हित है. उसी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. ऐसे में DNA टेस्टिंग को लेकर यह जानना जरूरी हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस क्या हैं?

क्या सीधे DNA टेस्ट करवा सकते हैं?

हाई कोर्ट फैसलों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति निजी लैब में बच्चों का DNA टेस्ट करवा सकता है, लेकिन इसे अदालत में सबूत के तौर पर मान्यता तभी मिलेगी, जब कोर्ट इसकी इजाजत दे. बिना कोर्ट ऑर्डर के कराया गया टेस्ट कई मामलों में कानूनी रूप से चुनौती योग्य होता है.

कानून क्या कहता है?

भारत में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत शादी के बाद पैदा हुआ बच्चा कानूनी रूप से पति का ही माना जाता है. इसे “वैधता का प्रेजम्प्शन” कहा जाता है. इसे खारिज करना बहुत मुश्किल होता है.

क्या कोर्ट DNA टेस्ट का आदेश दे सकती है?

अदालत डीएनए टेस्ट का आदेश दे सकती है, लेकिन हर केस में नहीं. कोर्ट तभी DNA टेस्ट की अनुमति देती है, जब पति के पास पहली नजर में मजबूत सबूत (prima facie evidence) हों. मामला न्याय के हित में जरूरी हो. यह किसी की गरिमा और प्राइवेसी का उल्लंघन न करे.

भारत में गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि DNA टेस्ट को रूटीन में आदेश नहीं दिया जा सकता. सिर्फ शक के आधार पर टेस्ट की अनुमति नहीं दी जाएगी. आप निजी तौर पर DNA टेस्ट करवा सकते हैं, लेकिन बेवफाई साबित करने के लिए इसे अदालत में मान्य कराने के लिए कोर्ट की अनुमति जरूरी होती है तब भी, अदालत बहुत सख्त मानकों के आधार पर ही इसे स्वीकार करती है.

इसी तरह नंदलाल वासुदेव बनाम लता नंदलाल में शीर्ष अदालत ने कहा था कि जहां सच सामने लाना जरूरी हो, वहां DNA टेस्ट अहम हो सकता है. अशोक कुमार बनाम राज गुप्ता केस में कोर्ट संतुलन बनाए रखा.

डीएनए टेस्ट को लेकर प्राइवेसी का क्या?

इस मसले पर कोर्ट ने कहा है कि DNA टेस्ट व्यक्ति की निजता (Right to Privacy) का उल्लंघन कर सकता है. खासकर बच्चे और महिला की गरिमा का ध्यान रखना जरूरी है. इसलिए इसे “last resort” (आखिरी उपाय) माना जाता है.

शीर्ष अदालत का रुख क्या?

सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है. DNA टेस्ट शक मिटाने का टूल नहीं, बल्कि अंतिम उपाय है. अदालत तभी अनुमति देती है जब यह न्याय के लिए जरूरी हो. साथ ही, बच्चे की वैधता और व्यक्ति की निजता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है.

Similar News