खामनेई की रातों की नींद उड़ाने वाले रजा पहलवी कौन? सत्ता परिवर्तन की आहट या विदेशी साज़िश! सुलग रहे ईरान के बीच गूंज रहा ये नारा
ईरान इस वक्त भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा है. महंगाई, बेरोज़गारी और गिरती अर्थव्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग अब सीधे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई को निशाने पर ले रहे हैं. प्रदर्शनों में ‘रेज़ा पहलवी ज़िंदाबाद’ जैसे नारे गूंज रहे हैं, जिससे सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज़ हो गई हैं. रेज़ा पहलवी ईरान के आखिरी शाह के बेटे हैं और निर्वासन में रहते हैं. सवाल यह है कि यह जनआक्रोश असली बदलाव की शुरुआत है या इसके पीछे विदेशी ताकतों की साज़िश.
ईरान इस समय अपने सबसे बड़े राजनीतिक-सामाजिक उबाल के दौर से गुजर रहा है. महंगाई, बेरोज़गारी और गिरती अर्थव्यवस्था के खिलाफ तेहरान से शुरू हुआ जनआक्रोश अब देश के कई शहरों में फैल चुका है. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अब तक कम से कम सात लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी सीधे तौर पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई के खिलाफ नारे लगा रहे हैं और एक नाम बार-बार गूंज रहा है- रेज़ा पहलवी.
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इस उथल-पुथल के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी, इज़राइल के बयान और अमेरिकी सांसदों की प्रतिक्रियाओं ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया है. सवाल उठ रहे हैं- क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन की आहट है? कौन हैं रेज़ा पहलवी, जिनकी वापसी की मांग हो रही है? और क्या वाकई इसके पीछे अमेरिका-इज़राइल की कोई साज़िश है?
महंगाई ने जलाया ईरान, सड़कों पर उतरे लोग
28 दिसंबर से ईरान की राजधानी तेहरान में युवाओं, दुकानदारों और आम नागरिकों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. देखते-ही-देखते यह आंदोलन करज, इस्फ़हान और कुहदश्त जैसे शहरों तक फैल गया. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में अब तक छह प्रदर्शनकारियों और एक सुरक्षाकर्मी की मौत हो चुकी है.
ईरान की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है. दिसंबर 2025 में ईरानी रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और एक डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत करीब 42,000 रियाल बताई गई. महंगाई दर 42.5% तक पहुंच चुकी है. खाद्य पदार्थों की कीमतों में 72% और दवाइयों में 50% तक की बढ़ोतरी हुई है. हालात को और बिगाड़ते हुए सरकार ने 2026 के बजट में 62% टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव रखा.
सरकार की सफाई और सीमित नरमी
बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने सेंट्रल बैंक के गवर्नर को हटाकर नया गवर्नर नियुक्त किया. राष्ट्रपति मसूद पेशेज़्कियान ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की पेशकश की. सरकार की प्रवक्ता फातेमेह मोहाजेरानी ने कहा कि सरकार विरोध प्रदर्शनों को मान्यता देती है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोगों का मौलिक अधिकार है.
'खामनेई मुर्दाबाद, पहलवी ज़िंदाबाद' के नारे
प्रदर्शनों के दौरान ईरानी छात्र और आम नागरिक “डेथ टू डिक्टेटर खामनेई”, “लॉन्ग लिव रेज़ा पहलवी”, “जाविद शाह” और “पहलवी विल रिटर्न” जैसे नारे लगा रहे हैं. यही नारे इस आंदोलन को पहले के विरोध प्रदर्शनों से अलग बनाते हैं.
कौन हैं रेज़ा पहलवी, जिनकी वापसी की मांग?
रेज़ा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रेज़ा शाह पहलवी के सबसे बड़े बेटे हैं. उनका जन्म 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में हुआ था. 1967 में उन्हें आधिकारिक तौर पर ईरान का क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था. लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद उनका परिवार देश छोड़ने को मजबूर हुआ. रेज़ा पहलवी ने अमेरिका में राजनीतिक विज्ञान की पढ़ाई की और फिलहाल मैरीलैंड में निर्वासन में रहते हैं. उन्होंने 2013 में “नेशनल काउंसिल ऑफ ईरान फॉर फ्री इलेक्शंस” की स्थापना की और ईरान में स्वतंत्र चुनावों की मांग की. वे खामनेई के नेतृत्व वाले इस्लामिक शासन को तानाशाही बताते रहे हैं. हालिया प्रदर्शनों पर उन्होंने X पर लिखा- 'मैं आपके साथ हूं. जीत हमारी होगी क्योंकि हमारा मकसद न्यायपूर्ण है और हम एकजुट हैं. जब तक यह सरकार सत्ता में रहेगी, देश की आर्थिक हालत बिगड़ती रहेगी.'
कैसे गिरा शाह का शासन और आया खामनेई युग?
मोहम्मद रेज़ा शाह पहलवी ने 1941 से 1979 तक ईरान पर शासन किया. पश्चिमी देशों से करीबी और सेक्युलर नीतियों के कारण उनका विरोध बढ़ता गया. 1963 में अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने ‘व्हाइट रेवोल्यूशन’ के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. 1978-79 में इस्लामिक क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका. शाह देश छोड़कर चले गए और 1980 में मिस्र में उनकी मौत हो गई. 1989 में खुमैनी की मौत के बाद अली खामनेई ईरान के सर्वोच्च नेता बने और पिछले 36 वर्षों से सत्ता में हैं.
क्या अमेरिका-इज़राइल की साज़िश?
ईरानी सरकार का आरोप है कि अमेरिका और इज़राइल इन प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं. ORF के सीनियर फेलो सुशांत सरीन के मुताबिक, “अगर इस्लामिक शासन की जगह ऐसा नेतृत्व आता है जो इज़राइल का दुश्मन न हो, तो यह अमेरिका-इज़राइल के लिए आदर्श स्थिति होगी.” इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही ईरानी जनता से खामनेई के खिलाफ उठ खड़े होने की अपील कर चुके हैं. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी कहा- 'शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को धमकाना और गिरफ्तार करना चिंता का विषय है. अधिकार मांगना अपराध नहीं है.'
क्या खामनेई का तख्तापलट संभव?
विशेषज्ञ मानते हैं कि खामनेई को हटाना आसान नहीं है. JNU के प्रोफेसर ए.के. पाशा कहते हैं कि सत्ता परिवर्तन तभी संभव है जब अमेरिका सीधी भूमिका निभाए. वहीं, कई विश्लेषकों का मानना है कि खामनेई के बाद उत्तराधिकारी की योजना पहले से तैयार है, जिसमें उनके बेटे मोज्तबा का नाम भी चर्चा में है. ईरान और वेटिकन दुनिया के दो ऐसे देश हैं जहां धर्म सर्वोच्च सत्ता है. ईरान में ‘रहबर’ यानी सुप्रीम लीडर सबसे ताकतवर पद है. असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को उसे हटाने का अधिकार है, लेकिन उसके सदस्य भी रहबर की निगरानी में चुने जाते हैं, जिससे सत्ता का चक्र बंद हो जाता है.
सत्ता परिवर्तन से अमेरिका-इज़राइल को क्या मिलेगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक तीन बड़े फायदे होंगे-
- मध्य-पूर्व पर अमेरिका का लगभग पूर्ण नियंत्रण
- सऊदी अरब जैसे देशों के साथ रिश्तों में मजबूती
- अमेरिका-इज़राइल गठबंधन और ज्यादा ताकतवर होना.





