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जिस तक्षशिला के निशान को मिटाना चाहता है पाक, भरत के पुत्र ने किया था राज; चंद्रगुप्त से लेकर महर्षि चरक तक ने की है पढ़ाई- Explainer

UNESCO की चेतावनी के बाद तक्षशिला चर्चा में है. जानिए 2500 साल पुराने विश्व धरोहर स्थल का इतिहास, चाणक्य, चंद्रगुप्त, पाणिनि और इसकी ऐतिहासिक विरासत.

जिस तक्षशिला के निशान को मिटाना चाहता है पाक, भरत के पुत्र ने किया था राज; चंद्रगुप्त से लेकर महर्षि चरक तक ने की है पढ़ाई- Explainer
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी11 Mins Read

Updated on: 3 July 2026 7:25 PM IST

करीब 2500 साल पुराने तक्षशिला की ऐतिहासिक विरासत पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित इस विश्व प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल को लेकर UNESCO ने पाकिस्तान सरकार को कड़ी चेतावनी जारी की है. आरोप है कि संरक्षण के नाम पर तक्षशिला के प्राचीन स्मारकों में ऐसे निर्माण कार्य किए गए, जिनसे उनकी ऐतिहासिक मौलिकता और विरासत को नुकसान पहुंचा है.

UNESCO ने साफ कहा है कि यदि इन बदलावों को वापस नहीं लिया गया, तो तक्षशिला को 'विश्व धरोहर खतरे की सूची (World Heritage in Danger List)' में डाला जा सकता है. यह कदम पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. क्योंकि तक्षशिला उसकी सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है. इसी के साथ आइए इस कहानी में तक्षशिला परिसर का पूरा इतिहास जानते हैं...

आज का तक्षशिला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावलपिंडी और इस्लामाबाद के पास स्थित एक विश्व प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल है. लेकिन लगभग ढाई हजार साल पहले यही स्थान प्राचीन भारत के गांधार महाजनपद की राजधानी और विश्व के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों में से एक था.

तक्षशिला को अक्सर दुनिया के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में गिना जाता है, जहां भारत ही नहीं बल्कि मध्य एशिया, फारस और अन्य क्षेत्रों से भी विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे. वर्ष 1980 में यूनेस्को ने इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया.

कैसे हुई तक्षशिला की स्थापना?

तक्षशिला की स्थापना को लेकर दो प्रमुख परंपराएं मिलती हैं. रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई भरत ने गांधार क्षेत्र पर विजय प्राप्त करने के बाद अपने पुत्र तक्ष के नाम पर इस नगर की स्थापना की. इसी कारण इसका नाम तक्षशिला पड़ा. वहीं कुछ इतिहासकार इसे गांधार सभ्यता के क्रमिक विकास का परिणाम मानते हैं, जो व्यापार, संस्कृति और शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. जबकि भरत के दूसरे पुत्र पुष्कल के नाम पर पुष्कलावती नगर बसाया गया.

तीन प्रमुख व्यापारिक मार्गों का संगम था तक्षशिला

तक्षशिला केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि यह प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक नगरों में भी शामिल था. यह तीन प्रमुख मार्गों के संगम पर स्थित था.

  1. उत्तरापथ (वर्तमान ग्रैंड ट्रंक रोड), जो गांधार को मगध से जोड़ता था.
  2. उत्तर-पश्चिमी मार्ग, जो कापिश और पुष्कलावती की ओर जाता था.
  3. सिंधु नदी मार्ग, जो उत्तर में रेशम मार्ग और दक्षिण में हिंद महासागर तक पहुंचता था.

इन्हीं मार्गों की वजह से यहां व्यापार, संस्कृति और ज्ञान का लगातार आदान-प्रदान होता रहा.

तक्षशिला विश्वविद्यालय में किन-किन विषयों की शिक्षा दी जाती थी?

