Trisha Krishnan की वो फिल्म जो भारतीय सिनेमा में रखती है 9 रीमेक का रिकॉर्ड, 21 साल बाद भी क्यों है सुपरहिट
2005 में आई एक साधारण सी लव स्टोरी 'नुव्वोस्तानंते नेनोड्डंतना' ने अपने इमोशन और म्यूजिक से इतिहास रच दिया. 21 साल बाद भी यह फिल्म अपनी सादगी और दिल छू लेने वाली कहानी की वजह से दर्शकों की पसंद बनी हुई है.
21 साल पहले, यानी साल 2005 में, तेलुगु सिनेमा में एक ऐसी फिल्म आई जिसने किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल देगी.फिल्म का नाम था 'नुव्वोस्तानंते नेनोड्डंतना' (Nuvvostanante Nenoddantana). इस फिल्म को निर्देशित करने के लिए प्रभु देवा को चुना गया था. लेकिन शुरू में प्रभु देवा ने मना कर दिया था. वे निर्देशन की जिम्मेदारी लेने से हिचकिचा रहे थे.
आखिरकार निर्माता एमएस राजू ने उन्हें बहुत समझा-बुझाकर राजी किया. यह प्रभु देवा की पहली फिल्म थी जिसे उन्होंने निर्देशित किया. फिल्म का बजट सिर्फ 10 करोड़ रुपये था. नायक सिद्धार्थ उस समय एकदम नए एक्टर थे. लोगों उन्हें ज्यादातर अपनी पहली फिल्म 'बॉयज़' से ही जानते थे. एक्ट्रेस तृषा कृष्णन के लिए यह तेलुगु सिनेमा में पहली फिल्म थी. फिल्म में ऐसा कुछ भी खास नहीं दिखता था जिससे लगे कि यह इतनी बड़ी हिट होगी या इतनी सारी भाषाओं में रीमेक बनेगी. लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो सब कुछ बदल गया.
फिल्म कैसे बनी?
निर्माता एमएस राजू ने प्रभु देवा को इसलिए चुना क्योंकि प्रभु देवा ने उनकी पिछली फिल्म 'वर्षा' में 'नुव्वोस्तानंते' नाम का गाना कोरियोग्राफ किया था. स्क्रिप्ट भी एमएस राजू ने खुद लिखी थी. उन्होंने कहानी को ऐसे बनाया कि वह कभी एक जगह रुकती ही नहीं थी. हर सीन में कुछ नया होता था. एक्टर का किरदार था संतोष एक अमीर एनआरआई लड़का, जो लंदन में बड़ा हुआ था. एक रिश्तेदार की शादी में वह गांव आता है और वहां की साधारण, सीधी-सादी लड़की सिरी (तृषा) से प्यार कर बैठता है. संतोष के चाचा (श्रीहरि) उसे चुनौती देते हैं, 'अगर तू सच में प्यार करता है तो गांव आ, खेतों में मेहनत कर, और साबित कर कि तू सिर्फ पैसे का सहारा नहीं है.'
फिल्म क्यों इतनी पसंद आई?
फिल्म की सफलता का राज सिर्फ कहानी नहीं था. इसमें कई छोटी-छोटी खूबियां थी. श्रीहरि ने चाचा का किरदार इतनी गर्माहट और प्यार से निभाया कि दर्शक उन्हें अपना ही कोई रिश्तेदार समझने लगे. सिद्धार्थ और तृषा ने अपने किरदारों को बहुत सहज और नेचुरल तरीके से जीया. फिल्म ने जबरदस्ती भावुकता नहीं दिखाई. उसने अपनी सादगी और कोमलता पर भरोसा किया. सबसे बड़ा जादू था देवी श्री प्रसाद का म्यूजिक. फिल्म रिलीज होने से पहले ही गाने लोगों के दिल में बस गए थे. टाइटल सॉन्ग 'नुव्वोस्तानंते नेनोड्डंतना' तो तेलुगु रोमांस का प्रतीक बन गया. 'पारीपोके पिट्टा', 'प्रेमांतम' जैसे गाने आज भी दो दशक बाद तरोताजा लगते हैं. म्यूजिक फिल्म की कहानी का हिस्सा नहीं था, बल्कि खुद कहानी बन गया था.
रिलीज और सफलता
फिल्म 14 जनवरी 2005 को 90 प्रिंटों के साथ रिलीज हुई। दर्शकों की भीड़ इतनी ज्यादा थी कि बाद में और प्रिंट जोड़ने पड़े। फिल्म 79 सिनेमाघरों में 50 दिनों तक और 35 सिनेमाघरों में 100 दिनों तक चली। बिना किसी बड़े स्टार के यह 2005 की सबसे बड़ी तेलुगु हिट फिल्मों में से एक बन गई.
नौ भाषाओं में रीमेक - एक अनोखा रिकॉर्ड
जो सबसे हैरान करने वाली बात हुई वह यह कि यह फिल्म सिर्फ तेलुगु तक नहीं रुकी. इसकी कहानी ने एक के बाद एक भाषाओं की सीमाएं पार कीं. आज तक भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा रीमेक होने वाली फिल्मों में यह फिल्म टॉप पर है. इसके नौ अलग-अलग वर्जन बने:
तमिल – उनाक्कुम एनाक्कुम (जयम रवि और तृषा)
कन्नड़ – नीनेलो नानले
बंगाली – आई लव यू
मणिपुरी – निंगोल थजाबा
उड़िया – सुना चढ़ेई मो रूपा चढ़ेई
पंजाबी – तेरा मेरा की रिश्ता
बांग्लादेशी बंगाली – निस्साश अमर तुमी
नेपाली – द फ्लैश बैक: फरकेरा हेरदा
हिंदी – रमैया वस्तावैया (प्रभु देवा निर्देशित)
इनमें से आठ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफल रहीं. सिर्फ हिंदी वर्जन 'रमैया वस्तावैया' को कमर्शियल तौर पर ज्यादा सफलता नहीं मिली, लेकिन दर्शक आज भी उसे बहुत पसंद करते हैं.
आज भी क्यों लोग इसे प्यार करते हैं?
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और ईमानदारी थी. इसमें कोई बड़ा खलनायक नहीं था. कोई नकली ड्रामा या जबरदस्ती का ट्विस्ट नहीं था. चाचा कोई दुश्मन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार इंसान थे जिनकी चिंताएं बिल्कुल सच्ची थीं. संतोष का बदलना बहुत धीरे-धीरे और स्वाभाविक तरीके से दिखाया गया. सिरी कोई कमजोर किरदार नहीं थी वह चुपचाप अपनी जगह पर डटी रही और फिल्म ने उसकी ताकत का सम्मान किया. 'नुव्वोस्तानंते नेनोड्डंतना' ठीक वैसी ही फिल्म है. 21 साल बाद भी उसकी कहानी, किरदार और उसका संगीत आज भी ताजा और दिल को छूने वाली है.