Mullahs Leave Country : खामेनेई की सत्ता गई तो भारत तक पहुंच सकती है उसकी आग? क्या कहते हैं एक्सपर्ट
Mullahs Leave Country Iran: मुल्ला भारत छोड़ो आंदोलन: ईरान में खामेनेई की सत्ता हिलती है तो क्या उसकी आग भारत तक पहुंच सकती है? ‘मुल्ला भारत छोड़ो’ जैसे नारों के बीच जानिए मिडिल ईस्ट संकट भारत को कैसे प्रभावित कर सकता है और अमेरिका की रणनीति में इंडिया कहां खड़ा है?
Mullahs Leave Country Iran: इस बात की उम्मीद कम है, लेकिन ईरान में अगर खामेनेई की सत्ता गिरती है, तो यह सिर्फ तेहरान की सत्ता का बदलाव नहीं होगा बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में आग लगने जैसा होगा. रूस और चीन भी अपनी रणनीति बदलने के लिए बाध्य होंगे. यह ऐसी आग है, जो सीमाओं में बंधी नहीं रहती. अहम सवाल यह भी है कि क्या उस आग की लपटें भारत तक पहुंच सकती हैं? और अगर हां, तो कैसे? क्या अमेरिका अपनी रणनीति में भारत को 'कोलैटरल डैमेज' होने देगा? अगर हां तो क्यों? इस पूरे समीकरण को समझने के लिए सिर्फ ईरान नहीं, पाकिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका सभी को एक साथ देखना होगा.
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विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मदीप अलूने का कहना है कि ईरान में बुर्का, लाइफ स्टाइल, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी व अन्य कारणों से 'मुल्ला देश छोड़ो' आंदोलन चल रहा है. इस आंदोलन में अमेरिका की परदे के पीछे से भूमिका अहम है. फिर, ट्रंप ने ईरान को धमकी देकर साफ कर दिया है कि अमेरिका की ईरान की वर्तमान खामनेई की सत्ता को लेकर मंशा क्या है? कुछ लोग ये भी मानते हैं कि अमेरिका रजा पहलवी को आगे कर ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने की पुरजोर कोशिश में जुटा है. ताकि वो अपने मतलब की सरकार वहां बना सके. कुछ लोगों को लगता है कि वहां पर इस बार खामेनेई सत्ता से बेदखल कर दिए जाएंगे. वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा नहीं होगा.
अगर अमेरिकी समर्थक विचार वाले गुट की भू राजनीतिक समझ को सही मान लिया जाए तो भारत पर इसका असर होगा. ऐसा इसलिए कि ऐसी स्थिति में ईरान में अमेरिका के नेतृत्व में कठपुतली सरकार होगी. कठपुतली सरकार के जरिए अमेरिका भारत पर दबाव बढ़ाएगा.
अमेरिका दिखाएगा भारत को धौंस!
फिर, दक्षिण एशिया में अमेरिका, पाकिस्तान, ईरान और बांग्लादेश के जरिए आनी धौंस दिखाएगा. अमेरिका भारत को अपने हिसाब इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा. इतना ही नहीं यूएस मध्य पूर्व के देशों को भारत के साथ असहयोग करने के लिए मजबूर करेगा.
भारत के हाथ से निकल जाएगा चाबहार
ऐसा हुआ ही तो रूस भारत का साथ देगा. रूस कभी नहीं चाहेगा कि ईरान में अमेरिका हावी हो जाए. ना ही चीन ऐसा चाहेगा. ये बात अलग है कि रूस यूक्रेन के साथ युद्ध में चार साल से उलझा हुआ है. इसके बावजूद, ईरान में अमेरिका की एंट्री से भारत के सामरिक हित प्रभावित होंगे. ऐसी स्थिति में भारत चाबहार बंदरगाह का भी इस्तेमाल नहीं कर पाएगा.पाकिस्तान के बाद ईरान ही भारत का सबसे बड़ा विरोधी हो जाएगा. वर्तमान में ऐसा नहीं है. फिर अफगानिस्तान के भी हमारे हाथ निकलने की संभावना हो सकती है, क्योंकि, वैसी भू राजनीतिक परिस्थितियों में भारत आज की तरह अफगानिस्तान का खुलकर सहयोग नहीं कर पाएगा.
ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना कम
डॉ. अलूने का कहना है कि फिलहाल, अमेरिका ईरान में अपनी मर्जी की सरकार स्थापित कर लेगा, इसकी संभावना कम है. ऐसा इसलिए कि ईरान एक ऐसा देश में जहां रेगिस्तान, मैदान और पहाड़ तीनों का संगम है. यही वजह है कि इराक ने ईरान पर हमला बोला था. आठ साल तक युद्ध लड़ता रहा, पर ईरान के 40 किलोमीटर एरिया में भी अपनी पूरी पकड़ नहीं बना सका. अंतत: अमेरिका ने इराक से सद्दाम हुसैन सरकार को ही उखाड़कर फेंक दिया. कहने का मतलब यह है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है, जहां जमीन पर कब्जा करना बहुत मुश्किल है.
उन्होंने कहा कि ईरान में धर्म गुरु सर्वोच्च सत्ता के प्रमुख होते हैं. ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला खामेनेई हैं. वहां की सेना भी धार्मिक नेता के अधीन ही काम करती है. यानी वहां की चुनी हुई सरकार के हाथ में बहुत कुछ नहीं होता. ऐसे में अमेरिका राजा पहलवी के सहयोग से भले ही अपने मनपसंद की सरकार बनाने की ख्वाहिश रखता हो, पर वो वैसा नहीं कर पाएगा.
ब्रह्मदीप अलूने के अनुसार जैसे भारत के शंकराचार्य के प्रति हिंदू आदर का भाव रखते हैं, ठीक वैसे ही ईरान में धर्म गुरु यानी अयातुल्लाह खामेनेई का वहां के लोग सम्मान करते हैं. ईरान में खामनेई का विरोध लोगों का एक तबका करता है. ऐसे प्रदर्शन पहले भी वहां होते रहे हैं, जिससे खामेनेई सरकार नियंत्रित करती आई है. अमेरिका ने तो महसा अमीनी मामला सामने आने के बाद भी वहां के तीव्र आंदोलन का समर्थन किया था. पहले की तरह अमेरिका इस बार भी अपनी मुहिम में सफल नहीं होगा.
ऐसा होने पर भारत में भड़केगा दंगा
कहने का मतलब यह है कि ईरान में अमेरिका की साजिश सफल होने पर ही वो भारत पर और ज्यादा दबाव बनाने की स्थिति में होगा. इतना में जरूर कह सकता हूं कि अगर खामेनेई की सत्ता गई तो अमेरिका कुछ करे या ना करे, भारत में शिया सुन्नियों के बीच ही दंगा जरूर भड़क जाएगा.
पावर वैक्यूम का असर भारत तक कैसे?
मिडिल ईस्ट में अराजकता भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में डाल सकता है. ऐसा इसलिए कि भारत तेल का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है. होर्मुज जलडमरूमध्य भारत की जीवन रेखा है. अगर ईरान अस्थिर हुआ तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें उछलेंगी.भारत का आयात बिल बढ़ेगा और महंगाई और रुपये पर दबाव भी बढ़ेगा. इससे सीधे आम भारतीय भी प्रभावित होंगे. ईरान के कमजोर होने से पाकिस्तान और तुर्की को बल मिलेगा.
ईरान अहम क्यों?
खामेनेई की ईरान पाकिस्तान के कट्टर इस्लामी नेटवर्क पर लगाम रखती है. शिया-सुन्नी बैलेंस बनाए रखती है. अगर ईरान कमजोर हुआ तो पाकिस्तान को अफगानिस्तान-ईरान बेल्ट में ज्यादा छूट मिलेगी. भारत-विरोधी नेटवर्क को बल मिलेगा. ईरान की वजह से भारत का चाबहार पोर्ट के जरिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से कनेक्शन है. भारत का राजनीतिक प्रोजेक्ट कमजोर साबित होगा. ऐसे में अमेरिका जानबूझकर भारत को नुकसान पहुंचाएगा? दरअसल, अमेरिका का गेम 'डायरेक्ट नहीं, कोलैटरल' होता है.
अमेरिका का लक्ष्य क्या है?
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान को कमजोर कर चीन-रूस-ईरान के ब्लॉक तोड़ दें. भारत को नुकसान पहुंचाना उसका उद्देश्य नहीं होगा, लेकिन उसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ सकती है. तेल प्रतिबंध लगा तो भारत के सामने ऊर्जा समस्या की समस्या उठ खड़ी होगी. इस तरह का भू-राजनीतिक खेल अमेरिका इसलिए कर रहा है कि उसकी इजरायल और मिडिल ईस्ट पर कंट्रोल रहे. अमेरिका के लिए भारत सेकेंडरी थिएटर है. अमेरिका प्रशासन के लोग यह भी मानते हैं कि भारत एडजस्ट कर लेगा, लेकिन मोदी सरकार की नीति एडजस्ट करने वाली नहीं है.





