कई बीमारियों की मां 'डायबिटीज' चौपट न कर दे भारत की इकोनॉमी! साइलेंट इमरजेंसी का खतरा कैसे?
डायबिटीज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि कई गंभीर रोगों की जननी (Mother) बन चुकी है. अगर समय रहते इस पर काबू नहीं पाया गया, तो यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 'साइलेंट इमरजेंसी' बन सकती है, जहां बिना शोर के GDP, प्रोडक्टिविटी और हेल्थ सिस्टम तीनों को नुकसान होगा. जानें, भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना होगा असर?;
भारत तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन डायबिटीज की रफ्तार के बीच एक खामोश खतरा तेजी से पनप रहा है. यह बीमारी न तो अचानक लॉकडाउन लाती है, न इमरजेंसी घोषित होती है, लेकिन धीरे-धीरे कामकाजी आबादी, परिवार की बचत और सरकारी खजाने को खोखला कर देती है. यही वजह है कि विशेषज्ञ डायबिटीज को अब 'कई बीमारियों की मां' और भारत के लिए एक संभावित साइलेंट इमरजेंसी मानने लगे हैं.
अर्थव्यवस्था पर 11.4 लाख करोड़ डॉलर का बोझ
अगर परिवार के सदस्यों द्वारा मरीज को दी जा रही मुफ्त देखभाल के आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जाए, तो यह नुकसान और बढ़ जाता है. इस हिसाब से अमेरिका को 16.5 लाख करोड़ डॉलर, भारत को 11.4 लाख करोड़ डॉलर और चीन को 11 लाख करोड़ डॉलर का आर्थिक बोझ झेलना होगा. शोधकर्ताओं ने डायबिटीज के इस भारी आर्थिक बोझ के पीछे वजह ये बताई है कि भारत और चीन में प्रभावित लोगों की सबसे बड़ी आबादी रहती है. जबकि अमेरिका में डायबिटीज का इलाज बहुत महंगा है.
भारतीय हेल्थ सिस्टम के सामने चुनौतियां
- भारत में 60 प्रतिशत मौतें डायबिटीज जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों से होती हैं.
- विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में करीब 62 फीसदी मरीजों को डायबिटीज का इलाज नहीं मिल पाता.
- केंद्र सरकार ने 2010 में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग व स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम एनपीसीडीसीएस शुरू किया था. बाद में इसका नाम बदलकर गैर-संक्रामक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम एनपीएनसीडी रख दिया गया.
- भारत के कई जिलों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त डायबिटीज स्क्रीनिंग और इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है.
भारत डायबिटीज कैपिटल
भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज मरीज हैं. करीब 13 से 15 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक चपेट में आने की अगली लाइन में खड़े हैं. मतलब आने वाले 10 से 15 साल में वर्किंग पॉपुलेशन का बड़ा हिस्सा डायबिटिक रोगी होगा. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि डायबिटीज का इलाज लाइफटाइम खर्च है.इंसुलिन, दवाइयां, टेस्ट, अस्पताल पर लोगों को ज्यादा खर्च करने होंगे.
भारत में 60% से ज्यादा हेल्थ खर्च जेब से लोगों को करना पड़ता है.काम करने वाली उम्र (25 से 55) के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. गरीब और मिडिल क्लास वाले बचत नहीं कर पाएंगे. कंजम्पशन घटेगा. डिमांड कम होगी. इसका सीधा असर देश की प्रोडक्टिविटी पर होगा. उत्पादन कम होगा तो लॉस तय है. FMCG, रियल एस्टेट, ऑटो जैसे सेक्टर पर तो खतरनाक असर होगा.
डायबिटीज इकोनॉमी के लिए 'साइलेंट इमरजेंसी'
WHO के मुताबिक, क्रॉनिक डिजीज से देशों को GDP का 1 से 3% नुकसान हो सकता है. भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह हजारों करोड़ का घाटा हर साल हो सकता है. यानी डायबिटीज सिर्फ बीमारी नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए साइलेंट इमरजेंसी है. अगर आज कंट्रोल नहीं हुई, तो कल GDP, ग्रोथ और गरीबी को बीमार कर देगी.
वायु प्रदूषण से हो सकता है डायबिटीज?
