ओसामा बिन लादेन की मौत के 15 साल बाद CIA की रिपोर्ट से मची सनसनी! तो क्या जिंदा होता अल-कायदा सरगना?
CIA के ताजा दस्तावेजों के मुताबिक, अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन अमेरिकी छापेमारी से कुछ महीने पहले ही अपने ठिकाने को छोड़ने की तैयारी में था.
osama bin laden
एबटाबाद ऑपरेशन के एक दशक से अधिक समय बाद सामने आए नए खुलासों ने दुनिया को चौंका दिया है. CIA के ताजा दस्तावेजों के मुताबिक, अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन अमेरिकी छापेमारी से कुछ महीने पहले ही अपने ठिकाने को छोड़ने की तैयारी में था. अगर यह योजना सफल हो जाती, तो इतिहास की दिशा पूरी तरह बदल सकती थी.
सीआईए द्वारा जारी आधिकारिक रिकॉर्ड से यह भी सामने आया है कि बिन लादेन न केवल अपने छिपने के ठिकाने से निकलने की योजना बना रहा था, बल्कि उसी दौरान वह एबटाबाद स्थित परिसर से अल-कायदा के संचालन को भी सक्रिय रूप से नियंत्रित कर रहा था.
बिन लादेन पर किसका था दबाव?
सीआईए दस्तावेजों के अनुसार, परिसर में बरामद पत्रों से पता चलता है कि बिन लादेन पर उसे शरण देने वाले दो भाइयों का लगातार दबाव था. इसी दबाव के चलते उसने स्थान बदलने की योजना पर सहमति जताई. 14 जनवरी 2011 को लिखे एक पत्र में उसने इस स्थिति को स्वीकार करते हुए भाइयों का आभार जताया और उनकी जिम्मेदारी को भारी बोझ बताया. इसके बाद 2 फरवरी 2011 को लिखे एक अन्य पत्र में उसने स्पष्ट किया कि वे लोग इस व्यवस्था से थक चुके थे और अलग होना चाहते थे.
कब तक थी जगह बदलने की तैयारी?
बिन लादेन ने इन पत्रों में यह भी संकेत दिया कि वह अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी दूसरों को सौंपकर सितंबर 2011 तक स्थान परिवर्तन करना चाहता था. हालांकि, उस समय अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को इस योजना की कोई जानकारी नहीं थी. सीआईए ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा "अगर छापेमारी करने का फैसला टाल दिया गया होता, तो इस कहानी का अंत बिल्कुल अलग हो सकता था."
खुफिया एजेंसी को कैसे मिली सफलता?
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने बिन लादेन के नेटवर्क से जुड़े लोगों पर नजर रखी. इस दौरान एक भरोसेमंद कूरियर की पहचान सबसे बड़ी सफलता साबित हुई. कई सालों की जांच के बाद उस कूरियर का लिंक पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के एबटाबाद में स्थित एक संदिग्ध परिसर से जुड़ा मिला.
किस बात से बढ़ा शक?
एबटाबाद का यह परिसर बेहद असामान्य था। ऊंची दीवारें, कांटेदार तार, डबल गेट, अपारदर्शी खिड़कियां और इंटरनेट या फोन कनेक्शन का अभाव ये सभी संकेत किसी बड़े रहस्य की ओर इशारा कर रहे थे. यहां तक कि परिसर का कचरा भी बाहर फेंकने के बजाय जलाया जाता था. इन सभी संकेतों के आधार पर खुफिया एजेंसियों ने निष्कर्ष निकाला कि यह ठिकाना किसी बड़े आतंकी को छिपाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है.
कैसे की ऑपरेशन की सीक्रेट तैयारी?
लक्ष्य की पहचान होने के बाद सीआईए ने इस मिशन की बारीकी से तैयारी की. परिसर की हूबहू प्रतिकृति बनाई गई, ताकि हमलावर टीम को हर संभावित स्थिति के लिए तैयार किया जा सके. 29 अप्रैल 2011 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस ऑपरेशन को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य सटीक कार्रवाई के साथ न्यूनतम नागरिक नुकसान सुनिश्चित करना था.
कब हुआ बिन लादेन का अंत?
2 मई 2011 को अमेरिकी विशेष बलों ने अफगानिस्तान से उड़ान भरकर एबटाबाद में कार्रवाई को अंजाम दिया. रात करीब 12:30 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ. एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने के बावजूद मिशन जारी रहा. मुठभेड़ शुरू होने के करीब नौ मिनट के भीतर बिन लादेन को तीसरी मंजिल पर मार गिराया गया. इसके बाद उसके शव को सुरक्षित किया गया और बड़ी मात्रा में दस्तावेज और डिजिटल सामग्री जब्त की गई.
कहां दफनाया गया शव?
ऑपरेशन के बाद बिन लादेन की पहचान कई स्तरों पर पुष्टि की गई. उसी दिन उसके शव को उत्तरी अरब सागर में यूएसएस कार्ल विंसन से समुद्र में दफनाया गया. सीआईए रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि बिन लादेन अपनी मौत तक अल-कायदा के संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रहा था. वह संगठन की रणनीति, संचार और योजनाओं को नियंत्रित कर रहा था.




