कहानी बुल्‍ले शाह की, जिनकी सोच से डर गई थी सत्ता, मरने के बाद भी नहीं मिला सुकून, तोड़ दी गई मजार

सूफी संत बुल्ले शाह सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वह आवाज थे, जो मजहब, जाति और सत्ता की दीवारों को सीधे चुनौती देते थे. अब उनकी मजार तोड़े जाने की कहानी क्या है? जानिए क्यों मजहब, जाति और सत्ता से टकराते रहे बुल्ले शाह और क्यों आज भी प्रासंगिक हैं.;

( Image Source:  sufiyana.org )

पंजाब की मिट्टी में जन्मे सूफी संत बुल्ले शाह सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वह आवाज थे, जो मजहब, जाति और सत्ता की दीवारों को सीधे चुनौती देते थे. उनकी शायरी आज भी कव्वालियों, सूफी गीतों और आम लोगों की ज़ुबान पर है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस बुल्ले शाह ने इंसानियत का पैगाम दिया, उनकी मजार तक को तोड़ दिया गया. यह कहानी है विचारों से डरने वाली सत्ता और एक फकीर के बेखौफ सोच की.

क्या आज के दौर को एक और बुल्ले शाह चाहिए?

अब्दुल्ला शाह कादरी उर्फ बुल्ले शाह का जन्म 1680 के आसपास वर्तमान पाकिस्तान के कसूर (Kasur) में हुआ था. उनका पूरा नाम अब्दुल्ला शाह कादरी था. वे अरबी-फारसी के विद्वान थे, लेकिन उनकी पहचान बनी लोकभाषा पंजाबी में कही गई सूफी शायरी से. उन्होंने ईश्वर को मस्जिद, मंदिर या किताबों में नहीं, बल्कि इंसान के भीतर खोजा. उनका सबसे मशहूर कलाम, 'बुल्ला की जाना मैं कौन', आज भी धार्मिक पाखंड पर सबसे बड़ी चोट माना जाता है.

धर्म, जाति और मुल्ला-मौलवियों से टकराव

बुल्ले शाह ने खुलेआम कहा था कि सिर्फ नमाज, रोजा या तीर्थ से ईश्वर नहीं मिलता. जाति, मजहब और ऊंच-नीच इंसान की बनाई हुई दीवारें हैं. यही बातें कट्टर धार्मिक ठेकेदारों को नागवार गुजरीं. उन्हें 'काफिर', 'गुमराह' और 'इस्लाम विरोधी' तक कहा गया. कई बार उन्हें 'कसूर' से निकाल दिया गया. जब तक जिंदा रहे तानों और बहिष्कार का सामना करना पड़ा.

मृत्यु के बाद भी नहीं मिला 'सुकून'

साल 1717 के आसपास बुल्ले शाह का निधन हुआ, लेकिन असली विवाद उनकी मौत के बाद शुरू हुआ. कहा जाता है कि कट्टर मौलवियों ने उनकी नमाज-ए-जनाजस पढ़ाने से इनकार कर दिया, क्योंकि वे उन्हें 'धर्म से भटका हुआ' मानते थे.

यहां तक कि उनकी कब्र (मजार) को तोड़ दिया गया. मौलवियों ने सूफी फकीर की समाधि को अपवित्र बताया गया. उनके विचारों को मिटाने की कोशिश की गई. यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि सत्ता और कट्टरता को विचारों से सबसे ज्यादा डर लगता है.

बुल्‍ले शाह, मौत के बाद भी जिंदा

बुल्ले शाह की मजार भले तोड़ी गई हो, लेकिन उनकी सोच नहीं टूटी, वो आज भी जिंदा है. आज उसी कसूर में उनकी मजार फिर से बनी है, जहां हर मजहब, हर जाति के लोग आते हैं. बिना यह पूछे कि सामने वाला हिंदू है, मुसलमान है या सिख.

विडंबना यह है कि जिसे कभी 'काफिर' कहा गया, आज उसी को सूफी संत माना जाता है, जिसकी मजार तोड़ी गई, आज वहीं सबसे ज्यादा सजदा होता है. आज के दौर को देखकर लगता है कि लोगों को सही राह दिखाने के लिए एक और 'बुल्ले शाह' जरूरी हैं?

बाबा बुल्ले शाह के पिता हजरत शाह मुहम्मद दरवेश शुरुआती दिनों में उच गीलानियां में रहते थे. आजीविका की खोज में वह वहां से परिवार सहित कसूर के दक्षिण पूर्व में चौदह मील दूर बसे पांडोके भट्टियां में बस गए. बाबा बुल्ले शाह ने शुरुआती शिक्षा पिता से ही प्राप्त की.