तक्षशिला केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि राजनीति, शास्त्र, दर्शन, चिकित्सा, सैन्य विज्ञान, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद और अनेक विषयों का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था. यहां भारत ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के राज्यों और देशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे. कहा जाता है कि एक समय यहां के एक ही शास्त्र विद्यालय में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. विशेष रूप से तक्षशिला शल्य चिकित्सा और आयुर्वेद की उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था. यहां चिकित्सा विज्ञान की ऐसी परंपरा विकसित हुई, जिसने आगे चलकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित किया. इसके साथ-साथ भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान, वेद, उपनिषद, व्याकरण, न्यायशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद तथा अन्य अनेक विषयों की शिक्षा भी यहां दी जाती थी.

तक्षशिला से निकले चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने बदल दिया भारत का इतिहास

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि महान सम्राट अशोक भी अपने जीवन के एक चरण में तक्षशिला से जुड़े रहे. मौर्य काल में तक्षशिला का महत्व और अधिक बढ़ गया था. इसी विश्वविद्यालय में भारत के महान आचार्य चाणक्य ने शिक्षा प्राप्त की, अध्यापन किया और आगे चलकर अपने शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया. चाणक्य ने इसी भूमि पर राष्ट्रनीति, कूटनीति और प्रशासन के सिद्धांतों को विकसित किया, जिनका प्रभाव आज भी राजनीति और प्रशासन के अध्ययन में दिखाई देता है. चंद्रगुप्त मौर्य ने भी तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण की. बाद में गुरु चाणक्य के मार्गदर्शन में उन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी.

तक्षशिला से जुड़े महान विद्वान

  • तक्षशिला का नाम भारतीय इतिहास के कई महान व्यक्तित्वों से जुड़ा हुआ है.
  • आचार्य चाणक्य, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य की नींव रखी.
  • चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने यहां शिक्षा प्राप्त की.
  • पाणिनि, जिन्होंने संस्कृत व्याकरण का महान ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' लिखा.
  • जीवक, जो भगवान बुद्ध के प्रसिद्ध राजवैद्य बने.
  • अंगुलिमाल, प्रसेनजित और कई अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्व भी तक्षशिला से जुड़े रहे.
  • इसी कारण तक्षशिला को प्राचीन भारत का बौद्धिक केंद्र माना जाता है.

किन-किन शासकों के अधीन रहा तक्षशिला?

अपने लंबे इतिहास में तक्षशिला ने कई साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा. सबसे पहले यह गांधार राज्य की राजधानी रहा. बाद में फारसी साम्राज्य ने इस पर अधिकार किया. चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में सिकंदर महान यहां पहुंचा और स्थानीय शासक आंभी ने उससे संधि कर ली. इसके कुछ समय बाद चंद्रगुप्त मौर्य ने इस क्षेत्र को मौर्य साम्राज्य में शामिल कर लिया. मौर्यों के बाद यहां इंडो-ग्रीक, शक, पार्थियन और कुषाण शासकों का शासन रहा. कुषाण काल में बौद्ध धर्म और गांधार कला का उल्लेखनीय विकास हुआ.

तक्षशिला का पतन कैसे हुआ?

पांचवीं शताब्दी ईस्वी में हूणों के आक्रमणों ने तक्षशिला को भारी नुकसान पहुंचाया. लगातार युद्ध, व्यापारिक मार्गों में बदलाव और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह महान शिक्षा केंद्र धीरे-धीरे उजड़ गया. चीनी यात्री फाह्यान (5वीं शताब्दी) और बाद में ह्वेनसांग (7वीं शताब्दी) जब यहां पहुंचे, तब तक अधिकांश बौद्ध विहार और शिक्षण केंद्र खंडहर में बदल चुके थे.

आधुनिक तक्षशिला परिसर में क्या-क्या देखने को मिलता है?

आज तक्षशिला परिसर कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का समूह है. इनमें प्रमुख हैं-

  • भीर टीला (Bhir Mound)
  • सिरकप (Sirkap)
  • सिरसुख (Sirsukh)
  • धर्मराजिका स्तूप
  • जौलियन (Jaulian) बौद्ध मठ
  • मोहरा मोराडू (Mohra Moradu)
  • तक्षशिला संग्रहालय

तक्षशिला संग्रहालय में गांधार कला की दुर्लभ बुद्ध प्रतिमाएं, प्राचीन सिक्के, आभूषण, मिट्टी के बर्तन और अनेक ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं.

