भारत की पहली 'फेयर एंड लवली' गर्ल Neesha Singh, जिसने स्टारडम के पीक पर इंडस्ट्री छोड़कर क्यों चुनी गुमनामी?
नीशा सिंह का करियर संयोग से शुरू हुआ लेकिन फैसले हमेशा उनके अपने रहे. स्टारडम के शिखर पर पहुंचकर भी उन्होंने परिवार और निजी जिंदगी को प्राथमिकता दी.
नीशा सिंह (Neesha Singh) का जीवन और करियर एक बहुत ही रोचक कहानी है. कई एक्ट्रेस का सफर बड़े सपनों, कड़ी मेहनत और ऑडिशन से शुरू होता है. लेकिन नीशा सिंह का सफर बिल्कुल अलग था. यह एक साधारण कॉलेज कैंटीन से शुरू हुआ. जहां से उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. 1980 और 1990 के दशक में नीशा सिंह बहुत मशहूर चेहरा थीं. वे प्रीमियम साबुन के विज्ञापनों से लेकर गंभीर शहरी ड्रामा तक हर तरह के काम में नजर आती थीं. वे साउथ मुंबई में रहती थीं, एक पॉश इलाके मालाबार हिल में पली-बढ़ीं.
एक समय वे स्टार थीं, लेकिन फिर उन्होंने सब कुछ छोड़कर सिंगापुर और दिल्ली में शांत, सादा जीवन चुन लिया. आज भी लोग उन्हें फिल्मों 'बाजार' और 'अंकुश' के लिए याद करते हैं. टीवी पर 'बुनियाद' जैसे बहुत लोकप्रिय शो में उन्होंने कमाल किया. साथ ही 'अ माउथफुल ऑफ स्काई' में भी काम किया जो भारत की पहली अंग्रेजी भाषा की टीवी सीरीज थी. लेकिन एक्टिंग उनके लिए कभी प्लान किया हुआ सपना नहीं था. यह सब बस संयोग से शुरू हुआ. नीशा सिंह एक सिख परिवार में पैदा हुईं. उनके परिवार में अभिनय जैसा कुछ सोचा भी नहीं जाता था। वे पढ़ाई-लिखाई और अच्छे परिवार की जिंदगी जी रही थीं.
फेयर एंड लवली गर्ल कैसे बनीं?
एक दिन निशा सिंह कॉलेज कैंटीन में बैठी थीं तभी किसी ने उनसे बात की. हिंदुस्तान लीवर के लिए फेयर एंड लवली के नए विज्ञापन का वीडियो टेस्ट लेना था. दिग्गज निर्देशक एलिक पद्मसी इसे बना रहे थे. नीशा ने पहले मना कर दिया. उन्होंने कहा, 'मेरा परिवार मुझे मॉडलिंग की इजाजत नहीं देगा. मैं बस अपने दोस्तों के साथ देखने आऊंगी.' शूटिंग खत्म होने के बाद पद्मसी ने उन्हें देखा और पूछा, 'तुमने टेस्ट क्यों नहीं दिया?. नीशा ने फिर परिवार का बहाना बनाया. तब पद्मसी ने कहा, 'मुझे बिना मेकअप वाली लड़की चाहिए जो कैमरे के सामने नेचुरल लगे. क्या तुम बस खड़ी हो सकती हो?. कुछ दिनों बाद उन्हें फोन आया कि उनका सिलेक्शन हो गया है. उनके पिता बहुत सख्त थे. आखिरकार पद्मसी खुद उनके पिता से मिले और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी बेटी सुरक्षित रहेगी. यह विज्ञापन बहुत हिट हुआ नीशा भारत की पहली 'फेयर एंड लवली गर्ल' बनीं. लेकिन पिता ने सख्त नियम बनाया पढ़ाई पूरी होने तक महीने में सिर्फ एक विज्ञापन. इस नियम ने उन्हें और ज्यादा खास बना दिया. वे चुन-चुनकर काम करती थीं, अच्छे ब्रांड चुनती थीं जैसे बॉम्बे डाइंग, लैक्मे, नेस्केफे आदि. वे कहती हैं, 'मुझे ज्यादा प्रमोशन की जरूरत नहीं पड़ी. अच्छे ब्रांड खुद मेरे पास आते थे और मैं अच्छे पैसे मांग सकती थी.'
फिल्मों में एंट्री कैसे हुई?
