एपस्टीन कांड - यूपी चुनाव से ध्यान हटाने को तो नहीं टांग दिए गए हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद? ऐसे बच जाएंगे कांड के आरोपी!

स्‍वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्‍वती पर दर्ज POCSO मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील एपी सिंह ने कई कानूनी झोल होने का दावा किया है. उन्होंने इसे संभावित “राजनीतिक मुकदमा” बताते हुए Jeffrey Epstein कांड से तुलना की आशंका जताई.

‘शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती यौन शौषण-पॉक्सो कांड को लेकर देश-दुनिया में जिस कदर का कोहराम मचा है या मचवाया जा रहा है. मुझे आशंका है कि कानूनी दांव-पेच के खेल में आइंदा कहीं यह भी औंधे मुंह अदालतों में न गिर जाए. हां, इतने में यह संभव है कि आरोपी पक्ष (पॉक्सो एक्ट में नामजद मुलजिम अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद व दो-तीन अन्य) पूरी तरह से बदनाम हो जाएगा. भले ही मुकदमे का हश्र अदालत में कितना भी बुरा क्यों न हो.

साथ ही इस केस में जो मुझे दिखाई दे रहा है उस नजर से तो कई कानूनी झोल भी मौजूद हैं. जिनका लाभ अगर मुकदमा ट्रायल तक पहुंचता है तो बचाव-आरोपी पक्ष को मिल सकता है. मसलन मुकदमे में काफी देरी. मौजूदा साक्ष्यों के क्रॉस-मैच में कमियां. एक वह शख्स जो खुद को पत्रकार बताकर सामने आया, जिसने मीडिया में आकर कहा कि उससे शिकायतकर्ता पक्ष ने कई महीने पहले भी संपर्क साधा था कि वह, अपनी बेटियों से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके करीबियों के ऊपर यौन शोषण का आरोप लगवा कर मुकदमा दर्ज करवा दे... आदि-आदि.’

यह तमाम बातें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ फौजदारी और अमूमन बेहद फंसे हुए चर्चित मामलों में ही बचाव पक्ष के पैरोकार वकील की हैसियत से ही मुकदमे लड़ने वाले डॉ एपी सिंह ने बयान कीं. वही डॉ. एपी सिंह जिन्होंने हाथरस में 2 जुलाई 2024 को हुए भगदड़ कांड में 121 लोगों (श्रृद्धालु-भक्तों) की अकाल मौत के मामले के आरोपी सत्संगी सूरजपाल उर्फ “भोले-बाबा” को कानूनी दांव-पेच के बलबूते उतने बड़े शर्मनाक कांड से बेदाग बचा लिया था.

कौन हैं डॉ. एपी सिंह?

देश दुनिया के सबसे बदनाम और रूह कंपा देने वाली आपराधिक घटना दिल्ली में घटित निर्भया अपहरण-बलात्कार और हत्याकांड के फांसी की सजा पाए मुजरिमों को फंदे पर चढ़ने वाली रात तक, उन्हें बचाने के लिए देश का राष्ट्रपति भवन, दिल्ली का उप-राज्यपाल कार्यालय (राजनिवास), देश के सर्वोच्च और दिल्ली उच्च न्यायालय को खुलवाए रखकर हिंदुस्तान के कानून के इतिहास में मिसाल कायम करने वाले डॉ. एपी सिंह नई दिल्ली में स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन से पॉक्सो एक्ट में फंसे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मामले पर एक्सक्लूसिव बात कर रहे थे.

Full View

बृजभूषण शरण सिंह का मुकदमा क्यों भूल गए?

डॉ. ए पी सिंह के मुताबिक, “जिस तरह से मुझे नजर आ रहा है और जिस तरह हदों से परे जाकर यह मुद्दा मीडिया-समाज में उछल रहा है. उससे इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह सब तमाशा पॉलिटिकल डर्टी गेम साबित हो होकर रह जाए. जैसा पूर्व भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह के साथ हुआ था. वह भी डर्टी पॉलिटिकल गेम ही साबित हुआ. उनके खिलाफ भी जब हरियाणा में राज्य विधानसभा के चुनाव सिर पर आ गए तभी, पॉक्सो जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाया गया. राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी सहित और न मालूम देश के कितने छुटभैय्या-तोप नेता तक दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी महिला पहलवानों का सपोर्ट करने आंख मूंदकर शोर मचाने पहुंच गए. आज देख लीजिए रिजल्ट जमाने के सामने है. मैंने बृज भूषण शरण सिंह के बचाव पक्ष के वकील की हैसियत से वह केस न केवल कोर्ट में फाइट किया, अपितु जीता भी. बृज भूषण शरण सिंह को कानूनन बा-इज्जत बरी भी कराया.”

पॉलिटकल मुकदमा क्यों है?

