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'ये जज देश के लिए कंलक', टैरिफ के 'सुप्रीम' फैसले पर भड़के ट्रंप; अब लगाएंगे 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ- पढ़ें Top Updates

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्लोबल टैरिफ रद्द करने के तीन घंटे बाद ट्रंप ने सेक्शन 122 के तहत 150 दिनों के लिए अधिकतम 10% अस्थायी टैरिफ लगाने का एलान किया. कोर्ट ने 6-3 से कहा था कि टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति नहीं, कांग्रेस के पास है. कोर्ट के इस फैसले पर ट्रंप खूब बरसे तो वहीं पीएम मोदी अच्छा दोस्त बताया है.

ये जज देश के लिए कंलक, टैरिफ के सुप्रीम फैसले पर भड़के ट्रंप; अब लगाएंगे 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ- पढ़ें Top Updates
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( Image Source:  @WhiteHouse-X )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी9 Mins Read

Updated on: 21 Feb 2026 1:07 AM IST

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के महज तीन घंटे बाद ही राष्ट्रपति ट्रंप ने नया दांव चल दिया. कोर्ट द्वारा ग्लोबल टैरिफ रद्द किए जाने के तुरंत बाद ट्रम्प ने सेक्शन 122 का हवाला देते हुए सभी देशों पर नए टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया. सेक्शन 122 के तहत अमेरिका अधिकतम 10% तक अस्थायी ग्लोबल टैरिफ लगा सकता है, जिसकी अवधि 150 दिनों तक सीमित होती है. इस प्रावधान का इस्तेमाल आम तौर पर बड़े व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.

इससे पहले शुक्रवार को Supreme Court of the United States ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए व्यापक ग्लोबल टैरिफ को अवैध ठहरा दिया था. अदालत ने स्पष्ट किया कि अन्य देशों पर लगाए गए शुल्क संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं थे. भारत पर लगाया गया 18% रेसिप्रोकल टैरिफ भी इसी फैसले के बाद निरस्त माना गया. सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से कहा कि अमेरिकी संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने की शक्ति राष्ट्रपति के पास नहीं, बल्कि कांग्रेस के पास है. अदालत के इस फैसले के बावजूद ट्रम्प का नया कदम अमेरिका की व्यापार नीति को लेकर कानूनी और राजनीतिक टकराव को और तेज कर सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने पीसी कर क्या कुछ कहा आइए जानते हैं.

  • 'सुप्रीम कोर्ट ने हमारी बात नहीं सुनी'.
  • 'टैरिफ का आज का फैसला निराशा जनक है.'
  • 'मैं अमेरिका को फिर से महान बनाना चाहता हूं.'
  • 'सुप्रीम कोर्ट का फैसला अमेरिका के हित के लिए नहीं.'
  • 'कोर्ट से ऐसे फैसले की उम्मीद नहीं थी'.
  • ट्रंप ने कहा कि हमारे पास टैरिफ के अलावा भी विकल्प हैं, आगे कहा कि फैसला गलत है लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ेगा.
  • विदेशी ताकतों के आगे झुका कोर्ट, अब सभी देशों पर 10 प्रतिशत अतरिक्त लगेगी टैरिफ,
  • टंप ने कहा कि हो सकता है कि हम और ज्यादा पैसे वसूलेंगे
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जो खुश हैं वो ज्यादा दिन तक खुश नहीं रहेगा.
  • ट्रंप ने कहा कि, 'उन्हें कोर्ट के कुछ जजों पर शर्म आ रही है. वे देश के लिए कलंक हैं, उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है.'
  • राष्टपति ट्रंप ने कहा कि, PM मोदी मेरे अच्छे दोस्त, लेकिन भारत के साथ ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं.

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘ग्लोबल टैरिफ पॉलिसी’ को अवैध ठहराते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने माना कि राष्ट्रपति ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियों (IEEPA) का इस्तेमाल कर व्यापक आयात शुल्क लगाते समय अपनी कानूनी सीमाओं का अतिक्रमण किया. यह निर्णय ट्रंप के आर्थिक एजेंडे-खासकर ‘रिसिप्रोकल टैरिफ’- को करारा झटका माना जा रहा है.

भारत के लिए यह फैसला किसी एक टैरिफ शेड्यूल से ज्यादा अमेरिकी व्यापार नीति में स्थिरता और संस्थागत नियंत्रण की वापसी का संकेत है. निर्यातक, निवेशक और व्यापार वार्ताकार लंबे समय से अमेरिकी नीति में अचानक बदलाव के जोखिम पर नजर रखे हुए थे. ऐसे में यह निर्णय नई दिल्ली के लिए रणनीतिक रूप से अहम साबित हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत के लिए क्या मतलब है?

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर व्यापक आयात शुल्क नहीं लगा सकते. इससे अचानक और व्यापक ‘रिसिप्रोकल’ टैरिफ लागू करने की गुंजाइश सीमित हो गई है. भारतीय उद्योगों- जैसे इंजीनियरिंग सामान, ऑटो कंपोनेंट्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी को इससे राहत मिल सकती है. ये सेक्टर उन अचानक घोषित टैरिफ झटकों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते थे, जिनसे वैश्विक सप्लाई चेन में अनिश्चितता बढ़ जाती थी.

क्या अमेरिकी टैरिफ दरों में तुरंत कमी आएगी?

