मजा न कराया तो पैसे वापस, सड़कछाप जुबान के चलते पाकिस्तान के DG ISPR ने करवाई खुद की फजीहत
पाकिस्तान की सेना के आधिकारिक प्रवक्ता की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस बार सिर्फ बयान नहीं दिए, बल्कि कई सवाल भी खड़े कर दिए. इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (DG ISPR) के हालिया संवाद ने सुरक्षा और कूटनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी है. खुफिया सूत्रों का कहना है कि इस ब्रीफिंग में जिस तरह की भाषा और लहजा अपनाया गया, वह न केवल सैन्य मर्यादाओं से अलग था, बल्कि पाकिस्तान आर्मी के भीतर गहराती बेचैनी की झलक भी देता है.
पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता DG ISPR की हालिया प्रेस ब्रीफिंग अब उनके बयानों से ज़्यादा उनकी भाषा को लेकर चर्चा में है. “मज़ा न कराया तो पैसे वापस” जैसी सड़कछाप टिप्पणी ने न सिर्फ सैन्य मर्यादाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की छवि को भी असहज स्थिति में डाल दिया.
जिस मंच से संयम, गंभीरता और पेशेवर संदेश की उम्मीद की जाती है, वहीं से हल्के और तंज भरे शब्दों का इस्तेमाल होते देख विशेषज्ञ इसे ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि खुद की फजीहत करार दे रहे हैं.
मज़ा न आया तो पैसे वापस
प्रेस ब्रीफिंग के दौरान DG ISPR ने बार-बार हल्की-फुल्की, तंज भरी और मज़ाकिया लाइन्स का सहारा लिया. “मज़ा न कराया तो पैसे वापस” जैसे शब्द, वह भी भारत और अफगानिस्तान को धमकी देते हुए, खुफिया सूत्रों के अनुसार किसी पेशेवर सैन्य अधिकारी की शब्दावली नहीं मानी जा सकती. जानकारों का कहना है कि यह भाषा सेना की उस छवि को कमजोर करती है, जिसे वह वर्षों से अनुशासन और गंभीरता के प्रतीक के रूप में पेश करती आई है.
पुरानी स्क्रिप्ट से हटकर नया गिरा हुआ अंदाज
अब तक DG ISPR की प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत विरोध तक सीमित, लेकिन एक तय ढांचे में होती थीं. इस बार वैचारिक हमला पीछे छूट गया और उसकी जगह उपहास और कटाक्ष ने ले ली. विशेषज्ञों के मुताबिक, औपचारिक सैन्य शब्दों की जगह चिढ़ाने वाली भाषा का इस्तेमाल आत्मविश्वास नहीं, बल्कि भीतर की असहजता को दिखाता है.
‘हार्ड स्टेट’ की बात
DG ISPR ने 2026 तक पाकिस्तान को “हार्ड स्टेट” बनाने की बात कही और यह दावा भी किया कि भारत कभी पाकिस्तान को स्वीकार नहीं करेगा. उन्होंने यह भी जताने की कोशिश की कि राजनीति, फौज और जनता- तीनों एक ही टकराव वाली सोच में बंधे हैं. लेकिन जिस तरह से यह सब कहा गया, विश्लेषकों के अनुसार, उसने बयान की गंभीरता को ही कमजोर कर दिया. “ऊपर से आएं या नीचे से, दाएं से हों या बाएं से” जैसी पंक्तियां किसी सैन्य रणनीति की भाषा कम और मंचीय संवाद ज्यादा लगीं. खुफिया सूत्रों का मानना है कि इस तरह की नाटकीयता और घटिया शब्द चयन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की साख को नुकसान पहुंचाता है.
कूटनीति के बजाय कटाक्ष का सहारा
विशेषज्ञों का कहना है कि इस ब्रीफिंग ने उस कूटनीतिक आवरण को भी हटा दिया, जिसके पीछे पाकिस्तान अक्सर अपने तीखे इरादों को छिपाने की कोशिश करता है. खुलेआम अपमानजनक और तंज भरी भाषा यह बताती है कि संवाद की जगह अब कटाक्ष और उकसावे ने ले ली है.
वैश्विक छवि पर पड़ता असर
सूत्रों के मुताबिक, ऐसे बयान उस वक्त सामने आए हैं जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आतंकवाद के मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी में है. जहां एक संतुलित और स्पष्ट रणनीतिक संदेश की जरूरत थी, वहां झुंझलाहट और रक्षात्मक रवैया साफ दिखाई दिया. यह न केवल पाकिस्तान की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, बल्कि विदेशी सैन्य साझेदारों के बीच भी गलत संकेत भेजता है.