फिल्मों का मौका भी संयोग से मिला. पृथ्वी थिएटर जाती हुईं एमएस सत्यु से मिलीं. उन्होंने अपनी फिल्म 'गरम हवा' दिखाई जो नीशा को बहुत पसंद आई. फिर सत्यु ने उन्हें अपनी फिल्म 'कहां कहां से गुजर गया' में काम करने का ऑफर दिया. जिसमें अनिल कपूर भी थे. पिता को मनाना पड़ा, लेकिन आखिरकार इजाजत मिल गई. फिल्म ज्यादा हिट नहीं हुई लेकिन विदेशों में अच्छी सराहना मिली. फिर आई सागर सरहदी की फिल्म 'बाजार' (1982). नीशा उस समय सिर्फ 18 साल की थीं. उन्हें लगा कि फिल्म में वे लीड प्रेम कहानी का हिस्सा होंगी. लेकिन बाद में पता चला कि उनका रोल सपोर्टर थी. फिल्म में फारूक शेख, सुप्रिया पाठक और नीशा थे. नीशा कहती हैं कि फारूक शेख की सादगी और संवेदनशीलता ने उन्हें फिल्म करने के लिए राजी किया. फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर एक्टर को एक ही तरह के रोल मिलते हैं. इसलिए 'बाजार' के बाद उन्होंने कोई फिल्म नहीं की जब तक 'अंकुश' नहीं मिली, जहां उन्हें अहम भूमिका मिली. वे जानती थीं कि वे उस समय के मेनस्ट्रीम बॉलीवुड के 'हीरोइन' वाले सांचे में फिट नहीं बैठतीं. इसलिए उन्होंने ज्यादा फिल्में नहीं कीं. नाना जुड़ा एक किस्सा भी है जब दिग्गज एक्टर ने नीशा को देखते ही डायरेक्टर से कहा, 'पागल हो क्या किसे कास्ट कर लिया तुम क्या इस्तेमाल करना चाहते हो.' नाना शूटिंग शुरू होने से पहले नीशा को ना पसंद करते थे. लेकिन फिल्म का पहला शॉट देखते ही वह नीशा से प्रभवित हुए.
टीवी में सफलता
नीशा ने फ़िल्में छोड़कर टीवी का रुख किया. 90 के दशक में 'बुनियाद' जैसे शो से वे घर-घर पहुंचीं. फिर 'अ माउथफुल ऑफ स्काई' में मिलिंद सोमन, राहुल बोस जैसे नए कलाकारों के साथ काम किया. वे कहती हैं कि टीवी में वे बहुत बिगड़ी हुई थीं. उनके लिए खास रोल लिखे जाते थे। वे महीने में सिर्फ 20 दिन शूटिंग करती थीं.
अचानक सब छोड़ दिया
1997 में, करियर के पीक पर नीशा अचानक गायब हो गईं. शादी हो गई और वे सिंगापुर चली गईं. उनके कुछ सीरियल चल रहे थे, लेकिन उन्होंने कहानी से हटने या सिंगापुर में शूटिंग करवाने से मना कर दिया. वे कहती थी, 'एक्टिंग मेरे लिए जुनून नहीं, बस शौक था.' वे पूरी तरह मां बनना चाहती थीं. 1998 में उनकी बेटी हुई और उनकी आखिरी फिल्म भी उसी साल आई. यह छोटा ब्रेक सोचा था, लेकिन परिवार की वजह से यह हमेशा के लिए विराम बन गया. भाई को स्ट्रोक हुआ, तो उन्होंने परिवार को चुना. वे कहती हैं, 'मुझे काम की बहुत याद आती है, लेकिन बेटी की परवरिश करना मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था. उसके साथ मेरा रिश्ता हर पल के लायक है.
आज की नीशा सिंह
आज वे बहुत निजी जिंदगी जीती हैं. वे कहती हैं, 'मैं बेहद प्राइवेट इंसान हूं. मुझे यह रहस्य पसंद है कि लोग मेरे बारे में सब कुछ न जानें.' फिर भी वे कभी-कभी कला की दुनिया में लौटती हैं. हाल में उन्होंने मंजरी चतुर्वेदी के नाटक 'द कोर्टेसन - एन एनगमा' में मंच पर वाचन किया. वे नीना गुप्ता जैसी एक्ट्रेस की फैन हैं, लेकिन अब सिर्फ चुनिंदा काम करती हैं. जोखिम वाले सीन नहीं करतीं और काम मांगना भी उन्हें नहीं आता. नीशा सिंह की कहानी बताती है कि सफलता के बावजूद इंसान अपनी खुशी और परिवार को चुन सकता है. उनकी जिंदगी संयोगों से भरी है, लेकिन फैसले हमेशा उनके अपने थे.