‘मैं अल्ला हां’ वाला किस्सा और सूफी दर्शन

ब्लॉग सुफियाने के अनुसार उनके बारे में कहा जाता है कि एक बार जब बुल्ले शाह बटाला पहुंचे तो अचानक कहने लगे – मैं अल्ला हां ! मैं अल्ला हां ! वहां लोग उन्हें विस्मय से देखने लगे. बटाला उस समय फाजिलिया सिलसिले के सूफियों का केंद्र हुआ करता था. इसके संस्थापक फाजिलुद्दीन थे . उनकी बात सुनकर लोग बुल्ले शाह के पास पहुंचे. उन्होंने बुल्ले शाह को देखते ही फरमाया - ठीक ही तो कह रहा है . पंजाबी में अल्ला कच्चे को कहते हैं. यह अभी कच्चा है. तू शाह इनायत के पास जा वही तुम्हारी मंजिल हैं.

बुल्ले शाह और शाह इनायत के चर्चित किस्से

बुल्ले शाह ने वहां से लाहौर की राह ली. हजरत शाह इनायतुल्लाह कादरी जाति के अराई थे और लाहौर के शालीमार बाग के मुख्य माली थे. शाह इनायत से बाबा बुल्ले शाह की मुलाकात के दो किस्से चर्चित हैं. पहला किस्सा यह है कि जब बुल्ले शाह हजरत के पास पहुंचे तो हजरत शाह इनायत प्याज की क्यारियां ठीक कर रहे थे. बुल्ले शाह ने उन्हें देखते ही पूछा, 'शाह जी रब किवें पावां' ( शाह जी ईश्वर को किस प्रकार पाया जाए).

इसके जवाब में शाह साहब ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “बुल्लिहआ रब दा की पौणा. एधरों पुटणा ते ओधर लाउणा.” (बुल्ला रब को पाने में क्या है – बस इस क्यारी से उखाड़ कर उस क्यारी में लगा देना है.) अर्थात मन को सांसारिक चीजों से हटा कर ईश्वर में लगा दो और रब मिल जाएगा!

दूसरा किस्सा यह है कि जब बुल्ले शाह हजरत शाह इनायत से मिलने पहुंचे तो शालीमार बाग आम के पेड़ों से भरा पड़ा था. सब पेड़ों पर आम लदे थे. बुल्ले शाह को भूख भी लगी थी और वह बाग के मालिक से बिना पूछे आम भी नहीं तोड़ना चाहते थे. उन्होंने आम के पेड़ की ओर देखा और कहा – अल्लाह गनी अर्थात अल्लाह धनवान है. यह कहना था कि एक आम टूटकर उनकी हथेली पर आ गिरा. उन्होंने दोबारा कहा और इस तरह कुछ आम इक्कठे कर के एक पेड़ के नीचे बैठ कर खाने लगे. अभी उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि कुछ पहरेदार आये और उन्होंने उन्हें पकड़ लिया. बुल्ले शाह ने उनके सामने ही एक बार अल्लाह गनी कहा और एक आम नीचे गिर पड़ा.

उसी समय वहां शाह इनायत आये. उन्होंने जब यह देखा तो फरमाया अभी मांगने में कमी है. यह कहकर उन्होंने हाथ ऊपर उठाया और कहा – अल्लाह गनी! और देखते ही देखते आम गिरने शुरू हो गए. सब पेड़ों से इतने आम गिरे कि पूरा बाग भर गया.

मसूरी में बुल्ले शाह की मजार पर तोड़फोड़ का मामला क्या है?

दरअसल, उत्तराखंड के मसूरी के बाला हिसार इलाके में एक स्कूल की निजी जमीन पर बनी बाबा बुल्ले शाह की मजार पर तीन दिन पहले कुछ असामाजिक तत्वों ने तोड़-फोड़ की घटना को अंजाम दिया था. इसको लेकर पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर जांच में जुटी है. तोड़फोड़ की घटना के बाद से इलाके में तनाव है.

लोकल पुलिस ने मुस्लिम सेवा संगठन के मसूरी अध्यक्ष अकरम खान की शिकायत पर तीन नामजद समेत करीब तीस लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है. अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. पुलिस अधिकारी का कहना है कि जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. बाबा बुल्ले शाह की मजार सालों से भाईचारे की मिसाल है. यहां सभी धर्म व समुदायों के लोग श्रद्धा के साथ आते रहे हैं.

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