कम से कम फिलहाल तो संकेत यही हैं. IEEPA के तहत लगाए गए कुछ शुल्कों को अवैध मानने के बाद औसत प्रभावी टैरिफ दर घटकर लगभग 9.1 प्रतिशत तक आ सकती है, जो पहले 16.9 प्रतिशत के आसपास आंकी जा रही थी. हालांकि यह दर 1946 के बाद के उच्चतम स्तरों में से एक बनी रहेगी. विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप प्रशासन वैकल्पिक कानूनी प्रावधानों के जरिए दोबारा शुल्क लगाता भी है, तो उनकी दरें पहले जितनी आक्रामक नहीं होंगी.

क्या व्यापार वार्ताएं अब ज्यादा संस्थागत होंगी?

फैसले के बाद अमेरिकी टैरिफ नीति को कांग्रेस से जुड़े वैधानिक ढांचे के भीतर लौटना होगा. इसका मतलब है-औपचारिक जांच, तय प्रक्रिया, स्पष्ट ट्रिगर और राजनीतिक निगरानी. भारत के लिए इसका अर्थ है ज्यादा संरचित संवाद, स्पष्ट समयसीमा और शुल्क लागू होने से पहले बातचीत की गुंजाइश. अब नई दिल्ली एकतरफा घोषणाओं पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उत्पाद-विशिष्ट छूट या अनुपालन समायोजन के लिए बातचीत कर सकती है.

क्या सप्लाई चेन में भारत को नया मौका मिल सकता है?

यदि ट्रंप-युग की टैरिफ संरचना को सीमित अधिकारों के तहत फिर से बनाना पड़ा, तो कुछ सेक्टरों में भारत को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल सकती है. खासकर उन क्षेत्रों में, जहां अन्य देशों पर ज्यादा अमेरिकी शुल्क लगे थे. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. प्रशासन धारा 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा), धारा 301 (अनुचित व्यापार प्रथाएं), धारा 122 या 338 जैसे अन्य कानूनी प्रावधानों का सहारा ले सकता है. ऐसे किसी भी कदम के लिए नई जांच और कानूनी आधार आवश्यक होगा.

निवेशकों के लिए यह फैसला कितना महत्वपूर्ण है?

यह निर्णय बाजारों को एक स्पष्ट संदेश देता है- आर्थिक राष्ट्रवाद के दौर में भी कानूनी सीमाएं मायने रखती हैं. कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि अमेरिकी व्यापार नीति को केवल कार्यकारी आदेशों के सहारे अनिश्चितकाल तक नहीं बदला जा सकता. भारत के लिए यह वैश्विक निवेशकों के सामने एक सकारात्मक संकेत है. इससे मध्यम अवधि में अमेरिकी बाजार तक अधिक स्थिर पहुंच का भरोसा मजबूत हो सकता है और वाशिंगटन की घरेलू राजनीति से उपजी नीति अस्थिरता की आशंका कम हो सकती है.

क्या अमेरिकी सरकार की आय पर असर पड़ेगा?

अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ से 2025 के अंत तक 130 से 140 अरब डॉलर तक की आय हुई थी. यदि अदालतें रिफंड का आदेश देती हैं, तो कंपनियों को कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरना होगा. फिलहाल 1,000 से अधिक कॉरपोरेट इकाइयां मुकदमेबाजी में शामिल बताई जा रही हैं.

अगर सरकार को शुल्क लौटाने पड़े, तो इससे संघीय वित्तीय दबाव बढ़ सकता है.

क्या ट्रंप के पास अब भी विकल्प हैं?

राष्ट्रपति के पास अभी भी कई कानूनी रास्ते मौजूद हैं.

  1. ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122: अस्थायी रूप से 15% तक आयात शुल्क.
  2. टैरिफ एक्ट 1930 की धारा 338: भेदभावपूर्ण व्यापार आचरण पर 50% तक शुल्क.
  3. ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट 1962 की धारा 232: राष्ट्रीय सुरक्षा आधार पर सेक्टर-विशिष्ट शुल्क.
  4. ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301: औपचारिक जांच के बाद कार्रवाई.

विश्लेषकों का मानना है कि व्हाइट हाउस वैकल्पिक कानूनी संरचनाओं के जरिए टैरिफ फिर से लागू करने की कोशिश कर सकता है.

ट्रंप ने जजों के रुख पर भी सवाल उठाए और संकेत दिया कि उनकी आर्थिक नीति पर कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है.

क्या नई दिल्ली चुप्पी साधे रखेगी?

संकेत मिल रहे हैं कि भारत ‘वेट एंड वॉच’ रणनीति अपनाएगा. सार्वजनिक बयान से बचते हुए नई दिल्ली कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम पर करीबी नजर रखेगी. हालांकि परदे के पीछे यह फैसला भारत की मोलभाव क्षमता को सूक्ष्म रूप से मजबूत करता दिख रहा है. सार रूप में, सुप्रीम कोर्ट ने मुक्त व्यापार का समर्थन नहीं किया, लेकिन यह तय कर दिया कि टैक्स लगाने का अधिकार किसके पास है. भारत के लिए यही अंतर भविष्य की व्यापार वार्ताओं को अधिक व्यवस्थित और पूर्वानुमेय बना सकता है- बशर्ते वॉशिंगटन की अगली चाल पर नजर बनी रहे.

डोनाल्ड ट्रंपअमेरिका
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