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आईसीएमआर और डब्ल्यूएचओ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 40 प्रतिशत से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 39 प्रतिशत उप‑केंद्रों पर उच्च रक्तचाप और डायबिटीज के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. HbA1c (हिमोग्लोबिन A1c) एक तरह का ब्लड टेस्ट है जो यह बताता है कि किसी व्यक्ति का पिछले दो-तीन महीनों में औसत ब्लड शुगर लेवल कितना रहा. यह टेस्ट अब भी केवल जिला और शहरी स्तर पर अस्पतालों में उपलब्ध है.
डीडब्लू न्यू वेबसाइट के मुताबिक इंसुलिन इंजेक्शन और कुछ अन्य दवाइयां केवल बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में मिलती हैं. एक अन्य अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों के क्लीनिकल रिकॉर्ड्स नहीं रखे जाते. मरीजों को खुद अपने टेस्ट, दवा और रिपोर्ट्स का रिकॉर्ड संभालना पड़ता है.
समय पर न इलाज मिलना चुनौती कैसे ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक डायबिटीज के इलाज में स्वास्थ्य प्रणाली और मरीज दोनों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. अखिल भारतीय मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष डॉ. दिव्यांश सिंह बताते हैं कि लोगों में डायबिटीज के बारे में जागरूकता अब भी कम है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मरीज अक्सर बीमारी को देर से पहचान पाते हैं. जब उन्हें कोई स्वास्थ्य समस्या होती है, तो वे इसे टालते रहते हैं.कई लोग आयुर्वेदिक इलाज कराते हैं. कुछ लोग व्हाट्सएप से मिली जानकारी पर भरोसा करने लगते हैं. मेरे पिता को भी डायबिटीज है. उन्होंने व्हाट्सएप पर पढ़ा कि लहसुन सूंघने से इसे ठीक किया जा सकता है. अगले ही दिन उनकी तबियत बिगड़ गई."
डायबिटीज का सबसे अधिक दबाव गरीबों पर पड़ता है. उनके लिए सामुदायिक हेल्थ सेंटर ही पहला संपर्क बिंदु होते हैं. इस पर डॉ. दिव्यांश बताते है कि इन केंद्रों पर अभी भी उपकरण और दवाइयों की कमी रहती है. इसकी वजह से लोग इलाज कराने निजी क्लिनिक चले जाते हैं. वहां बैठे डॉक्टर खुद को नए शोध और जानकारी से अपडेट नहीं रखते.
महिलाओं और कमजोर वर्ग पर बोझ
डायबिटीज से संक्रमित व्यक्ति की काम करने की क्षमता कम होती है, जिसका असर श्रम उत्पादकता पर पड़ता है. जीडीपी में उनका आर्थिक योगदान प्रभावित होने लगता है. साथ ही परिवार का ज्यादातर समय और पैसा इलाज पर खर्च हो जाता है. उनका कहना है, "समाज में एक वे लोग हैं जो शहरी और संपन्न वर्ग से आते हैं. उनकी स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज तक आसानी से पहुंच है. दूसरी ओर वे लोग हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से हैं. उनके पास इलाज कराने, दवाइयां और इंजेक्शन खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते." इसका असर उनकी इलाज करवाने की क्षमता पर होता है. कई बार आमदनी के अभाव में उनके इलाज में रुकावट भी आती है.
आर्थिक नुक्सान को कम कैसे किया जाए?
भारत में स्वास्थ्य पर ज्यादातर खर्च बीमारी के गंभीर होने के बाद इलाज पर हो रहा है. इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों, मेडिकल उपकरण, इंजेक्शन और तरह-तरह की जांचों पर बहुत पैसा खर्च किया जाता है. डायबिटीज के इर्द-गिर्द एक पूरी अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है. दवा कंपनियों को इससे लाभ होता है. लेकिन अगर यही पैसा बीमारी की रोकथाम पर खर्च किया जाए, तो स्थिति बेहतर हो सकती है.
साइलेंट इमरजेंसी क्या होता है?
साइलेंट इमरजेंसी (Silent Emergency) का मतलब होता है, ऐसी गंभीर समस्या जो धीरे-धीरे फैलती रहती है, लेकिन न तो अचानक धमाका करती है, न सायरन बजता है. न सरकार तुरंत आपातकाल घोषित करती है. फिर भी उसका नुकसान बहुत बड़ा होता है. जैसे घर में दीमक लग जाए और शुरुआत में दिखे नहीं. दीवार खड़ी रहती है, लेकिन अंदर से खोखली हो जाती है. एक दिन अचानक ढह जाती है. किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यही साइलेंट इमरजेंसी होती है.