'लव एंड गॉड' K. Asif की वो आखिरी फिल्म जो साबित हुई शापित, एक-एक कर फिल्म से जुड़े एक्टर्स की हुई मौत
‘लव एंड गॉड’ बॉलीवुड की उन फिल्मों में गिनी जाती है, जिनके साथ लगातार हादसे और मौतें जुड़ी रहीं. गुरु दत्त से लेकर के. आसिफ और संजीव कुमार तक, कई बड़े नाम फिल्म पूरी होने से पहले ही दुनिया छोड़ गए.
हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर और प्रतिष्ठित फिल्म 'मुगल-ए-आजम' को बनाने में महान निर्देशक के. आसिफ (K.Asif) को कुल 16 साल का लंबा समय लगा था. इस फिल्म की सफलता के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी अगली फिल्म 'लव एंड गॉड' (Love And God) को 'मुगल-ए-आजम' से भी कहीं ज्यादा बड़ा, ग्रैंड और शानदार बनाने का सपना देखा. लेकिन अफसोस, यह सपना अधूरा रह गया और फिल्म एक बड़ी विफलता साबित हुई. इतना ही नहीं, इस फिल्म को लोग 'शापित' और 'मनहूस' फिल्म कहने लगे, क्योंकि फिल्म से जुड़े कई बड़े-बड़े लोग निर्देशक, लीड एक्टर्स और अन्य कलाकार बनने के दौरान ही दुनिया छोड़ गए. 'लव एंड गॉड' को 'कैश-लैला' भी कहा जाता है. इस फिल्म के लीड रोल में संजीव कुमार और निम्मी को चुना.
दिलीप कुमार के साथ पुराना विवाद
के. आसिफ चाहते थे कि उनकी नई फिल्म में 'मजनू' का किरदार कोई ऐसा एक्टर निभाए जो इसे यादगार बना दे. बहुत से लोग सोचते हैं कि उन्होंने दिलीप कुमार को क्यों नहीं चुना, क्योंकि दोनों ने पहले कई फिल्मों में साथ काम किया था. लेकिन असल वजह यह थी कि आसिफ और दिलीप के बीच रिश्ते बहुत खराब हो चुके थे. कहानी कुछ यूं है 'मुगल-ए-आजम' की शूटिंग के समय आसिफ अक्सर दिलीप के घर जाते थे. वहां उनकी मुलाकात दिलीप की छोटी बहन अख्तर से हुई. बाद में आसिफ ने अख्तर से शादी कर ली, जबकि वे पहले से शादीशुदा थे. दिलीप को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं आया. उन्होंने इसका जमकर विरोध किया. इसी वजह से दोनों दिग्गजों के बीच दूरियां बढ़ गईं और दोस्ती टूट गई इसलिए आसिफ ने दिलीप को फिल्म में नहीं लिया.
गुरु दत्त का फिल्म में आना और उनकी दुखद मौत
शुरुआत में के. आसिफ ने 'मजनू' का रोल देने के लिए गुरु दत्त को चुना. गुरु दत्त को लगा कि उनका चेहरा और स्टाइल इस किरदार के लिए ठीक रहेगा या नहीं, इस पर उन्हें थोड़ी शंका थी. लेकिन आसिफ ने उन्हें बहुत मनाया और आखिरकार वे मान गए. फिल्म की शूटिंग 1962-63 के आसपास शुरू हुई. लेकिन उसी समय गुरु दत्त की जिंदगी में बहुत मुश्किलें आ गई थीं. उनकी पिछली फिल्म 'कागज के फूल' सुपर फ्लॉप हो गई थी. आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनका घर भी गिरवी रखना पड़ा. पत्नी गीता दत्त के साथ उनके रिश्ते में भी बहुत दरार आ गई थी. खबरों के मुताबिक उन्होंने दो बार आत्महत्या की कोशिश भी की. एक रात घर में बड़े झगड़े के बाद गीता घर छोड़कर चली गईं. गुरु दत्त अकेले कमरे में बंद हो गए. उन्होंने शराब के साथ नींद की गोलियां खा ली सुबह उनकी मौत हो गई. आधिकारिक रूप से इसे आत्महत्या कहा गया, लेकिन कई लोग आज भी मानते हैं कि यह गलती से ज्यादा दवा खा लेने की वजह से हुआ ओवरडोज था. गुरु दत्त की मौत से आसिफ की फिल्म पूरी तरह रुक गई.