स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में डॉ एपी सिंह बोले, “अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मामले में मुझे कई कानूनी झोल ऐसे नजर आ रहे हैं कि, अगर बचाव पक्ष ने उन्हें अदालत के सामने सही साबित कर दिया, तो भले ही पॉक्सो एक्ट ही क्यों न हो. इसमें भी आरोपी पक्ष का कुछ नहीं बिगडेगा. दूसरे यह मुकदमेबाजी भी मुझे कानूनी से ज्यादा राजनीतिक विद्वेष की भावना से प्रेरित लगता है. जब किसी के चरित्र हनन के इरादे से इस तरह कानून का दुरुपयोग करके मुकदमेबाजी शुरू की या कराई जाती है, तो ऐसे मुकदमों के अदालत में पहुंचने पर उनमें कई झोल नजर आते हैं.”

कौन-कौन से कानूनी झोल हैं?

पॉक्सो एक्ट में फिलहाल बुरी तरह से कानूनन फंसे दिखाई दे रहे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मान लीजिए आप ही अदालत में बचाव पक्ष के पैरोकार वकील की हैसियत से खड़े होंते हैं तो, आपकी नजर में कौन से बिंदु हैं जो आरोपी पक्ष के खिलाफ मुकदमे को कमजोर करते नजर आ रहे है? पूछने पर सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. एपी सिंह बोले, “मुकदमे में एफआईआर देर से क्यों हुई? यह शिकायत पक्ष (अभियोजन पक्ष) की मंशा पर संदेह जाहिर करता है. दूसरे, एक उस शख्स की गवाही जिसने दावा किया है कि वह पेशे से पत्रकार है, उससे आज पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज करवाने वाले पक्षकारों ने कई महीने पहले संपर्क साधा था. कहा था कि वह पत्रकार अपनी बेटियों की तरफ से स्वामी के ऊपर यौन शोषण का मुकदमा दर्ज करवा दे. इससे साफ जाहिर है कि शिकायतकर्ता पक्ष स्वामी के खिलाफ बहुत पहले से मुकदमा दर्ज कराने का षडयंत्र रच रहे थे. बस उन्हें सही मौके और मजबूत शिकायतकर्ता का इंतजार था.”

अंतिम सवाल...

बकौल डॉ. एपी सिंह, “पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज करवा देना जितना आसान है, उतने ही सख्त इस कानून में आरोपी पक्ष को गवाह और सबूतों के आधार पर अदालत में मुलजिम से मुजरिम साबित कराना मुश्किल होता है. क्योंकि अगर मामला गलत नीयती से और किसी को जान-बूझकर पॉक्सो एक्ट में फंसाने के इरादे से दर्ज कराया जाता है, तो उसे साबित करना भी अभियोजन पक्ष की ही जिम्मेदारी होती है. साथ ही चूंकि मुकदमा पॉक्सो जैसे मजबूत या कहूं कि मुलजिम पक्ष के लिए खतरनाक एक्ट में दर्ज होता है, जिसमें आरोपी को रहम की गुंजाइश बहुत कम ही रह जाती है. ऐसे गंभीर मुकदमे के दौरान ट्रायल कोर्ट का जज भी बहुत पैनी नजर से हर बिंदु को देखता-परखता जांचता और क्रॉस-एग्जामिन करता है. ताकि इतने खतरनाक कानून में दर्ज किसी फर्जी मुकदमे में कोई गलत फैसला किसी बेकसूर-बेगुनाह कथित आरोपी को सजायाफ्ता मुजरिम करार देकर उसका जीवन नरक न बना डाले.”

“दाल में काला” क्यों नजर आ रहा?

बाबा राम रहीम, पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहजहांपुर वाले स्वामी चिन्मयानंद महाराज यौन शोषण कांड जैसे देश के चर्चित मुकदमों में पैरोकार वकील रह चुके डॉ. एपी सिंह के मुताबिक, “स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कांड में अभियोजन पक्ष को यह साबित करने में ही पसीना आ जाएगा कि मुकदमा इतनी देरी से क्यों? दूसरा सवाल, इस मामले में गवाह और सबूत कॉमन न होकर शिकायतकर्ता-पीड़ितों के आसपास के ही मिलेंगे, जो खुद ही संदेह के घेरे में आ जाएंगे. तीसरे, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हुकूमत के खिलाफ ही मुंह खोलना शुरू किया तभी उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज क्यों कराया गया? जबकि अब उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट में लगाए जा रहे आरोपों से जुड़ी काली-करतूतें तो काफी पहले से ही आरोपी पक्ष द्वारा अंजाम दी जा रही होंगीं.

भारत का जेफरी एपस्टीन कांड तो नहीं?

बकौल डॉ. एपी सिंह, “मुझे तो बहुत हद तक आशंका नजर आ रही है कि यह मुकदमा अमेरिका के चर्चित कहिए या फिर बदनाम जेफ़री एपस्टीन कांड की तरह भारत की सुर्खी बनकर फाइलों में कफन दफन न हो जाए. दूसरी बात, जोकि मैं पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकता हूं, हां एक वकील और भारतीय नागरिक होने के नाते जितना समझ पा रहा हूं कि, इस छीछालेदर की बुनियाद कहीं उत्तर प्रदेश में अगले साल 2027 में होने वाला विधानसभा चुनाव पर तो नहीं टिकी है. क्योंकि यह वही शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं जो अक्सर किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के टारगेट पर टंगे ही रहते हैं.”

Similar News