बजट 2026 की असली तस्वीर: विकास के आंकड़े चमकदार, लेकिन निवेश और नौकरियों पर सवाल बरकरार

बजट 2026-27 में सरकार ने स्थिर ग्रोथ और कम महंगाई को बड़ी उपलब्धि बताया है, लेकिन निवेश और रोजगार के मोर्चे पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. जानिए बजट की असली तस्वीर और इसके पीछे की चुनौतियां.;

( Image Source:  ANI )
Edited By :  प्रवीण सिंह
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केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे समय में पेश किया गया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं. इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट केअनुसार, एक तरफ सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का आकलन है कि भारत इस समय एक तरह के “गोल्डीलॉक्स पीरियड” से गुजर रहा है - यानी न बहुत ज्यादा महंगाई, न बहुत धीमी ग्रोथ. वहीं दूसरी ओर कई अर्थशास्त्री इसे कमजोर होती अर्थव्यवस्था का संकेत मान रहे हैं.

RBI गवर्नर के अनुसार भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति दुर्लभ संतुलन की अवस्था में है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.4% रहने का अनुमान है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बनाता है. वहीं महंगाई दर करीब 2% के आसपास रहने की संभावना है, जो RBI के तय लक्ष्य 4% से भी कम है. इसका मतलब यह है कि वैश्विक सप्लाई चेन संकट के बावजूद भारत ने अपने नागरिकों को महंगाई से काफी हद तक बचाए रखा है.

आर्थिक सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी दर, क्रेडिट ग्रोथ और अन्य कई मैक्रो संकेतक भी सुधरते दिख रहे हैं. इस नजरिए से देखें तो बजट का काम सिर्फ इतना था कि अब तक जिस रास्ते पर देश चल रहा है, उसी को बनाए रखा जाए और “विकसित भारत” की दिशा में आगे बढ़ा जाए.

लेकिन दूसरी तस्वीर क्या कहती है?

अर्थशास्त्रियों का दूसरा वर्ग कहता है कि असली तस्वीर इतनी चमकदार नहीं है. उनका तर्क नॉमिनल GDP ग्रोथ पर आधारित है. नॉमिनल GDP यानी वह ग्रोथ जिसमें महंगाई को जोड़कर वास्तविक बाजार मूल्य के हिसाब से गणना होती है. यह दर फिलहाल सिर्फ 8% है, जबकि भारत के लिए पारंपरिक रूप से 12% नॉमिनल ग्रोथ को स्वस्थ माना जाता रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में भी नॉमिनल ग्रोथ सिंगल डिजिट में रही थी. यानी लगातार दो साल से अर्थव्यवस्था कमजोर नॉमिनल ग्रोथ दिखा रही है. इसका सीधा असर सरकार की आमदनी और खर्च की क्षमता पर पड़ता है.

क्योंकि टैक्स कलेक्शन, सरकारी खर्च और उधारी (Fiscal Deficit) सब कुछ नॉमिनल GDP से जुड़ा होता है. अगर नॉमिनल ग्रोथ कमजोर होगी, तो सरकार के पास योजनाओं पर खर्च करने के लिए कम पैसा बचेगा. साथ ही कम महंगाई दर (2%) भी पूरी तरह अच्छी खबर नहीं मानी जा रही, क्योंकि विकासशील देशों में बहुत कम महंगाई अक्सर कमजोर मांग और रोजगार संकट का संकेत होती है.

इसी नजरिए से रुपये की कमजोरी, कॉरपोरेट कंपनियों की धीमी बिक्री और विदेशी व घरेलू निवेशकों द्वारा भारत से पूंजी निकालने को भी चिंता का संकेत माना जा रहा है.

मोदी सरकार की अब तक की रणनीति

2014 के बाद से मोदी सरकार की आर्थिक नीति का मूल मंत्र रहा है - “Minimum Government, Maximum Governance”. इसका मतलब था सरकार खुद कम खर्च करे, कम उधार ले और निजी क्षेत्र को निवेश के लिए ज्यादा जगह दे. इसी सोच के तहत कई बड़े सुधार किए गए. जैसे - GST लागू किया गया, दिवालिया कानून (IBC) लाया गया, 2019 में कॉरपोरेट टैक्स में ऐतिहासिक कटौती की गई और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम लाई गई. सरकार ने अपने खर्च का स्वरूप भी बदला. पहले जहां ज्यादा पैसा वेतन और सब्सिडी पर खर्च होता था, अब ज्यादा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाया जा रहा है. 2020-21 में जहां रेवेन्यू एक्सपेंडिचर कुल खर्च का 81% था, वह अब घटकर 72% रह गया है. वहीं कैपिटल एक्सपेंडिचर 13% से बढ़कर 23% तक पहुंच गया है. इसका मकसद था कि सड़कों, पुलों और रेलवे जैसे प्रोजेक्ट्स से लंबे समय की आर्थिक ग्रोथ बने.