संजीव कुमार का आना और आसिफ की उनकी परीक्षा
कई साल बाद के. आसिफ की मुलाकात संजीव कुमार से हुई. उन्हें लगा कि संजीव 'मजनू' का किरदार बहुत अच्छे से निभा सकते हैं. लेकिन पहले उन्होंने संजीव का धैर्य और सहनशक्ति जांचना चाहा. इसके लिए उन्होंने संजीव को एक दूसरी छोटी फिल्म 'सस्ता खून महंगा पानी' में काम करने को कहा, जो राजस्थान के रेगिस्तान में शूट होनी थी क्योंकि 'लव एंड गॉड' की भी शूटिंग राजस्थान में ही होनी थी. शूटिंग के दौरान आसिफ ने संजीव को जानबूझकर 100 तरह की परेशानियां दी. तेज धूप में घंटों खड़ा रखा, भारी मेकअप और कपड़े पहनाए, लेकिन उनके सीन शूट नहीं किए. उनका सारा ध्यान राजेंद्र कुमार और सायरा बानू जैसे अन्य कलाकारों पर था. जब संजीव ने शिकायत की तो आसिफ ने साफ कह दिया, 'मैं यहां फिल्में बनाने आया हूं, समस्याएं सुलझाने नहीं.' संजीव ने कुछ दिन चुपचाप सब सहा, लेकिन आखिरकार मुंबई लौट आए. उनकी इस शांति और सब्र से प्रभावित होकर आसिफ ने कहा, 'अब मुझे अपना मजनू मिल गया है.' संजीव कुमार को फिल्म में ले लिया गया.
आसिफ की मौत संजीव की गोद में
फिल्म की शूटिंग चल रही थी 1971 में संजीव कुछ समय के लिए किसी दूसरी फिल्म की शूटिंग पर बाहर गए. जब वे वापस लौटे तो आसिफ उनसे मिलने सीधे उनके कमरे में पहुंच गए. दोनों बातें कर रहे थे कि अचानक आसिफ को सांस लेने में बहुत तकलीफ हुई. संजीव ने उन्हें सहारा दिया, लेकिन हालत बिगड़ती गई. आखिरकार संजीव कुमार की बाहों में ही के. आसिफ का निधन हो गया. कहा जाता है कि उनके आखिरी शब्द थे, 'अगर अल्लाह को मेरी जान लेनी ही है, तो शेर की तरह ले... दर्द न दे.'
संजीव कुमार की कोशिश और उनकी मौत
आसिफ की मौत के बाद फिल्म फिर खतरे में पड़ गई. लेकिन संजीव कुमार ने हिम्मत नहीं हारी. वे चाहते थे कि यह फिल्म उनके करियर के लिए वही चमत्कार करे जो 'मुगल-ए-आजम' ने दिलीप के लिए किया था. उन्होंने फिल्म पूरा करने के लिए कई प्रोड्यूसरों से बात की, यहां तक कि दिलीप कुमार से भी मदद मांगी, लेकिन किसी ने हामी नहीं भरी. बाद में केसी बोकाडिया नाम के प्रोड्यूसर ने फिल्म में पैसा लगाने को हामी भरी. शूटिंग दोबारा शुरू हुई, लेकिन कुछ ही दिनों बाद 1985 में संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ा और सिर्फ 47 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. इससे पहले गुरु दत्त और के. आसिफ की मौत हो चुकी थी. फिल्म से जुड़े कई अन्य कलाकार भी बनने से पहले ही चल बसे. अब लोग इसे खुलकर 'शापित फिल्म' और 'मनहूस प्रोजेक्ट' कहने लगे.
आखिरी हादसा अधूरी फिल्म का रिलीज होना
प्रोड्यूसर केसी बोकाडिया ने फिल्म में बहुत पैसा लगा दिया था, इसलिए उन्होंने इसे किसी भी हाल में रिलीज करने का फैसला किया. लेकिन अब फिल्म बहुत अधूरी थी. संजीव कुमार के ज्यादातर सीन बॉडी डबल से पूरे किए गए. एडिटिंग ठीक से नहीं हुई. कुछ सीनों में गुरु दत्त और संजीव कुमार दोनों दिखाई देते हैं. रंग भी खराब हो गया था, आखिरकार यह फिल्म 27 मई 1986 को रिलीज हुई. लेकिन दर्शकों को यह बिल्कुल पसंद नहीं आई. बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई. इस तरह 'लव एंड गॉड' बनने में करीब 23-24 साल लग गए, लेकिन यह एक दुखद कहानी बनकर रह गई. एक महान निर्देशक का सपना, कई बड़े कलाकारों की जिंदगी और आखिर में एक बुरी तरह फ्लॉप फिल्म - यही है इसकी पूरी कहानी.