जिसे बताते थे सबसे बड़ा खतरा, उसी ‘ड्रैगन’ के दरबार में क्यों पहुंचे ट्रंप? अंदर ही अंदर सुलग रहा है बड़ा डर!
डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे ने दुनिया भर में नई चर्चाएं छेड़ दी हैं. क्या ईरान युद्ध ने अमेरिका को चीन से मदद मांगने पर मजबूर कर दिया? जानें ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात के पीछे की बड़ी रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन पहुंचे हैं. बीजींग में उनका बेहतरीन स्वागत किया गया. लेकिन ये बात कम लोगों को हज्म हो रही है कि आखिर वह ट्रंप जो अक्सर चीन पर हमला बोलते आए थे, अचानक शी जिनपिंग से मुलाकात करने पहुंच गए. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इसके पीछे उनकी नाक में दम कर रहा ईरान हो सकता है.
माना जा रहा है कि ट्रंप इस बैठक में ईरान के साथ जारी महंगे युद्ध को खत्म कराने के लिए चीन से मदद मांग सकते हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें वैसा समर्थन मिलने की संभावना कम है, जैसा वह चाहते हैं.
चीन का क्या हो सकता है रुख?
विश्लेषकों के मुताबिक शी जिनपिंग ईरान को बातचीत की मेज पर वापस आने के लिए प्रेरित करने पर सहमत हो सकते हैं, लेकिन चीन अपने सबसे अहम मध्य-पूर्वी साझेदार ईरान को आर्थिक समर्थन देना बंद करने या उसकी सेना के लिए जरूरी डुअल-यूज सामानों की सप्लाई रोकने के पक्ष में नहीं दिख रहा है.
वहीं ट्रंप के पास चीन पर दबाव बनाने के लिए कई मजबूत विकल्प मौजूद हैं, जिनमें बड़े चीनी बैंकों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी शामिल है. लेकिन ऐसा करना अमेरिका के लिए भी काफी महंगा साबित हो सकता है.
ईरान और अमेरिकी समझौते पर सस्पेंस?
ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष खत्म करने को लेकर किसी समझौते की उम्मीदें अब कमजोर पड़ती दिख रही हैं। इस तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेजी आई है और दोनों देशों के बीच संघर्षविराम भी अस्थिर नजर आ रहा है.
ट्रंप ने क्यों किया चीन का रुख?
सूत्रों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन का मानना है कि चीन उन कुछ देशों में शामिल है जो तेहरान के नेताओं को वॉशिंगटन के साथ समझौता करने के लिए मना सकता है. चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए अमेरिका चाहता है कि बीजिंग ईरान पर दबाव बनाए. हालांकि अमेरिका के पास चीन को मजबूर करने के सीमित विकल्प हैं. ऐसे में वॉशिंगटन चीन को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि युद्ध खत्म होना उसके अपने हित में भी है.
चीन के सामने क्या है चुनौती?
चीन की स्थिति इस मामले में काफी जटिल मानी जा रही है. एक तरफ वह होर्मुज को खुला रखना चाहता है, क्योंकि दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है और चीन के लिए जाने वाला बड़ा हिस्सा भी इसी मार्ग से आता है. दूसरी तरफ ईरान चीन का रणनीतिक सहयोगी है और मध्य पूर्व में अमेरिका के प्रभाव के खिलाफ एक संतुलन के रूप में देखा जाता है.
चीन के लिए कैसे फायदेमंद है यह जंग?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह युद्ध आर्थिक रूप से चीन के लिए नुकसानदेह जरूर है, लेकिन इससे अमेरिका का सैन्य और कूटनीतिक ध्यान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से हट गया है, जो चीन के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद माना जा रहा है.
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल रिलेशंस की वरिष्ठ फेलो Henrietta Levin ने कहा कि शी जिनपिंग इस बैठक में “काफी आत्मविश्वास” की स्थिति में पहुंचे हैं.
उन्होंने कहा कि ट्रंप द्वारा पिछले साल टैरिफ अभियान में नरमी दिखाने और ईरान संघर्ष के कारण अमेरिकी सैन्य संसाधनों के दूसरी दिशा में लगने से चीन खुद को मजबूत स्थिति में महसूस कर रहा है.
ट्रंप ने चीन पर क्या कहा था?
मंगलवार को ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें ईरान को मनाने के लिए चीन की जरूरत नहीं है. उन्होंने अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का जिक्र करते हुए कहा कि ईरानी शासन जानता है कि मौजूदा स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है. व्हाइट हाउस की प्रवक्ता Olivia Wales ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप के पास सभी मजबूत विकल्प मौजूद हैं और वार्ताकार समझौते की दिशा में काम कर रहे हैं.”
वहीं चीन के दूतावास के प्रवक्ता Liu Pengyu ने कहा कि बीजिंग एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और चीन अपनी कंपनियों से कानूनों और नियमों के अनुसार काम करने को कहता है. उन्होंने कहा कि फिलहाल सबसे जरूरी प्राथमिकता संघर्ष को दोबारा भड़कने से रोकना है, न कि दूसरे देशों पर आरोप लगाना.
चीन पर दबाव बनाने के लिए ट्रंप के पास क्या विकल्प?
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के पास चीन पर दबाव बनाने के सीमित विकल्प हैं. इनमें प्रतिबंध, टैरिफ और कुछ अन्य कदम शामिल हैं. अमेरिका पहले ही ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर चुका है. ट्रंप ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की संभावना भी जताई थी, जिससे चीन नाराज हो सकता था.
चीनी बैंकों पर प्रतिबंध का खतरा?
अमेरिका ने पहले भी ईरान से जुड़े प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले कुछ चीनी संस्थानों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन कदमों का व्यापार पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. ऑब्सिडियन रिस्क एडवाइजर्स के प्रमुख Brett Erickson ने कहा कि अमेरिका अब तक उन बड़े चीनी बैंकों पर कार्रवाई से बचता रहा है जो ईरान के साथ व्यापार में मदद करते हैं.
क्या चीन से टकराव अमेरिका को पड़ेगा भारी?
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका चीनी बैंकिंग सेक्टर पर सीधी कार्रवाई करने से इसलिए भी बच रहा है क्योंकि इससे चीन की ओर से जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के जियोइकोनॉमिक्स सेंटर के निदेशक Edward Fishman ने कहा कि किसी छोटे या मध्यम चीनी बैंक पर भी कार्रवाई दोनों देशों के बीच आर्थिक टकराव को फिर बढ़ा सकती है. इससे अमेरिका और चीन के बीच पिछला व्यापार युद्ध और भारी टैरिफ दोबारा लौट सकते हैं, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और अमेरिका में महंगाई बढ़ सकती है.
चीन के पास क्या है विकल्प?
विशेषज्ञों के अनुसार अगर अमेरिका चीन के बड़े बैंकों को निशाना बनाता है, तो बीजिंग दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) की सप्लाई को हथियार बना सकता है. चीन दुनिया में रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में लगभग एकाधिकार रखता है. ये खनिज अमेरिकी उद्योगों के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं.