निजी निवेश क्यों नहीं बढ़ा?

सरकार की उम्मीद थी कि निजी कंपनियां आगे आकर फैक्ट्रियां लगाएंगी और रोजगार पैदा करेंगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वजह यह रही कि आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर रही. महंगाई ऊंची रही, वेतन वृद्धि धीमी रही, बेरोजगारी ज्यादा रही और पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी और ज्यादा रही. 2024 के चुनाव के बाद सरकार ने टैक्स में राहत देकर खपत बढ़ाने की कोशिश की जिसके त‍हत इनकम टैक्स छूट सीमा पहले 7 लाख और फिर 12 लाख रुपये की गई और GST दरों में कटौती की गई. इसके बावजूद निजी निवेश अभी भी महामारी से पहले के स्तर तक नहीं पहुंच पाया.

ट्रंप टैरिफ और वैश्विक झटका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का असर भारत पर भी पड़ा. छोटे और मध्यम उद्योगों को इसका ज्यादा नुकसान हुआ. सप्लाई चेन में रुकावट आई और निर्यात पर दबाव बढ़ा. इसके साथ ही भारत से पूंजी का बाहर जाना भी चिंता का विषय बना.

बजट को दो नजरियों से कैसे देखें?

1. वित्तीय अनुशासन के नजरिए से

सरकार ने वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit) 4.4% के लक्ष्य पर बनाए रखा. यह उन निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत है जो चाहते हैं कि सरकार ज्यादा उधार न ले.

2. प्राथमिकताओं के नजरिए से

लेकिन यह लक्ष्य हासिल करने के लिए कई क्षेत्रों में खर्च कम करना पड़ा:

  • कैपिटल एक्सपेंडिचर सिर्फ 4% बढ़ा
  • हेल्थ, एजुकेशन और सोशल वेलफेयर में कटौती
  • शहरी विकास पर खर्च अनुमान से 40% कम
  • सरकार की कुल आमदनी 6.7% ही बढ़ी, जबकि अर्थव्यवस्था 7.4% बढ़ी. यानी टैक्स सिस्टम की क्षमता सवालों में है.

आगे की रणनीति क्या होगी?

सरकार का अनुमान है कि अगले साल नॉमिनल GDP ग्रोथ 10% रहेगी. इसमें से बड़ा हिस्सा महंगाई से आएगा, न कि असली उत्पादन से. अब सरकार ने फिर से सप्लाई साइड रणनीति पर फोकस किया है - MSME सेक्टर को राहत, मैन्युफैक्चरिंग को सहारा, टियर-2 और टियर-3 शहरों पर ध्यान. ये वही क्षेत्र हैं जो नोटबंदी, GST, कोविड और ट्रंप टैरिफ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे.

बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बजट संतुलन बना पाया है? या फिर यह भारत के लिए एक नई और स्पष्ट आर्थिक रणनीति पेश करने का मौका गंवा बैठा? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बजट ने फिलहाल कोई बड़ा प्रयोग नहीं किया है, बल्कि मौजूदा नीति को थोड़ा एडजस्ट कर आगे बढ़ाने की कोशिश की है. यह रणनीति जोखिम कम करती है, लेकिन इससे तेज और व्यापक विकास की गारंटी भी नहीं मिलती.

बजट 2026-27 ऐसे दौर में आया है जब भारत के सामने दो चुनौतियां हैं. पहली आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और दूसरी नई ग्रोथ स्ट्रैटेजी खोजना. सरकार ने अनुशासन और सावधानी को चुना है. लेकिन सवाल यही है कि क्या यह सावधानी भारत को 2047 तक “विकसित राष्ट्र” बनाने के लिए काफी होगी?

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