यूनेस्को विश्व धरोहर क्यों है तक्षशिला?

20वीं शताब्दी में सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में यहां बड़े पैमाने पर खुदाई की गई, जिससे प्राचीन नगर और विश्वविद्यालय के अनेक अवशेष सामने आए. इन्हीं खोजों के आधार पर यूनेस्को ने 1980 में तक्षशिला को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया. आज भी यह स्थल भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था, गांधार सभ्यता और बौद्ध विरासत का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है.


चरक, सुश्रुत और विष्णु शर्मा जैसे महान विद्वानों की कर्मभूमि था तक्षशिला

तक्षशिला की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं थी. आयुर्वेद के महान आचार्य चरक ने भी इसी ज्ञान परंपरा से शिक्षा प्राप्त की. उनके चिकित्सा संबंधी कार्यों ने मानव समाज के कल्याण में अमूल्य योगदान दिया. इसी प्रकार महान वैद्य सुश्रुत द्वारा रचित "सुश्रुत संहिता" भारतीय चिकित्सा विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है, जिसने शल्य चिकित्सा को नई दिशा प्रदान की.

महान विद्वान विष्णु शर्मा का नाम भी तक्षशिला की विद्वत परंपरा से जोड़ा जाता है. उन्होंने "पंचतंत्र" जैसे कालजयी ग्रंथ की रचना की, जो केवल बच्चों की कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि राजनीति, व्यवहार, कूटनीति और जीवन प्रबंधन का अद्भुत ग्रंथ माना जाता है. पंचतंत्र का प्रभाव बाद में विश्व की अनेक भाषाओं और संस्कृतियों तक पहुंचा.

तक्षशिला क्यों कहलाता था प्राचीन भारत की बौद्धिक राजधानी?

तक्षशिला के गौरव का वर्णन शब्दों में पूरा करना लगभग असंभव है. यहां शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्वानों की सूची इतनी विशाल है कि उनका पूरा विवरण देना भी कठिन है. यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय सभ्यता की बौद्धिक राजधानी था.

प्राचीन भारत में तक्षशिला, गंधार देश की राजधानी और शिक्षा का सबसे प्रमुख केंद्र था. इसे विश्व के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में गिना जाता है. यह स्थान हिंदू और बौद्ध-दोनों परंपराओं के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण रहा है. यहां वैदिक ज्ञान और बौद्ध दर्शन साथ-साथ विकसित हुए और दोनों परंपराओं के विद्वानों ने मिलकर ज्ञान की ऐसी धारा प्रवाहित की, जिसने पूरे एशिया को प्रभावित किया.

तक्षशिला: शिक्षा ही नहीं, व्यापार, धर्म और राजनीति का भी महाकेंद्र

तक्षशिला का महत्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था. यह प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक नगर भी था. मगध साम्राज्य के समय यह तीन प्रमुख व्यापारिक मार्गों का संगम माना जाता था. पूर्व, पश्चिम और उत्तर से आने वाले व्यापारी यहीं मिलते थे, जिससे यह नगर आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध बन गया.

तक्षशिला का उल्लेख केवल ऐतिहासिक ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक साहित्य में भी मिलता है. इसकी प्राचीनता का सबसे पहला उल्लेख महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में मिलता है. ऋग्वेद में भी इस क्षेत्र के संदर्भ प्राप्त होते हैं. इसके अतिरिक्त त्रिपिटक, बौद्ध ग्रंथों तथा अन्य प्राचीन साहित्य में भी तक्षशिला का अनेक बार वर्णन किया गया है.

महाभारत युद्ध के बाद राजा परीक्षित के वंशजों ने भी कई पीढ़ियों तक तक्षशिला पर शासन किया. कहा जाता है कि राजा जनमेजय ने अपना प्रसिद्ध नाग यज्ञ भी इसी क्षेत्र में संपन्न कराया था. इससे स्पष्ट होता है कि तक्षशिला केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था.

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